खरीफ की दलहनी फसलों में उड़द का काफी योगदान है।यह लगभग देश के सभी राज्यों में उगायी जाने वाली फसल है।इसमें प्रोटीन की मात्रा काफी अधिक पायी जाती है। दाल के अतिरिक्त इसका उपयोग दूसरे पकवानों में भी बनाने में किया जाता है। उड़द फसल भी मृदा-क्षरण को रोकने में सहायक होती है। साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में लाभदायक सिद्ध हुई है।
जलवायु : उड़द की खेती के लिए शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। इसी लिए इसे खरीफ में बोया जाता है। इस समय की जलवायु इसके उत्पादन के लिए अनुकूल होती है।
भूमि : उड़द की खेती के लिए बलुई दोमट से दोमट भूमि जिसमें कार्बनिक पदार्थो की प्रचुरता हो उत्तम पायी गयी है। लावणीय एवं क्षारीय भूमि उड़द खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती। साथ ही भूमि में जल निकास की पर्याप्त सुविधा होनी चाहिए।
खेत की तैयारी : उड़द की खेती के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए। इसके बाद दो जुताई कल्टीवेटर अथवा देशी हल से करते है। खेत की जुताई से पूर्व खेत से पूर्व के फसलों के अवशेषों एवं खर-पतवारों को निकाल अलग कर लेनी चाहिए। प्रत्येक जताई के बाद पाटा आवश्य लगाये। इससे खेत समतल एवं मिट्टी भूरभूरी हो जाती है।
उन्नत प्रभेद : उड़द की कई प्रभेद हैं, जिसमें से रोगरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए अथवा अपनी आवश्यकतानुसार स्थानीय वैज्ञानिकों की सलाह पर निम्न प्रभेदों में से किसी भी प्रभेद का चयन कर सकते हैं।
बीजदर : खरीफ में 12-15 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। जायद में बीज की मात्रा थोड़ी अधिक लगती है। इसके लिए स्थानीय वैज्ञानिकों से सलाह ले सकते हैं।
बीजोपचार : बोज बुवाई के लगभग 24 घंटे पूर्व ढाई ग्राम कार्बेन्डाजिम फफूंदनाशी दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। इसके बाद राईजोबियम कल्चर एवं पी.एस.बी. से उपचारित करना चाहिए। इससे रोग का नियंत्रण होता है और उत्पादन अच्छा होता है।
बीज की बुवाई : उड़द की बुवाई पंक्ति में करना चाहिए, इसके लिए खरीफ फसल में पंक्ति से पंक्ति 30 सेमी. और पौधे से पौधे 5 सेमी. की दूरी रखें एवं जायद फसल के लिए पंक्ति से पंक्ति 25 सेमी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 5 सेमी. रखनी चाहिए।
पोषक तत्व प्रबर्धन : उड़द की खेती में रसायनिक उर्वरकों की काफी कम आवश्यकता होती है। फिर भी अच्छे उत्पादन के लिए 15 किलोग्राम नेत्रजन एवं 40 किलोग्राम स्फूर की आवश्यकता होती है। उर्वरकों की पूरी मात्रा बुवाई से पूर्व खेत में सामान्य रूप से बिखेर कर मिट्टी में मिला देनी चाहिए।
सिंचाई प्रबंधन : खरीफ फसल में सिंचाई की कोई आवश्यकता नहीं होती है। फिर भी यदि नमी की कमी महसूस हो तो हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। जायद फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें।
खरपतवार प्रबंधन : खेत को खरपतवार से मुक्त रखना अत्यंत ही आवश्यक है। क्योंकि खरपतवार से उसे प्रति स्पर्धा बढ़ती है और पोषक तत्व को खरपतवार शीघ्र ग्रहण कर लेते हैं। जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। इसके लिए सबसे बेहतर होता है कि बुवाई के 20-25 दिनों के बाद निराई-गुड़ाई कर खेत से निकालना चाहिए अथवा बासालीन 2 लीटर दवा 800-1000 पानी में घोल बनाकर बीज बुवाई से पूर्व खेत में छिड़काव कर देनी चाहिए।
पौधा संरक्षण : उड़द में पीत चितेरी एवं पीत मोजेक रोग का प्रकोप होता है। खेत में एक भीपौधों जैसे ही दिखे तुरंत उसे खेत से उखाड उसे नष्ट कर दें। तुरंत मेटासिस्टक्स नामक दवा 1.5 लीटर प्रति हेक्टर की दर से 600-800 पानी में घोल कर पन्द्रह दिनों के अन्तराल पर छिड़काव करनी चाहिए। इससे बचाव हेतु रोग रोधी किस्म जैसे पत्ते उड़द 30 की खेती करें देसी उड़द के किस्म में इस रोग का प्रकोप ज्यादा होता है। पत्र मुड़न रोग एवं पत्र कंचन रोग के लक्षण दिखने पर भी उपरोक्त दवा का छिड़काव करनी चाहिए।
फसल की कटाई : उड़द की फलियाँ लगभग एक साथ पकती हैं। पकने की अवस्था में फलियों का रंग काला हो जाता है एवं पौधे पीले पड जाते हैं। ऐसी अवस्था में पूरी फसल को एक साथ कटाई कर लेनी चाहिए।
उपज : वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर लगभग 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त होता है।
खेत की तैयारी, बीज एवं बुआई खर्च
उर्वरक, खरपतवार नियंत्रण
पौधा संरक्षण
कटाई-मढ़ाई
कुलखर्च
5860.00 रुपये
4500.00 रुपये
1000.00 रुपये
5500.00 रुपये
उपज = 9 क्विंटल दर 3400/क्विंटल = 30,600.00 रुपये
शुद्ध आय = 30600 - 16860 = 13740 रुपये
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