धान की खेती हमारे राज्य में मुख्यतः खरीफ मौसम में की जाती है। प्रदेश के उत्तरी पूर्वी क्षेत्रेा में बड़े पैमाने पर बोरो धान की खेती भी हो रही है। पूर्व में प्रचलित गरमा धान की खेती अब काफी कम क्षेत्र में की जा रही है। धान की खेती हमारे यहां भूमि की विभिन्न पारिस्थितिक स्थितियों के अनुरूप की जा रही है।
उर्वरक का व्यवहार
बीज स्थली में 100 वर्ग मीटर क्षेत्रफल की बीच / स्थली में निम्नलिखित मात्रा में खाद दें।
खाद की मात्रा
सुगंधित किस्में
कंपोस्ट खाद का प्रयोग 10 से 15 टन / हेक्टर की दर से रोपाई के 20 - 25 दिन पहले करें।
जिंक सल्फेट 25 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से मुख्य खेत की अंतिम जुताई के समय एवं कदवा के पूर्व खेत में मिलाये।
नेत्रजन की आधी, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा कदवा के समय तथा एक चौथाई नेत्रजन की मात्रा रोपनी के 20 से 30 दिन के बाद तथा शेष नेत्रजन का बाली निकलने के समय ऊपरीबेशन करें। 150 एवं उससे अधिक अवधि के किस्मेा में नेत्रजन की एक चौथाई मात्रा रोपनी के पहले, दूसरी एक चौथाई रोपनी से 3 से 4 सप्ताह बाद, तीसरी एक चौथाई मात्रा 5 से 6 सप्ताह बाद और अंतिम एक चौथाई मात्रा रोपनी के 7 - 8 के बाद प्रयोग कर सकते हैं।
खरपतवार प्रबंधन
रोपनी के 40 दिनों तक खेत को खरपतवारों से मुक्त रखें। यांत्रिक विधि से निकाई - गुड़ाई सबसे उत्तम है। 8 - 10 इंच दूरी पर रोपीत धान में कोनोवीडर का प्रयोग करना बहुत फायदेमंद है।
जल प्रबंधन
ध्यान दें, हर समय जल बनाए रखना आवश्यक नहीं है बारी-बारी से खेत में पानी लगाना एवं खेत को हल्का सुखा देने से अधिक कल्ले निकलते है। बाली निकलने से लेकर परिपक्वताव्यवस्था तक खेत में 2 - 3 सेंटीमीटर तक जल बनाए रखें। धान के खेत में दरार न पड़े, उतनी नमी जरूर बनाए रखें।
फसल की कटनी दौंनी एवं भंडारण
धान की कटनी दैनिक परिपक्ता की अवस्था में करनी चाहिए। इस अवस्था में पौधा का तना कुछ हरा ही रहता है तथा बाली का नीचे वाला दाना जोर से दबाने पर चावल निकल जाता है। यह अवस्था पुष्पन के करीब 30 - 35 दिनों बाद आती है। कटनी के समय दानो में 24 प्रतिशत तथा भण्डारण के समय 12 प्रतिशत नमी रहना चाहिए।
धान उत्पादन की नयी तकनीक श्री विधि के 6 मुख्य स्तंभ:
धान के प्रमुख कीट एवं रोग तथा प्रबंधन
तना छेदक : मादा किट का अग्र पंख पीलापन लिए हुए होता है, जिसके मध्य भाग में एक काला धब्बा होता है। कीट के पिल्लू तना के अंदर घुसकर मुलायम भाग को खाता है इसके कारण गभ्भा सूख जाता है। बाद की अवस्था में आक्रांत होने पर बालियाँ सफेद हो जाती है, जिसे आसानी से खींचकर बाहर निकाला जा सकता है।
प्रबंधन
भूरा तना मधुआ कीट : वयस्क एवं शिशु किट भूरे रंग का होता है, जो पानी की सतह से ऊपर पौधे के निचले भाग पर रहकर तना से निरंतर रस चूसते रहता है। इसके आक्रमण से जगह-जगह पर चटाईनुमा क्षेत्र बन जाता है जो बाद में पीला हो जाता है, जिसे हॉपरबर्न कहते हैं।
प्रबंधन
सांडा किट : किट का शिशु मक्खी के जैसा होता है जिसका पेट गुलाबी रंग का होता है इसके आक्रमण से पर्यावरण प्याज की पत्ती के जैसा हो जाता है, जिसे सूट कहते हैं।
प्रबंधन
बभनी किट : व्यस्क किट गहरे काले रंग के होते हैं, जो देखने में काली मिर्च जैसा लगता है। व्यस्क कीट पत्ती की हरितिमा को खा जाती है जिससे पतियों पर सामानान्तर सफेद लाइन दिखाई देता है।
प्रबंधन
बकया किट : मादा कीट सफेद रंग की छोटी आकार की होती है। पिल्लू पती की ऊपरी भाग को काटकर दोनों किनारे को जोड़कर नाली बनाता है, तथा उसके अंदर प्रवेश कर पतियों की हरियाली को खा जाता है।
प्रबंधन
पत्र लपेटक : मादा कीट सुनहरे रंग की होती है। पिल्लू पतियों के दोनों किनारे को रेशमी धागे से जोड़कर उसके अंदर रहते हैं। यह कीट पतियों की हरीतीमा को खाता है।
प्रबंधन
गंधी कीट : यह भूरे रंग का लम्बी टांगों वाला दुर्गंधयुक्त कीट है। शिशु एवं व्यसक कीट दुग्धावस्था में धान के दानों में छेदकर उसका दूध चूस लेते हैं , जिसेसे धान खखरी में बदल जाती है।
प्रबंधन
सैनिक कीट : व्यसक कीट मोटा तथा भूरे रंग का होता है, जिसके अग्र पंख पर काले धब्बे होते हैं। पिल्लू शाम में निकलकर पतियों को खाता है। यह दिन में मिट्टी के दरार में छिप जाता है।
प्रबंधन
धान का झोंका रोग : पतियों पर आँख या नाव के आकार के धब्बे बनते हैं। जिसके बीच का भाग राख के रंग का हो जाता हैं जिससे पतियाँ झूलस जाती है।गाँठो पर भी काला - भूरा धब्बा बन जाता है, जो हवा के हल्के झोकों से टूट कर गिर जाता है। रोग का आक्रमण बाली के नीचे ग्रीवा पर होने से प्रभावित बाली में दाना नहीं बनता है।प्रबंधन
पत्र अंगमारी रोग : इस रोग में पत्तियाँ शीर्ष से दोनों किनारे या एक किनारे से सूखती हैं।
प्रबन्धन
सीथ बलाइट : पत्रावरण पर हरे भरे रंग के अनियमित आकार के धब्बे बनते हैं जो देखने में सर्प के केंचुल जैसे लगते हैं।
प्रबंधन
सीथ रॉट : पत्रावरण परअनियमित आकार के भूरे - काले धब्बे बनते हैं, जिसके कारण बाली पत्रावरण के अंदर ही सड़ जाती है।
प्रबंधन
पत्रलांछन (भूरा धब्बा) : पत्तियों में टिकुली के सके मान जहां - तहाँ भूरे रंग की चित्ती बन जाती है। रोग का आक्रमण बढ़ने पर कई धब्बे आपस में मिलकर पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं।
प्रबंधन
फाल्स स्मट : बाली निकलने के समय कुछ दाने गोल बड़े आकार के मखमली हरे - पीले रंग के हो जाते हैं जो बाद में काले पड़ जाते हैं।
प्रबंधन
धान की खेती का खर्च एवं आय प्रति हेक्टर का ब्योरा
बीज, बिचड़, उगाने खेत की तैयारी
वर्मी कंपोस्ट इत्यादि, खेत का कदवा करने का खर्च
उर्वरक, वर्मी कंपोस्ट इत्यादि
बिचड़ा उखाड़ने एवं रोपाई मजदूरी
कोनो वीडर का मजदूरी
पटवन
पौधा संरक्षण
कटाई मढ़ाई
कुल खर्च
1600.00 रुपए
4500.00 रुपए
4850.00 रुपए
6000.00 रुपए
2500.00 रुपए
7500.00 रुपए
2000.00 रुपए
5500.00 रुपए
34450.00 रुपए
ऊपज = 70 क्विंटल दर 1100 / क्विंटल = 77000 रुपए
शुध्द आय = 77000 - 34450 = 42550 रुपए
"देहाती खेती" एक स्मार्ट फार्मिंग टेक्नोलॉजी प्लेटफार्म है, जाहाँ पर खेती-किसानी से जुड़ी हर जानकारी, आधुनिक तकनीक, और ग्रामीण विकास के उपायों को समर्पित है। हमारा उद्देश्य है किसानों को शिक्षित करना, उनकी आय बढ़ाना, और गांवों को समृद्ध बनाना। देहाती खेती का लक्ष्य भारतीय किसानों को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाना है।
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