अरहर भारत की बहुप्रचलित एवं लोकप्रिय प्रमुख दलहनी फसल है। अरहर को मुख्यतः असिंचित दशाओं में खेती की जाती है क्योंकि इसकी जड़े काफी गहराई तक जाती है और जड़े जमीन की निचली सतह से पानी ले लेती है। जहाँ पानी जमाव होता हो ऐसे क्षेत्र में इसकी खेती सम्भव नहीं है वहाँ अरहर के पौधे सूख जाते हैं। अरहर की खेती से भूमि की उर्वराशक्ति भी बढ़ती है इसकी जड़े नत्रजन स्थरीकरण का कार्य करती है साथ ही पौधे की पुरानी पत्तियाँ खेत में गिरती है और सड़कर खाद बन जाती है। अरहर को मिश्रित फसल के रूप में भी उगाया जाता है। अरहर की मुख्य फसल के साथ मूँग, उरद जैसी फसलों को सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।
जलवायु
अरहर शुष्क जलवायु की फसल है, अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में अरहर खेती सम्भव नहीं है।
भूमि
बलुई दोमट से हल्की दोमट मिट्टी अरहर की खेती के लिए सर्वोत्तम होती है। मिट्टी का पी.एच. मान 5 से 8 के मध्य उत्पादन के लिए अच्छा पाया गया है। लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी में अरहर की खेती सम्भव नहीं है। जल निकास की पर्याप्त सुविधा होना चाहिए और ढालदार खेत सबसे अच्छा माना गया है।
खेत की तैयारी
दो-तीन जुताई करके पाटा चलाकर मिट्टी भुरभुरी बना लेनी चाहिए। अंतिम जुताई के समय 5 टन गोबर की सड़ी खाद खेत में समान रूप से बिखेर कर मिट्टी में मिला देना चाहिए। इसी समय खेत में जल निकास की व्यवस्था सुनिश्चित कर लेना लाभदायक रहता है।
उन्नत प्रभेद :अरहर की किस्मों में अगेती एवं पछेती दो तरह की होती है अगेती किस्मों से उत्पादन थोड़ा कम पाया जाता है और पछेती में उत्पादन अधिक प्राप्त होता है।
शीघ्र पकने वाली किस्में : पूसा अगेती, यू.पी.एस.-120, जागृति, टाईप-21, प्रगति, भानक नरेन्द्र अरहर-1, नरेन्द्र अरहर-2 एवं शरद किस्में मुख्य है।
देर से पकने वाली किस्में : यह मुख्य फसल के रूप में जानी जाती है जिसमें बहार, पूसा-9, नरेन्द्र अरहर-1, मालवीय चमत्कार, टाईप 7 एवं टाइप-17 प्रमुख किस्में है।सितम्बर अरहर में पूसा 9 एवं शरद की बुआई 25 अगस्त से 15 सितम्बर तक की जाती है। बीज दर 25-30 कि.ग्रा./हेक्टर।
बीजदर : मुख्य फसल के लिए 15 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है एवं अगेती किस्मों के लिए 25 से 30 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर प्रर्याप्त होता
बीजोपचार : बीज को बुवाई से 24 घंटे पूर्व 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करें इसके बाद बुवाई से ठीक पहले राइजोबियम कल्चर एवं पी. एस.बी. की 20 ग्राम प्रति क्विंटल की दर से उपचारित कर बीज की बुवाई करनी चाहिए।
बुवाई की दूरी : खरीफ में बुवाई करने के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 75 सेमी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी. रखी जाती है। अगेती किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति 30 सेमी. और पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सेमी. पर बुआई करनी चाहिए।
बीज की बुवाई : तैयार खेत में उपचारित बीज को कूँड में या डिब्लर द्वारा बुवाई निश्चित दूरी पर करनी चाहिए। बवाई कतार से ही करें इसे रोग एवं कीटों का प्रकोप कम होता है साथ ही उत्पादन भी अच्छा प्राप्त होता है।
पोषक तत्व प्रबंधन : खरीफ फसल के लिए 20 किग्रा. नत्रजन, 45 किग्रा. फास्फोरस एवं 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। अगेती किस्मों के लिए खरीफ की तरह उर्वरक का प्रयोग किया जाता है इसमें 10 किग्रा. नत्रजन की अतिरिक्त मात्र बीज बुवाई के एक माह बाद खड़ी फसल में देना लाभदायक रहता है। भूमि में यदि जिंक एवं सल्फर की कमी हो तो बुआई के समय 25 कि. ग्रा./हे. जिंक सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए।
सिंचाई प्रबंधन : एकाध हल्की सिंचाई कर सकते हैं वैसे अरहर में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि इसकी जड़े गहराई तक जाकर भूमि की निचली सतह से अपने उपयोग भर के पानी प्राप्त कर लेती है।
खरपतवार नियंत्रण : इसके लिए बीज बुवाई के तुरंत बाद पेन्डीमेथेलीन 30 ई.सी. की 3 लीटर मात्र प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़क कर देनी चाहिए। यदि सम्भव हो तो निराई-गुड़ाई कर खरपतवार नियंत्रण करना अधिक लाभदायक रहता है इससे जड़ों के विकास के लिए अच्छा अवसर प्राप्त होता है।
पौधा संरक्षण : अरहर फसल में कीटों का प्रकोप अधिक पाया जाता है जिसके कारण उपज घट जाती है जिसे निम्न तरह से नियंत्रित किया जा सकता है।
कटाई : फसल की कटाई लगभग 80 प्रतिशत फलियों के पकने के बाद हसिए या गड़ासे की सहायता से जमीन की सतह से कटाई करनी चाहिए।
मड़ाई : कटाई उपरांत अरहर के पौधों का बण्डल बनाकर कुछ दिन खलिहान में सूखने के लिए रखें, तत्पश्चात् डण्डे से पीटकर अथवा थ्रेसर द्वारा दानों को बण्डल से अलग कर लिया जाता है।
उपज : खरीफ फसल से 20 से 30 क्विंटल एवं अगेती किस्मों से 15 से 16 क्विंटल उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है।
खेत की तैयारी, बीज एवं बुआई खर्च
निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण
पौधा संरक्षण
कटाई एवं मढ़ाई इत्यादि
कुलखर्च
5050.00 रुपये
6550.00 रुपये
3850.00 रुपये
6500.00 रुपये
21,950.00 रुपये
कुल उपज = 16 क्विंटल दर 3450/क्विंटल = 55200.00 रुपये
शुद्ध आय = 55200 - 21950 = 33250 रुपये
"देहाती खेती" एक स्मार्ट फार्मिंग टेक्नोलॉजी प्लेटफार्म है, जाहाँ पर खेती-किसानी से जुड़ी हर जानकारी, आधुनिक तकनीक, और ग्रामीण विकास के उपायों को समर्पित है। हमारा उद्देश्य है किसानों को शिक्षित करना, उनकी आय बढ़ाना, और गांवों को समृद्ध बनाना। देहाती खेती का लक्ष्य भारतीय किसानों को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाना है।
मशरुम की वैज्ञानिक खेती : मशरूम का इतिहास। मशरूम उत्पादन । बटन मशरूम की खेती I ऑयस्टर (ढिंग्री)मशरूम् की खेती I दूधिया (मिल्की) मशरूम की खेती I रिशी मशरूम (गेयनोडर्मा लुसी डुम) की खेती I
मशरुम का बीज (स्पॉन) बनाना सीखे I मशरूम की बिमारियाँ एवम प्रबन्धन I