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मशरूम का इतिहास

मशरुम का परिचय

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मशरूम एक सरल निम्न वर्गीय वनस्पति है जिसे फफूंद या फंगस कहा जाता है।इसमें पर्णहरित या क्लोरोफिल का पूर्ण अभाव होता है। ये अपने भोजन का निर्माण स्वतः नहीं करते हैं इसलिए इन्हें उगने व वृद्धि करने के लिए सूर्य के प्रकाश की जरूरत नहीं होती है। ये अपना भोज्य पदार्थ सड़ी-गली पुरानी लकड़ियों, मवेशियों के खाद्य पदार्थ (पुआल, भूसा आदि), मृत जानवरों, गोबर व कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त करते हैं।

मशरूम को विभिन्न देशों एवं जगहों पर भिन्न-भिन्न नामों से जानते हैं जैसे कठफुला, कुसुम्पा, खुम्बी, गोबरछत्ता, डोंगरी, धरती के फूल, क्षत्रक, भूमि कवक, पफबाल्स, टोड स्टूल, भूमिकवक, कुसुम्बी और परियों के भोजन आदि।

मशरूम एक मांसल एवं बीजाणुयुक्त फलकाय होता है, जो फफूंद वनस्पति वर्ग से सम्बन्धित है। इन्हें थैलोफाइट्स कहा जाता है अर्थात् इनमें फूल, पत्ती व तना नहीं पाया जाता है।

प्रोटीन की कमी सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है जिसकी आवश्यकता की पूर्ति हेतु वैकल्पिक खाद्य की खोज जारी है। मशरूम पोषक तत्वों का एक सघन व उत्तम स्स्रोत है। अधिकांश हरी सब्जियों की अपेक्षाकृत अधिक पोषक गुणों वाला होता है। इसमें चटपटें स्वाद व सुगंध के कारण लोग इन्हें खूब चाव से खाना पसन्द करते हैं। मशरूम अमरीका, चीन, जापान एवं यूरोप में बड़े शौक से खाया जाता है। वैज्ञानिक खोजों व परिष्कृत तरीकों के आधार पर खाया जाने वाला मशरूम एवं विषैले मशरूम दोनों प्रकार के होते हैं।

ईसा से लगभग 1000 वर्ष पूर्व सर्वप्रथम चीन में आरीकुलेरिया जाति के मशरूम को खाने की परम्परा थी।

सन् 1650 में एगैरिकस बिस्पोरस (Agaricus bisporus) की खेती का वर्णन फ्रांस के इतिहास में मिलता है।

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तकरीबन 300 वर्ष पूर्व भूसे पर उगने वाला स्ट्रा मशरूम वोलवैरियल्ला (Volvariella) की प्रमुख प्रजातियों की खेती चीन में किए जाने के प्रमाण मिलते हैं।

सन् 1886 में एम.डब्ल्यू, न्यूटन द्वारा मशरूम की कुछ प्रजातियों का विकास भारत में किया गया।

सन् 1963 में सतत् अनुसंधान के फलस्वरूप धान की भूसी के माध्यम से मशरूम पैदा करने के लिए कोयम्बटूर में प्रयोग किए गए।

सन् 1961 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के द्वारा आयोजित हिमाचल प्रदेश के कृषि विभाग में जिनेवा के मशरूम पर चर्चा हुई जिसमें विशेषज्ञ के तौर पर डॉ. मेटल व डॉ. हेज की गरिमामय उपस्थित लोकप्रिय थी।

वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व में लगभग 2000 खाये जाने वाले मशरूम की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से लगभग 180 प्रजातियाँ जो लगभग 70 वंशों से सम्बन्धित हैं, भारत में पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त मशरूम की अनेक प्रजातियाँ भारत के आदिवासी इलाकों एवं हिमालय के निचले पहाड़ी एवं मैदानी क्षेत्रों में भी पाई जाती हैं, जो उक्त प्रजातियों में सम्मिलित नहीं हैं।

मशरूम की खेती करने के लिये अधिक क्षेत्रफल, उपजाऊ भूमि, सूर्य प्रकाश, हवा एवं विभिन्न कृषि सम्बन्धी कर्षण क्रियाओं आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसे बंद कमरों, बरामदों, कच्चे-पक्के मकानों, झुग्गी-झोपड़ियों और खंडहरों से लेकर अति आधुनिक वातानुकूलित कमरों में उगाया जा सकता है। मशरूम की उपज प्रति इकाई क्षेत्रफल में अन फसलों की तुलना में काफी अधिक होती है। मशरूम उत्पादन लाभदायक व्यवसाय एवं विदेशी मुद्रा अर्जित करने का सशक्त साधन और गरीबों के लिये अतिरिक्त आय देने वाला कुटीर उद्योग है जिसकी हमारे देश को आवश्यकता है।

खाये जाने वाले फफूंद के फलकाय को सरल भाषा में मशरूम कहा जाता है। यह फलकाय मांसल एवं बीजाणुयुक्त होता है। अन्य फफूंदी की भाँति इसमें पर्ण हरित का पूर्ण अभाव होता है और पोषण के लिये अन्य जीवों द्वारा बनाये गये भोजन पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिये यह मृतोपजीवी पदार्थों पर अकेले अथवा अन्य जीवों के साथ सहजीवी के रूप में उगता है। इसके बीजाणु अनुकूल वातावरण में अंकुरित होकर कवक जाल बनाते हैं जो भूमिगत अवस्था में पड़ा रहता है। विभिन्न प्रजातियों में मशरूम का आकार भिन्न-भिन्न होता है। सफेद बटन मशरूम (Agaricus bisporus) प्रजाति में फलकाय गोलाकार बटन के रूप में तथा स्ट्रा मशरूम वालवेरियल्ला प्रजाति में अण्डाकार आकार में विकसित होकर अन्ततः छोटे परिपक्व खुले हुए फलकाय अर्थात् बैसिडियोकार्प में विकसित होता है। परिपक्व एवं खुले हुये मशरूम की तुलना में खाने हेतु बहुधा नये, कोमल, अपरिपक्व बटन और अण्डे के आकार के मशरूम प्रयोग में लाये जाते हैं। ढिंगरी या प्लूरोटस (Pleurotus) प्रजाति का आकार सीप या घोंधे जैसा होने के कारण उसे ओयस्टर मशरूम (Oyster mushroom) के नाम से जाना जाता है। यह फैला हुआ होता है। जिसके किनारे मुड़े हुए होते हैं।

मशरूम के संबंध में प्रमुख तथ्य : 

  • मशरूम फलकाय युक्त फफूंद होता है जो राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में खाद्य पदार्थ के रूप में लोकप्रिय हैं।
  • मशरूम शब्द का अर्थ केवल खाये जाने वाला मशरूम होता है। अखाद्य मशरूम को विषैला मशरूम अथवा टोडस्टूल कहा जाता है। टोडस्टूल (toadstool) शब्द मशरूम के विशेष संरचना वाले फफूँद के लिए प्रयोग किया जाता है। जिसका अर्थ छतरी के आकार का छोटा कुकरमुत्ता होता है, जो छत्रक समतल लिए होता हैं तथा खाये जाए वाले मशरूम से भिन्न होता है।
  • एगैरीकस के विभिन्न प्रजातियों को मूलतः मशरूम का नाम दिया गया था जो ग्रीक शब्द एग्रीकान (Agricon) से लिया गया है और जिसका अर्थ मशरूम होता है।
  • मशरूम विश्व में सभी देशों, रेगिस्तानों, जंगलों, चारागाहों, बर्फीले पहाड़ों, खेती योग्य जमीनों और खाली पड़ी जमीनों आदि सभी जगहों पर उगता हुआ पाया जाता है।
  • पुराने जंगलों, बड़े-बड़े चरागाहों, वर्षों से खाली पड़ी जमीन अथवा घास के मैदानों में वृत्ताकार आकार में सूखी घास की पंक्तियाँ दिखाई पड़ती हैं। मशरूम की कुछ प्रजातियाँ तो अपने आप उगती हैं, वे पोषण के खोज में धीरे-धीरे बढ़ती हैं। जैसे-जैसे जमीन का पोषण समाप्त होता जाता है वहाँ की धास सूखती जाती है तथा मशरूम पोषण का तलाश करता हुआ आगे बढ़ता जाता है। इस प्रकार गोलाकार आकार की रचना बन जाती हैं। इस रचना को लोग फेरी रिंग्स कहते हैं। मशरूम की प्रजाति मैरसमिअस ओरीडीज (Mareasmius oreades) को फैरीरिंग्स कहा जाता हैं।
  • मशरूम को पफबाल (Puffball) भी कहा जाता है जो मुख्यतः जमीन के अन्दर पाया जाता है। यह यूरोप, अमेरिका एवं कुछ अन्य देशों में खाने हेतु प्रयोग में लाया जाता है। खाये जाने वाले पफबाल्स कोमल, बाहर से सफेद तथा काटने पर अन्दर क्रीम जैसा होना चाहिए। यदि अंदर का रंग काला भूरा अथवा पीला हो, तो इसे नहीं खाना चाहिए। पफबाल्स की आंतरिक संरचना सामान्य आकार वाली होनी चाहिए। बहतु छोटा पफबाल्स खाने योग्य नहीं माना जाता। भारत में पफबाल्स को खाने का प्रचलन विशेष नहीं है। लाइको परडान परलैटम (Lycoperdon perlatum) तथा लाइक्रोपरडान हिमैली (L. himali) खाई जाने वाली पफबाल की प्रजाति हैं।

मशरूम का इतिहास

वनस्पति विज्ञान के अध्ययन प्रक्रिया के दौरान यह ज्ञात हो चुका है कि क्रमिक विकास की प्रक्रिया में सबसे पहले शैवाल (काई) बना और उसके पीछे-पीछे कवक। कवकों का अध्ययन वनस्पति विज्ञान की शाखा माइकोलॉजी के अन्तर्गत किया जाता है। इसमें माइक (Myke) शब्द का अर्थ है, टोपी जैसी रचना होती हैं। स्पष्टतः कवक के बहुत बड़े समूह जिसमें मशरूम शामिल है, इसकी रचना एक डांलीनुमा डंठल पर गुम्बद जैसी आकृति बनी होती है।

वैदिक साहित्य में हम सोमरस का वर्णन पाते हैं जो एक स्फूर्ति प्रदायक पेय पदार्थ था। जिसे आर्य लोग धार्मिक कार्यों में देवताओं को समर्पित करते थे पता चलता है कि यह पेय पदार्थ मशरूम की एक प्रजाति एमैनिटा मस्कैरिया (Amanita muscaria) के रस से निर्मित होता था। ग्वाटेमाला देश में प्रागैतिहासिक गुफाओं के दीवारों में मशरूम के चित्र देखी जा सकती हैं। मेसोपोटामिया सभ्यता के देवी-देवताओं को अर्पित की जाने वाली सामग्री में मशरूम को अहम् स्थान प्राप्त होता था। इस तथ्य की पुष्टि नक्काशी व शिल्प कलाएं करती हैं। प्राचीन सभ्यताओं में मशरूम से मिलती-जुलती है अनेक शोभकारी आकृतियाँ देखी जाती थी। बल्गारिया के कुछ डाक टिकटों पर मशरूम के चित्र देखने को मिलते हैं। पौराणिक यूरोप के सभी भागों में मशरूम को राजशाही विलासिता की वस्तुओं में अहम् स्थान प्राप्त था।

रोमन इतिहासकार पिनि द्वारा लिखित प्राकृतिक विज्ञान में लिखा जाता है कि मशरूम की दो प्रजातियाँ एमेनिटा सीसेरिया (Amanita Caesarea) और बोलिटस एल्यूडीज (Boletus aereus) इतनी अधिक स्वादिष्ट मानी जाती थी कि इनको खाने के लिए अमूल्य धातुओं की तश्तरियों में परोसा जाता था। अकेले रोम में ही नहीं बल्कि यूरोप के सभी भागों में समाज में उच्चतम श्रेणी के लोगों ने मशरूम को विलासिता की वस्तुओं में शामिल कररखा था। मध्ययुगीन (1100 ई.-1400 ई.) इस महाद्वीप में एक विलक्षण कानून संहिता थी, जिससे सामन्तशाही वर्ग को शामिल किया जाता था। इन कानूनों के अन्तर्गत घरेलू जानवरों का चलना-फिरना नियन्त्रित किया जाता था। मशरूम को उन दिनों में उच्च खाद्य पदार्थ माना जाता था और हो सकता है इसकी पैदावार भी ली जाती रही हो, लेकिन इसका लिखित प्रमाण नहीं मिलता है। मशरूम की खेती के बारे में फ्राँस के महान सम्राट लुई चौदहवें (1638 ई. 1715 ई.) के शासन काल में शुरु हुआ लेकिन वहाँ पहला वैज्ञानिक साहित्य टर्नीफोर्ट (Turnifort) द्वारा लिखा गया जो 1707 ई. में प्रकाशित हुआ। उसके पहले मशरूम संवर्धन तथा वृद्धि के बारे में ज्ञान तब हुआ जब बगीचे में डालने एक लिए चावल के पुआल को सड़ा कर खाद बनाने कार्य किया जा रहा था। पौधों के अवशेषों के ढेरों पर कई आकर्षक प्रकार के मशरूम उग जाते हैं। बाद में फ्राँस के मशरूम विशेषज्ञों ने संवर्धन के तरीके निकाले जिनका अनुसरण आज भी सतत् जारी हैं।

बीसवीं शताब्दी में लोग प्राकृतिक रूप से उगी हुई मशरूम के डंडों को एकत्रित कर अन्य देशों जैसे अमेरिका, डेनमार्क तथा आस्ट्रेलिया को निर्यात किया करते थे। मेटरोकोट और कॉन्टन्टाइन (1894 ई.) ने इस क्षेत्र में शोध कार्य करके मशरूम संवर्धन में आने वाली बाधाओं को दूर किया। सबसे पहले उन्होंने ला मोल माईकोगोना पेरनी सियोसद्ध नाम रोग की रोकथाम के लिए गंधक धूम्र को काम में लिया। दूसरी बात यह थी कि, उन्होंने मशरूम के बीजाणुओं के अंकुरण के बाद उस पर अंडे बनाए जिनसे वैज्ञानिक तरीके से मशरूम की खेती को बढ़ावा मिला। हांलाकि इस तकनीक का पेटेन्ट करवा लिया गया था लेकिन पूर्ण वाणिज्यिक उपयोग नहीं लिया गया।

सन् 1902 में मिस गरगूसन क्रोन ने बीजाणुओं के अंकुरण की तकनीक को विस्तार से समझाया। उन्होंने बींजांकुरण से विकसित कवक जाल का संवर्धन करके, अमेरिका में मशरूम बीज (स्पान) उत्पादन हेतु अनेक कंपनियाँ स्थान उत्पादन करने लगी। सन् 1905 ई. में में अमेरिकन वैज्ञानिक दुग्गड़ इ ने मशरूम कोशिकाओं से निलंबन शुद्ध कोशिका/संवर्धन विधि का आविष्कार किया। तुरन्त मशरूम की पैदावार लेने के इच्छुकों में इस तकनीक ने खलबली मचा दी क्योंकि इस तकनीक से किसी भी विशेष प्रजाति के शुद्ध अंडे तैयार किए जा सकते हैं। इस कार्य ने मशरूम की खेती को विकसित राष्ट्रों में इसे एक उद्योग का दर्जा दिलवा दिया।

यू.एस.ए. में सन् 1915 में मशरूम उत्पादन हेतु मशरूम गृह में शेल्फ विधि प्रयोग में लाया जाने लगा।

प्लूरोटस प्रजाति के मशरूम को सर्वप्रथम प्लैक नामक वैज्ञानिक ने 1917 में पेड़ों के टुकड़ों, टहनियों एवं पेड़ों के दूठों पर उगना प्रारम्भ किया।

सन् 1918 में अमेरिका के लम्बर्ट ने काँच के मर्तबानों में विशुद्ध संवर्द्धित अंडे पैदा कर मशरूम उगाने वालों को बेचना शुरू कर दिया। इस तकनीक के अन्तर्गत पहले अंडों को वन्धकरण अवस्था में अंकुरित किया गया और बाद में घोड़ों की लीद से बनेएवं निर्जर्म किए गए खाद से भरे काँच के पात्रों में डाल दिया जाता था। बीसवीं सदी के चौथे दशक में मशरूम उगाने के लिए उपयुक्त एक हरित पौधशाला को विकसित किया जिसमें वर्ष के सभी महीनों में इनकी पौध विकसित की जा सके। इसके लिए आर्द्रता, तापमान और उपयुक्त वायु गमन पर आवश्यकतानुसार नियन्त्रण का प्रावधान किया गया। कम्पोस्ट को भुरभुरा और दानेदार बनाने में जिप्सम के महत्त्व को फ्रांसिसी किसान अच्छी तरह जानते थे। सन् 1929 में एक बैसीडियो बीजाणु द्वारा मशरूम बीज (स्थान) उत्पादन कार्य विधि की खोज लैम्बर्ट नामक वैज्ञानिक ने किया।

पिगर (1936 ई.) ने कम्पोस्ट बनाने में जिप्सम को अतिआवश्यक माना, क्योंकि कवकजाल की तीव्र गति से वृद्धि को उत्तेजित करने में जिप्सम योगदान देती है। सिन्डेन (Sinden) ने वर्ष 1932 ई. में डिम्बन बनाने में कणों का उपयोग बताया और इस तकनीक का पेटेन्ट करवा लिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अमेरिका के कृषि विभाग ने यह प्रचारित किया कि मशरूम पौषक तत्वों से सरोबार है और साथ ही साथ भूमि, खाद एवं सिंचाई की आवश्यकता में अन्य प्रमुख शाक-सब्जियों की प्रतिस्पर्धा है। सदी के मध्य तक इंग्लैण्ड और आयरलैण्ड में मशरूम उत्पादकों का संघ बन गया था। इसे मशरूम की खेती में आने वाले समस्याओं के समाधान हेतु शोधकार्य के लिए नेशनल फार्मर्स यूनियन की एक विशिष्ट शाखा स्थापित की गई। लैम्बर्ट (1941) ने परीक्षणों के दौरान यह पाया कि मशरूम कम्पोस्ट हेतु ऑक्सीजन की उपस्थिति एवं 50-60°C तापक्रम बनाने की अल्प-काल वाली विधि के उपयोग का वर्णन किया। मशरूम कृषि उद्योग को बढ़ावा देने के लिए उच्च कोटि की पुस्तकों और पत्रिकाओं का प्रकाशन किया गया। बाद में पोलीथीन थौलियों में मशरूम उगाने की तकनीक का आविष्कार हुआ जो घरेलू खेती करने वालों में काफी प्रचलित हैं।

मशरूम उत्पादन का इतिहास भारतीय परिवेश में

भारत में भी मशरूम लोग प्रारम्भ से ही खाते रहे हैं, लेकिन इसके प्रति विशेष रुझान कुछ सीमित लोगों तक ही सीमित रहा। यूरोप, चीन एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी खपत को देखते हुए भारत में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई। आज हमारे देश में इसका वार्षिक उत्पादन लगभग 55,000 मैट्रिक टन है।

सन् 1986 में एन.डब्लू. न्यूटन ने भारतीय कृषि एवं उद्यान विज्ञान सोसाइटी के वार्षिक प्रदर्शनी के अवसर पर खाये जाने वाले मशरूम (एगैरीकस) के उपयोगिता पर प्रकाश डाला।

राय, बी.सी. 1896 ने गुफाओं एवं सुरंगों में एकत्रित किये गये मशरूम का रासायनिक विश्लेषण किया तथा इसके पोषक तत्त्वों के बारे में लोगों को बताया।

सन् 1908 में सर डैविड पेन ने विभिन्न खाये जाने वाले मशरूम के पहचान का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया।

सन् 1939 से 1945 के मध्य मशरूम विशेषज्ञ थामस एवं उनके सह कार्यकर्ताओं ने स्ट्रामशरूम वोलवेरिल्ला की खेती के बारे में लोगों को जानकारी दी।

सन् 1961 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के सहयोग से हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा "हिमाचल प्रदेश में मशरूम की खेती का विकास" नामक परियोजना सोलन में प्रारम्भ की गई।

सन् 1964 में केन्द्रीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली और जम्मू एवं काश्मीर सरकार के सहयोग से श्रीनगर में सफेद बटन मशरूम एगैरीकस का उत्पादन प्रारम्भ किया गया।

मैन्टेल एवं डब्लू.ए. हेयेज (1965-1974) ने मशरूम के व्यावसायिक उत्पादन सम्बन्धी परामर्श दिया। उन्होंने सफेद बटन मशरूम के लिये कम्पोस्ट निर्माण की उन्नति विधि, कम्पोस्ट निर्माण सामग्री एवं केसिंग सॉयल आदि के बारे में प्रदर्शन एवं जानकारी उपलब्ध कराई। उन्होंने मशरूम गृह निर्माण, कृत्रिम वातावरण निर्माण, नमी की मात्रा सम्बन्धी अनेक जानकारी एवं विधियों का निर्देशन किया।

सन् 1977 में उद्यान विज्ञान विभाग हिमाचल प्रदेश सरकार ने यू.एन. डी.पी. के आधीन एक मशरूम विकास प्रोजेक्ट प्रारम्भ किया। जहाँ मशरूम पर गहन शोध किया जा रहा है।

सन् 1982 में छठी पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (I.C.A.R.) के सहयोग से सोलन में "नेशनल सेंटर फॉर मशरूम रिसर्च एण्ड ट्रेनिंग" की स्थापना की गई। इस केन्द्र पर मशरूम उत्पादन के विभिन्न पहलुओं पर शोध कार्य किया जा रहा है तथा वैज्ञानिकों, शिक्षकों एवं प्रसार कार्यकर्ताओं को मशरूम उत्पादन, संरक्षण एवं उपयोग सम्बन्धी प्रशिक्षण भी दिया जाता रहा है।

सन् 1983 में आल इंडिया कोआर्डर्डीनेटेड मशरूम इम्पूवमेंट प्रोजेक्ट नामक परियोजना को भारतीय कृषि अनुसन्धान नई दिल्ली ने स्वीकृति प्रदान की। इस परियोजना का मुख्यालय सोलन में स्थापित किया गया। मशरूम पर शोध एवं विकास के उद्देश्य से भारत सरकार ने विभिन्न स्थानों पर छः केन्द्र स्थापित किये गये हैं जो गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना (पंजाब), तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयम्बटूर, वी.सी. कृषि विश्वविद्यालय, कल्यानी (पश्चिमी बंगाल), एम.पी. कृषि विश्वविद्यालय, पुणे (महाराष्ट्र), चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर (उ.प्र) में स्थित हैं। इन केन्द्रों पर कृषि शोध एवं विकास के अतिरिक्त उत्पादकों को अल्पकालीन प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई हैं।

वर्तमान समय में मशरूम विषयक शोध कार्य भारत के महत्त्वपूर्ण केन्द्रों में नेशनल सेंटर फॉर मशरूम रिसर्च एण्ड ट्रेनिंग, आई.सी.ए. आर. चम्बाघाट, सोलन (हिमाचल प्रदेश), डिवीजन ऑफ माइकॉलोजी एण्ड प्लांट पैथालॉजी, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली, इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ हॉर्टीकल्चरल रिसर्च, हेसारघट्टा, बंगलौर (कर्नाटक), आई.सी.ए.आर. रिसर्च कॉम्प्लेक्स, नार्थ इस्टर्नहिल्स, शिलांग (अरूणाचल प्रदेश); डिपार्टमेंट ऑफ माइकोलोजी, एण्ड प्लाट पैथोलॉजी, डॉ. वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टीकल्चर एण्ड फोरेस्ट्री, सोलन (हिमांचल प्रदेश), पंजाब एग्रीकल्चरल यूनीवर्सिटी लुधियाना (पंजाब), तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, कोयम्बैटूर; गोविन्द बल्लभ पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एण्ड टेक्नॉलोजी, पंतनगर (उत्तरांचल), इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.); वी.सी. कृषि विश्वविद्यालय कल्यानी (पश्चिम बंगाल), महात्मा फूले यूनिवर्सिटी आफ एग्रीकल्चर पुणे (महाराष्ट्र); रीजनल रिसर्च लैबोरेटरी, कौंसिल ऑफ साइण्टिफिक एण्ड इण्डस्ट्रियल रिसर्च, श्रीनगर (जम्मू एण्ड कश्मीर), कृषि विभाग, जम्मू एण्ड काश्मीर गवर्नमेंट, लाल मण्डी, श्रीनगर (जम्मू एण्ड कश्मीर) और चन्द्रशेखर आजाद यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एण्ड टेक्नोलॉजी, कानपुर (उ.प्र.) के नाम प्रमुख हैं।

उपरोक्त केन्द्रों के अलावा मशरूम के उत्पादन एवं गुणवत्ता में वृद्धि हेतु निरन्तर शोध कार्य अनेक कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि एवं उद्यान विज्ञान विभागों तथा कृषि विज्ञान केन्द्रों पर किये जा रहे हैं।

वैश्विक परिवेश में मशरूम उत्पादन का इतिहास

मशरूम को सबसे अधिक जर्मनी में खाया जाता है इसके बाद नीदरलैण्ड में फिर क्रमशः कनाडा, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, स्वीडन, यू.एस.ए. एवं इटली में उपभोग किया जाता है।

भारत वर्ष में सबसे अधिक उत्पादन पंजाब तत्पश्चात क्रमानुसार तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में होता है। सम्पूर्ण मशरूम उत्पादन का 85% सफेद बटन मशरूम (एगैरीकस स्पेसीज) उसके बाद ओयस्टर मशरूम (Oyster mushroom) और फिर स्ट्रा मशरूम (Volvariella species) का उत्पादन होता है।

विश्व में खाये जाने वाले मशरूम का लगभग 98 प्रतिशत उत्पादन छः प्रमुख मशरूम जैसे एगैरीकस (Agaricus species), खोलवेरेल्ला (Volvoriella species), फ्लैमुलिना (Flamulina species), आरीकुलैरिया (Auricularia species), लेन्टीनस इण्डोडीज (Lentinus edodes) एवं प्लूरोटस (Pleurotus species) द्वारा पूर्ण होता है।

सफेद बटन मशरूम एगैरीकस (Agaricus species) की प्रजातियों का सबसे अधिक उत्पादन करने वाले 5 प्रमुख देश फ्रांस, चीन, नीदरलैण्ड, यूनाइटेड किंगडम एवं ताइवान प्रमुख हैं।

विश्व के विभिन्न देशों में उत्पादित मशरूम में लैण्टीनस इडोडीज (Lentinus edodes) का उत्पादन में दूसरा स्थान है। सफेद बटन मशरूम (एगैरीकस) का सर्वप्रथम उत्पादन फ्रांस और लैण्टीनस इडोडीज का चीन में प्रारम्भ हुआ, परन्तु इसका पूर्ण विकास जापान में हुआ। लम्बे अंतराल तक लैण्टीनस इडोडीज का उत्पादन एशियाई देशों तक सीमित था, लेकिन विभिन्न देशों में आसानी से उपलब्ध विभिन्न प्रकार के अधः स्तर इसके खेती के लिये उपयुक्त पाये जाने के कारण इस प्रजाति की खेती एशिया से बाहर विशेष रूपसे की जा रही है।

स्ट्रा मशरूम (वोल्वेरेल्ला वोलवैसिया) जिसका उत्पादन उच्च तापक्रम पर सफलतापूर्वक किया जाता है, इसका विश्व में तीसरा स्थान है। इस मशरूम के कवक जाल वृद्धि 32°C-35°C तापक्रम पर फलकाय के निर्माण हेतु 28°C-32°C तापक्रम की आवश्यकता होती है।

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