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धनिया की खेती

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मसाला फसलों में धनिया की उपयोगिता काफी अधिक पाई गई है। इसे पूरे देश में नकदी फसल के रूप में उगाया जाता है। धनिया में पाये जाने वाले वाष्मशील तेल को कारण भोजन स्वादिष्ट हो जाता है। साथ ही इसके वाष्पशील तेल का उपयोग विभिन्न प्रकार की दवाओं में किया जाता है। धनिया मूत्र वर्धक, पेट की वायुनाशक, उदरशूल नाशक, उत्तेजक एवं बल वर्द्धक के रूप में विशेष गुण रखती है। आचार, सब्जी, चटनी एवं सलाद के रूप में इसका उपयोग सर्वविदित है।

जलवायु : 
धनिया शीत जलवायु की फसल है, अंकुरण के समय हल्की गर्मी और ठण्ड मौसम की आवश्यकता होती है तथा बीज पकते समय गर्म मौसम श्रेयस्कर माना गया है।

भूमि:
जीवांश युक्त दोमट या बलुई दोमट भूमि धनिया की खेती के लिए अच्छी होती है। भूमि का पी.एच. मान 6 से 7.5 तक उपयुक्त रहता है। जल निकास की पर्याप्त सुविधा आवश्यक है, अन्यथा अधिक समय तक पानी लगा रहने से फसल खराब हो सकती है।

खेत की तैयारी:
धनिया की खेती के लिए तीन से चार जुताई करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा आवश्य लगाते रहना चाहिए। इससे मिट्टी भुरभुरी तथा खेत समतल हो जाता है। खेत की अंतिम जुताई के समय लगभग 15 टन गोबर की सड़ी खाद बिखेर कर मि‌ट्टी में मिला देना चाहिए।

उन्नत प्रभेद :
धनिया की प्रभेद को अपनी आवश्यकतानुसार चयन कर सकते है, क्योंकि कुछ हरे पत्ते के लिए तो कुछ बीज के लिए खेती करते हैं। धनिया की प्रमुख प्रजातियों में राजेन्द्र स्वाती, गुजरात कोरियण्डर-1, गुजरात कोरिण्डर-2, पंज हरितिमा, हिसार आनन्द, एल.सी.सी. 133. स्वाती, पंजाब धनिया, साधना मुख्य प्रजाति हैं जिसमें राजेन्द्र स्वाती की उत्पादन क्षमता 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. पंत हरितमा की उत्पादन क्षमता 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा रोगरोधी किस्म है। हिसार आनंद के दाने मध्यम आकार के और उपज 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है। इसी तरह से एल. सी.सी. के दाने बड़े आकार के और उत्पादन क्षमता सबसे अधिक 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेगर तक पाई जाती है।

बीज दर :
एक हेक्टेयर धनिया की खेती के लिए 15 से 20 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है।

बुआई की समय :
धनिया की बुआई का उचित समय 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक का समय अनुकूल होता है। अपनी आवश्यकतानुसार किसान भाई इस समय कभी भी धनिया की बुआई कर सकते है। विदित हो कि धनिया का बीज दो दाल वाली होती है, अतः चाहिए कि इसे बुआई से पहले किसी वजनदार वस्तु से रगड़कर दोनों दाल को अलग कर लें।

बीज उपचारः
बीज बुआई से पूर्व बीजशोधन महत्वपूर्ण कार्य होता है, इसके लिए कार्बन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण दवा की 2.5 ग्राम मात्रा लेकर प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित कर बीज की बुवाई करना चाहिए। बीज शोधन से पूर्व बीज को लगभग 12 घंटे तक पानी में भिंगोकर रखना चाहिए इससे अंकुरण काफी अच्छा होता है।

पोषक तत्व प्रबंधन :
असिंचित अवस्था में 20 किग्रा. नेत्रजन, 30 किग्रा. फास्फोरस एवं 20 किग्रा. पोटाश की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। सिंचित खेती के लिए 60 किग्रा. नत्रजन, 40 किग्रा. फास्फोरस एवं 30 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। नत्रजन को तीन भागों में बाँट कर दिया जाता है। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा को एक बार में तथा एक तिहाई नेत्रजन, बीज बुआई से पूर्व खेत में समान रूप से विशेषकर मिट्टी में मिला देना चाहिए। नेत्रजन की शेष मात्रा फिर दो भागों में बाँट कर पहली सिंचाई के बाद एवं फूल आने की अवस्था पर खड़ी फसल में देना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन :
धनिया में 4 से 6 सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई 30 से 35 दिन पर, दूसरी सिंचाई 50 से 60 दिन पर, तीसरी 70 से 80, चौथी 90 से 100, पाँचवी 105 से 110 एवं छठी सिंचाई 115 से 125 दिन पर करनी चाहिए। सिंचाई सदैव हल्की करें, खेत में जल जमाव नहीं होना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण :
धनिया के खेत से खरपतवार निकालना अत्यंत आवश्यक है, नहीं तो पौधों से प्रतिस्पर्धा होती है जिससे फसल वृद्धि रूक जाती है। खेत में दिये गये पोषक तत्व को खरपतवार तेजी से ग्रहण कर लेते हैं। इसके लिए निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को खेत से निकालते रहना चाहिए। लगभग 40 से 45 दिन की फसल अवस्था पर घने पौधों को उखाड़ कर पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी. कर लेनी चाहिए। इससे पौधों को विकास का अधिक अवसर मिलता है।

पौधा संरक्षण :
धनिया में रोग एवं कीटों का प्रकोप बहुत कम होता है, प्रमुख रोग निम्न प्रकार है।

  • झुलसा :
    इसमें पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं जिससे पत्तियाँ जली हुई प्रतीत होती हैं। इसके लिए संतुलित उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए, बीज शोधन के बाद ही बुआई करें। रासायनिक नियंत्रण में 0.1 प्रतिशत कार्बोन्डाजिम के साथ में 0.2 प्रतिशत मैंकोजेब मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
  • कुबड़ा रोगः
    इसके लिए पंत हरितिमा जैसी रोगरोधी किस्म लगाना चाहिए प्रकोप की दशा में खड़ी फसल पर मैंकोजेब 2.5 ग्राम के साथ में बेविस्टीन । ग्राम दवा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
  • चूर्ण फफूंदः
    इसके प्रकोप से बचने के लिए 20 से 25 किग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़‌काव करना चाहिए। साथ ही 0.2 प्रतिशत घुलनशील सल्फर के घोल को 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।

कटाई :
फसल की कटाई 110 से 140 दिन की अवस्था पर कर सकते है। असिंचित अवस्था में 110 दिन पर और सिंचित अवस्था में 140 दिन पर करते है। इस समय धनिया की फसल भूरे या पीले रंग की हो जाती है ऐसी अवस्था में धनिया फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। कटाई के बाद एक दो दिन धूप में सुखाकर मड़ाई कर लेनी चाहिए, जिससे दानों में चमक बनी रहे।

उपजः
असिंचित अवस्था में 8 से 10 क्विंटल और सिंचित अवस्था में 18 से 25 क्विंटल तक उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है।

Table Example

धनिया की खेती में प्रति हेक्टेयर आय व्यय का आकलन (वर्ष 2020-21 के अनुसार)

क्र. स. विवरण मात्रा दर राशि (रु०)
1 खेत की तैयारी एवं रेखांकनः
(क) ट्रैक्टर द्वारा जुताई 6 घंटा 450/ घंटा 2700.00
(ख) रेखांकन हेतु कार्यबल 20 कार्यबल 275 कार्यबल 5500.00
2. बीज एवं बुआई/रोपाई:
(क) बीज 20 कि.ग्रा 250/ क्विंटल 2500.00
(ख) बीजोपचार (फफूंदनाशी/कीटनाशी रसायन) 50 ग्रा. 1000/ कि.ग्रा. 50.00
(ग) बुआई / रोपाई 15 कार्यबल 275/ कार्यबल 4125.00
3 खाद एवं उर्वरकः
(क) गोबर कि सड़ी खादः 20 टन 500/ टन 10000.00
(ख) नत्रजन 20 किग्रा. 13.80 किग्रा. 276.00
(ग) स्फूर 30 किग्रा. 50 किग्रा. 1500.00
(घ) पोटाश 20 किग्रा. 24.50 किग्रा. 490.00
(ङ) खाद एवं उर्वरक के व्यवहार 6 कार्यबल 275/ कार्यबल 1650.00
4 सिंचाई 02 बार 1000/ सिंचाई 2000.00
5 निकाई-गुड़ाई 20 कार्यबल 275/ कार्यबल 5500.00
6 खर-पतवार नियंत्रण (रसायन का व्यवहार) 3000.00
7 पौधा संरक्षण 4000.00
8 फसल की खुदाई, दुलाई एवं बाज़ार व्यवस्था 30 कार्यबल 275/ कार्यबल 8250.00
9 भूमि का किराया 10000/ वर्ष 5000.00
10 अन्य लागत 3000.00
11 कुल व्यय : 59541.00 रुपये
कुल ऊपज : 25 कुंटल
कुल आय (रूपये): 150000.00 रुपये
शुद्ध आय (रूपये): 90459.00 रूपये
बिक्री दर @ 6000/ रु. प्रति कुंटल
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