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तुलसी की खेती

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भारत में तुलसी का पौधा धार्मिक एवं औषधीय महत्व का है। तुलसी की ओसिमम बेसीलीकम प्रजाति को तेल उत्पादन के लिए उगाया जाता है। तुलसी की इस प्रजाति की भारत में बड़े पैमाने पर खेती होती है। इसका उपयोग परफ्युम, तेल एवं सूखी पत्तियों के लिए किया जाता है। इस प्रजाति के तेल की अधिक कीमत होती है, किन्तु तेल की मात्रा कम मिलती है। 'श्री तुलसी' इसे श्यामा तुलसी भी कहते हैं। यह अत्यधिक औषधीय उपयोग का पौधा है जिसकी महत्ता पुरानी चिकित्सा पद्धति एवं आधुनिक चिकित्सा पद्धति दोनों में है।

जलवायु :
इसके लिए उष्ण कटिबंध एवं शीतोष्ण कटिबंधीय दोनों तरह की जलवायु उपयुक्त होती है। देश के सभी क्षेत्रों की जलवायु अनुकूल पाई गई है।

भूमि :
इसकी खेती कम उपजाऊ जमीन जिसमें पानी की निकासी का उचित प्रबन्ध हो, अच्छी होती है। बलुई दोमट जमीन इसके लिए बहुत उपयुक्त पाई गई है।

खेत की तैयारी :
इसकी खेती के लिए एक गहरी एवं दो हल्की जुताई की आवश्यकता होती है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और शेष कल्टीवेटर से करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाना चाहिए जिससे मिट्टी भुरभुरी एवं खेत समतल बन जाय। इसी समय खेत को क्यारियों में बाँट लिया जाता है जिससे सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई में सुविधा हो सके।

उन्नत प्रभेद :
तुलसी की विश्व में 150 से ज्यादा प्रजातियाँ पाई जाती है। इसकी मूल प्रकृति एवं गुण एक समान है, जिसमें निम्न प्रमुख प्रजातियाँ है। स्वीट फ्रेंच बेसिल, कर्पूर तुलसी, काली (श्याम) तुलसी, वन तुलसी, राम तुलसी, जंगली तुलसी।

बीज दर :
एक हेक्टेयर खेत में पौध रोपाई के लिए 750 से 1 किग्रा बीज की आवश्यकता होती है। बीज की सीधी बुआई नहीं करनी चाहिए, पौधशाला में पौधा तैयार कर ही रोपाई करें।

पौधशाला प्रबंधन :
किसी ऊँचे स्थान को जो जल स्रोत के नजदीक हो पौधशाला हेतु चयनकरना चाहिए। लगभग । मीटर चौड़ी एवं 3 मीटर लम्बी तथा 6 सेंमी उठी हुई क्यारी बनाएँ।सर्वप्रक्रीम खरपतवार एवं पुरानी फसलों के अवशेष को निकाल कर अलग करें। इसके बाद कुदाल एवं फावड़े की सहायता से अच्छी तरह से मिट्टी की खुदाई करें और मिट्टी को भुरभुरी बनाएँ, इसी समय यदि कंकड़ पत्थर है, तो उसे पौधशाला से बाहर निकालें। गोबर की सड़ी खाद पर्याप्त मात्रा में पौधशाला में समान रूप से बिखेर कर मिट्टी में भलिभांति मिलाएँ।

सिंचाई प्रबंधन :
वर्षा ऋतु को छोड़कर अन्य मौसम में आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए। नमी के आभाव में पौधों का विकास नहीं हो पाता।

खरपतवार नियंत्रण:
इसकी पहली निराई-गुड़ाई रोपाई के एक माह बाद करनी चाहिए। दूसरी निराई-गुड़ाई पहली निराई के 3 से 4 सप्ताह बाद करनी चाहिए। खरपतवार की उपस्थिति में पौधों का विकास नहीं होपाता और तेल की मात्रा घट जाती है।

पोषक तत्व प्रबंधन :
तुलसी की अच्छी पैदावार के लिए 20 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद जमीन में डालना चाहिए। इसके अतिरिक्त 80 किग्रा. नत्रजन 40 किग्रा. फास्फोरस एवं 40 किग्रा पोटाश की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। रोपाई के पहले एक तिहाई नेत्रजन तथा फास्फोरस व पोटाश को पूरी मात्रा खेत में डालकर जमीन में मिला देना चाहिए। शेष नेत्रजन की मात्रा दो बार में खड़ी फसल में डालना चाहिए।

कटाई :
जब पौधे में पूरी तरह से फूल आ जाय तथा नीचे के पत्ते पीले पड़ने लगे तब इसकी कटाई कर लेनी चाहिए। रोपाई के 10 से 12 सप्ताह के बाद यह कटाई के लिए तैयार हो जाती है।

उपज :
फसल को औसत पैदावार 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर तथा तेल की पैदावार 80 से 100 किग्रा. प्रति हेक्टेयर पाया जाता है।

Table Example

तुलसी की खेती में प्रति हेक्टेयर आय व्यय का आकलन (वर्ष 2020-21 के अनुसार)

क्र. स. विवरण मात्रा दर राशि (रु०)
1 खेत की तैयारी एवं रेखांकनः
(क) ट्रैक्टर द्वारा जुताई 8 घंटा 450/ घंटा 3600.00
(ख) रेखांकन हेतु कार्यबल 20 कार्यबल 275 कार्यबल 5500.00
2. बीज एवं बुआई/रोपाई:
(क) बीज 27778 पौधों 2/ पौधों 55556.00
(ख) बीजोपचार (फफूंदनाशी/कीटनाशी रसायन) 500/ ग्रा. 500/ कि.ग्रा. 250.00
(ग) बुआई / रोपाई 15 कार्यबल 275/ कार्यबल 4125.00
3 खाद एवं उर्वरकः
(क) गोबर कि सड़ी खादः 15 टन 500/ टन 7500.00
(ख) नत्रजन 50 किग्रा. 13.80 किग्रा. 690.00
(ग) स्फूर 40 किग्रा. 50 किग्रा. 2000.00
(घ) पोटाश 30 किग्रा. 24.50 किग्रा. 735.00
(ङ) खाद एवं उर्वरक के व्यवहार 6 कार्यबल 275/ कार्यबल 1650.00
4 सिंचाई 02 बार 1000/ कार्यबल 2000.00
5 निकाई-गुड़ाई 20 कार्यबल 275/ कार्यबल 5500.00
6 खर-पतवार नियंत्रण (रसायन का व्यवहार) 3000.00
7 पौधा संरक्षण 4000.00
8 फसल की खुदाई, दुलाई एवं बाज़ार व्यवस्था 30 कार्यबल 275/ कार्यबल 8250.00
9 भूमि का किराया 10000/ वर्ष 2500.00
10 अन्य लागत
11 कुल व्यय : 106856.00 रुपये
कुल ऊपज: 25 टन हरबेज
कुल आय (रूपये): 375000.00 रुपये
शुद्ध आय (रूपये): 268144.00 रुपये
बिक्री दर 15000 रुपये प्रति टन
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