रबी चारे की बरसीम प्रमुख फसल है और यह दुधारू जानवर के लिए काफी पौष्टिक चारा है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 20 प्रतिशत होती है एवं इसमें काफी मात्रा में कैल्शियम एवं फास्फोरस पाया जाता है। इसकी खेती करने से मिट्टी की रासायनिक, जैविक एवं भौतिक संरचना में काफी सुधार होता है। रासायनिक गुणों से मृदा के नेत्रजन, आर्गेनिक कार्बन एवं उपलब्ध स्फूर की मात्रा में बढ़ोतरी होती है। बरसीम की खेती करने से मिट्टी की कड़ी परत ढीली होती है और उपयोगी सूक्ष्म जीवों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि होती है।
जलवायु : बरसीम उत्पादन हेतु ठंडे एवं शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है। इसके बीजों के अंकुरण के समय औसत तापक्रम 25 डिग्री से. होना चाहिए। इसकी सबसे अच्छी बढ़वार 18 से 21 डिग्री सें. तापमान पर होती है।
भूमि : इसकी खेती हरेक प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। परन्तु हल्की बलुई मिट्टी में इस फसल की बढ़वार ठीक से नहीं हो पाती है। अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली माध्यम दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। इसकी खेती क्षारीय मिट्टी में भी की जा सकती है, अम्लीय मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है।
खेत की तैयारी : खेत से पुरानी फसलों के अवशेष एवं खरपतवारों को निकाल कर अलग कर दें। इसके बाद एक गहरी जुताई एवं दो-तीन जूताई कल्टीवेटर से करना चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाए जिससे मिट्टी भुरभुरी एवं खेत समतल हो जाय। इसी समय सिंचाई सुविधा हेतु खेत को क्यारियों में बाँट दें।
उन्नत प्रभेद : बरसीम के प्रभेदों में मेस्कावी, बरसीम लुधियाना-1, खादरावी, छिन्दवारा, वरदान, बुन्देल वरसीम 2, 3 पूसा जाईट एवं टी-678 प्रमुख है। इन प्रभेदों में मेस्कावी पालारोधी है। पूसा विकास एक अच्छी किस्म है।
बीज उपचार : बुवाई के पहले बीज को कार्बेन्डाजिम दवा की 02 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज की दर से बीज को उपचारित कर बुवाई करें। बुवाई से पहले बीज को 5 प्रतिशत नमक के घोल में डाला जाता है जिससे कसानी घास के बीज हल्का होने के चलते तैरने लगते हैं। उसे निकाल कर अलग कर लें। इसके बाद बीज को तीन-चार बार साफ जल से धो लेना चाहिए ताकि नमक का अंश बीज में नहीं रहे। बरसीम बीज को उचित राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर लेना चाहिए।
बीज की बुवाई : खेत की तैयारी अच्छी तरह से करके महीन बीजस्थली बनाते हैं। बीजस्थली की सूखी एवं गीली विधि में से कोई अपना कर बीज स्थली में बीज डालें। गीली विधि ज्यादा अच्छी मानी जाती है क्योंकि इसमें ज्यादा अंकुरण की संभावना रहती है।
बीज दर एवं समय : यदि पहली बार खेत में बरसीम लगायी जा रही हो, तो 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से 15 अक्टूबर से 31 अक्टूबर के मध्य बुवाई कर देनी चाहिए। यदि देर से या पहले बुवाई की गयी हो तो 35-40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से देना होगा। बरसीम एक दलहनी फसल है जो वायुमंडल से नेत्रजन लेकर सिमबायोटिक बैक्टोरिया द्वारा मृदा में स्थापित करता है, लेकिन प्रारम्भ काल में नेत्रजन की हल्की मात्रा देना आवश्यक हो जाता है।
पोषक तत्व प्रबंधन : अच्छी उपज हेतु 15 टन कम्पोस्ट के साथ खेत की तैयारी करते समय ही 45-55 किलोग्राम युरिया एवं तीन क्विंटल से साढे तीन क्विंटल सिंगल सुपर फॉस्फेट प्रति हेक्टेयर एवं म्यूरेट आफ पोटाश 50 किलो बवाई से पूर्व खेत में डाल देनी चाहिए।
सिंचाई प्रबंधन : पहली सिंचाई बुवाई के बाद अंकुरण हो जाने पर करनी चाहिए। उसके बाद दो-तीन सिंचाई एक सप्ताह के अन्तराल पर करनी चाहिए। जनवरी-फरवरी के अन्त तक 12-15 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करें। मार्च से मई तक दस-दस दिनों पर सिंचाई करें। प्रत्येक सिंचाई में पांच सेमी. से ज्यादा पानी नहीं देना चाहिए।
पौधा संरक्षण : बरसीम में कीट-व्याधि का प्रकोप काफी कम पाया जाता है कुछ प्रमुख कोट एवं बीमारियों का नियंत्रण निम्न प्रकार कर सकते हैं।
फसल कटाई : जब फसल 50-55 दिनों का हो जाय तब प्रथम कटाई करनी चाहिए। इसके बाद की कटाई 25-35 दिनों के अन्तराल पर करनी चाहिए। यह मिट्टी की उर्वरा शक्ति एवं बढ़ोतरी दर तथा वायुमण्डल के तापक्रम आदि पर निर्भर करती है। जब पुनः वृद्धि होकर फसल 30 सेमी. ऊँचाई का हो जाये तब कटाई करनी चाहिए। बीजोत्पादन हेतु फसल कटाई मार्च महीने के मध्य से बंद कर देनी चाहिए। प्रायः तीन कटिंग के बाद फसल को बीजोत्पादन हेतु छोड़ देना चाहिए। यदि चार कटाई के बाद फसल को बीजोत्पादन हेतु छोड़ा जाये तो उपज में काफी कमी होने के अलावे बीजों के जीवित रहने की क्षमता में भी भारी कमी आ जाती है। बीज फसल की हल्की सिंचाई फूल आने तक जरूरत पड़ने पर कर दी जानी चाहिए। फूल आने से बीज धारण तक के समय में मिट्टी में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।
बीज फसल की कटाई : बीज फसल मई के अन्त तक पक जाती है। फसल डंडे से पीट कर या बैल चलवा कर दौनी कर तैयार की जाती है।
उपज : बीजोत्पादन करने पर 3-4 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है।
उपज हराचारा - 600-800 क्विंटल/हेक्टेयर
बीज, खेत की तैयारी, बीज एवं बुआई खर्च
उर्वरक प्रबंधन खर्च
सिंचाई 7
पौधा संरक्षण
कटाई खर्च (हराचारा)
बीज हेतु फसल कटाई-मढ़ाई
कुल खर्च
11800.00 रुपये
2800.00 रुपये
14000.00 रुपये
1500.00 रुपये
3500.00 रुपये
4500.00 रुपये
38,100.00 रुपये
उपज दाना - बीज 4 क्विं. x दर 4000 रु./क्विं = 16000.00 रुपये
हरा चारा 400 क्विंटल दर 200 रु. क्विंटल = 80,000.00 रुपये
(शहर में बिकता है) कुल आय = 96,000.00 रुपये
शुद्ध आय = 96000 - 38,100 = 57,900 रुपये
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