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मूँग की खेती

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मूँग, खरीफ एवं जायद की एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। इसमें 25 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है, इसके दाल के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में प्रयोग किया जाता है। साथ ही इसके अंकुरित दानों को लोग सलाद में काफी पसन्द करते हैं। इसमें विटामिन 'सी' की प्रचुर मात्रा होती है, इसके अतिरिक्त रिवोफ्लोविन एवं थायमिन पाया जाता है। जिससे यह पौष्टिक नास्ता के रूप में माना गया है। पशुचारा के रूप में मूँग के पौधों का उपयोग किया जाता है, जिससे दुधारू पशुओं में दूध की मात्रा बढ़ जाती है। साथ ही मृदाक्षरण को रोकने में सहायक पाया गया है और मिट्टी की जैविक, भौतिक एवं रसायनिक गुणों में काफी वृद्धि होती है। इसे हरी खाद के रूप में भी उपयोग में लाया जाता है।

जलवायु : इसकी खेती के लिए गर्म एवं नमी युक्त जलवायु की आवश्यकता होती है। खरीफ एवं जायद मौसम मूँग की खेती के लिए अनुकूल होती है।

भूमि : इसके खेती के लिए सभी प्रकार की मिट्टी उपयुक्त पायी गयी है। परन्तु दोमट से बलुई दोमट भूमि जिसमें कार्बनिक पदार्थों की प्रचुरता हो में उत्पादनकाफी अच्छा होता है। लावणीय एवं क्षारीय मिट्टी में इसकी खेती संभव नहीं है।

खेत की तैयारी : मूँग की खेती के लिए दो से तीन जुताई की आवश्यकता होती है, प्रयास यह होनी चाहिए कि पहली जताई मिट्टी पलटने वाले हल से करे इसके बाद की जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाना चाहिए, इससे मिट्टी भुरभुरी एवं खेत समतल बन जाता है। खेत की तैयारी के समय लगभग 60 से 70 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद खेत में बिखेर कर मिट्टी में मिला देना चाहिए।

उन्नत प्रभेद : इसकी कई प्रभेद विकसित हुई है, स्थानीय जलवायु के अनुसार वैज्ञानिकों की सलाह पर प्रभेद का चयन करना चाहिए।

  • पूसा विशाल : यह 70 से 75 दिनों पर तैयार होने वाली प्रभेद हैं जिसका दाना बड़ा होता है। यह रोग रोधी किस्म है जिसमें पीत चितेरी रोग का प्रकोप नहीं होता है। इसकी उपज 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह जायद की प्रभेद है, इसकी बुवाई पूरे मार्च महीने में की जा सकती है।
  • पूसा वैसाखी : यह 60 से 65 दिनों में तैयार होने वाली प्रभेद है जिससे 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टर उपज प्राप्त होती है। इसे भी पूरे मार्च महीने तक बुवाई की जा सकती है।
  • सोना : यह भी 60 से 65 दिनों की फसल है जो 9 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टर उपज देने वाली प्रभेद है। इसकी 80 प्रतिशत फलियाँ एक ही बार में पक जाती है। इसकी बुवाई 15 मार्च से 10 अप्रैल तक में की जा सकती है।
  • पी.एस.-१६ : यह किस्म 70 से 75 दिनों में तैयार होती है तथा 10 से 12 क्विंटल उपज प्रति हेक्टर मिलती है, इसकी बुवाई मार्च महीने में की जा सकती है।
  • सम्राट : यह 60 से 65 दिनों की प्रभेद है, उपज क्षमता 12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टर होता है, इसमें पीला मोजैक विषाणु रोग नहीं लगता है। इसकी बुवाई 15 मार्च से 10 अप्रैल तक की जाती है।
  • एस.एम.एल.-६६८ : यह भी 60 से 65 दिनों की प्रभेद है जिससे उपज 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टर होती है। यह बड़े दानों वाला प्रजाति है, इसकी बुवाई 15 मार्च से 10 अप्रैल तक की जा सकती है। यह पीला मोजैक रोग रोधी किस्म है यह गेहू के बाद बुवाई हेतु उपयुक्त प्रभेद है।

बीजदर : छोटे दाने वाली प्रभेद के लिए 20 से 25 किलोग्राम एवं बड़े दाने के लिए 30 से 35 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है।

बीजोपचार : बीज बुवाई के लगभग 24 घंटे पूर्व 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम फफूंदनाशी दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। इसके बाद राईजोबियम कल्चर एवं पी.एस.बी. से उपचारित करें। उत्पादन अच्छा होता है।

बीज की बुवाई : बीज की बुवाई कतार में करनी चाहिए, बीज की बुवाई के लिए पंक्ति से पंक्ति 30 सेमी. और पौधे से पौधे की दूरी 5 सेमी. रखनी चाहिए, बीज की बुवाई कूँड़ में करें।

पोषक तत्व प्रबंधन : मूँग चूँकि दलहनी फसल है इसलिए इसमें नेत्रजन की मात्रा की कम आवश्यकता होती है। लगभग 20 किलोग्राम नेत्रजन, 40 से 50 किलोग्राम स्फूरप्रति हेक्टेयर के लिए आवश्यकता होती है। उर्वरकों की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय एक समान रूप से खेत तैयारी में करनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण : खेत को खरपतवार से मुक्त रखना अत्यंत ही आवश्यकत है, क्योंकि खरपतवार से प्रति स्पर्धा बढ़ती है और पोषक तत्त्व को खरपतवार शीघ्र ग्रहण कर लेते हैं, जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। इसके लिए सबसे बेहतर होता है कि बुवाई के 20-25 दिनों के बाद निराई-गुड़ाई कर खेत से निकालना चाहिए अथवा बासालीन 2 लीटर दवा 800-1000 पानी में घोल बनाकर बीज बुवाई से पूर्व खेत में छिड़काव करना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन : बीज बुवाई के समय खेत में नमी की काफी आवश्यकता होती है। इसलिए बुवाई से पूर्व नमी न होने की दशा में हल्की सिंचाई कर लेनी चाहिए। इसके बाद नमी की कमी महसूस होने पर हल्की सिंचाई करते रहे। फूल एवं फल की अवस्था में सिंचाई नहीं करनी चाहिए।

पौधा संरक्षण : मूंग में पीत चितेरी एवं पीत मोजैक रोग का प्रकोप होता है। खेत में एक भी पौधों ग्रसित जैसे ही दिखे तुरंत उसे खेत से उखाड़ कर नष्ट कर दें। इसके बाद मेटासिस्टाक्स नामक दवा 1.5 लीटर प्रति हेक्टर की दर से 600 से 800 लीटर पानी में घोल कर पन्द्रह दिनों के अन्तराल पर छिड़काव करनी चाहिए।

इससे बचाव हेतु रोग रोधी किस्म जैसे पूसा विशाल की खेती करें देसी मूंग के किस्म में इस रोग का प्रकोप ज्यादा होता है। पत्र मुड़न रोग एवं पत्र कुंचन रोग के लक्षण दिखने पर भी उपरोक्त दवा का छिड़काव करनी चाहिए।

  • पत्र धब्बा रोग : इसमें छोटे एवं गोल धब्बे बैगनी लाल रंग लिए पाया जाता है। बाद में यह धब्बा भूरा रंग केन्द्र के रूप में दिखता है। इसका प्रकोप होने पर मैकोजेब नामक दवा का 2.5 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से 800 से 1000 लीटर पानी मेंघोलकर छिड़काव करें। जरूरत पड़ने पर 10 से 12 दिनों बाद पुनः छिड़काव करें।
  • जेसिड एवं हॉपर : गरमा मूंग में जेसिड एवं हॉपर का प्रकोप कभी-कभी पाया जाता है। यदि इसका प्रकोप दिखे तब एसीफेट 1.0 किलोग्राम या मोनोक्रोटोफॉस 1.5 लीटर प्रति हेक्टर की दर से 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए, इससे इन कीटों का नियंत्रण हो जाता है। जब कीटों से ज्यादा क्षति के आसार दिखे तब ही दवा का छिड़काव करें।

फली की तुड़ाई : मूंग की फलियाँ एक बार में नहीं पकती, जब फलियों पकने की अवस्था में प्रतीत हो तब हाथ से उनकी तुड़ाई कर लेनी चाहिए। यह लगभग दो-तीन बार करनी पड़ती है।

उपज : विभिन्न प्रभेदों से 12 से 14 क्विंटल उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है।

मूँग की खेतीका आय-व्यय एवं मुनाफा ब्योरा प्रति हेक्टेयर (2020- 21 के अनुसार)

खेत की तैयारी, बीज एवं बुआई खर्च
उर्वरक, खरपतवार नियंत्रण
पौधा संरक्षण
कटाई एवं मढ़ाई
कुलखर्च

5860.00 रुपये
4500.00 रुपये
1000.00 रुपये
5500.00 रुपये
16,860.00 रुपये

उपज = 9 क्विंटल x दर 4600/क्विंटल = 41400.00 रुपये
शुद्ध आय 41400 - 16860  = 24540.00 रुपये

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