+Add Row
Hindi Translator

मशरूम की बिमारियाँ एवं प्रबन्धन्

WhatsApp Share WhatsApp पर शेयर करें

मशरूम "कवक (Fungus)" की एक विशिष्ट प्रजाति है। जिसे हम बोलचाल की भाषा में खुम्बी, छत्तरी या कुकुरमुत्ता कहते हैं। खाने योग्य (Edible), गुद्देदार (Fleshy) कवक को मशरूम तथा आखाद्य जहरीली गुद्देदार कवक को टोडस्टुल्स कहते हैं।

मशरूम की सफल खेती में कुछ जीवित कारक जैसे कवक, जीवाणु, विषाणु एवं कीट तथा कुछ अजीवित कारक जैसे पानी, तापक्रम, अपेक्षित आर्द्रता जो मशरूम की उपज एवं उसकी गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करते हैं। मशरूम की उपज एवं गुणवत्ता में कमी का मुख्य कारण मशरूम की फसल में विभिन्न रोगों का संक्रमण है। जो कि उपरोक्त जीवित कारकों द्वारा होते हैं। मशरूम के मुख्य कवक जनित, जीवाणु जनित, विषाणु जनित तथा अजीवित कारकों द्वारा उत्पन्न होने वाले रोग निम्नवत हैं -

(क) कवक जनित रोग 

1. मृदुगलन या काब बेव रोग या जाली रोग :  

पहचान/लक्षण:

केसिंग मृदा के ऊपर छोटे गोल एवं सफेद चकते बनते हैं जो धीरे-धीरे केसिंग मृदा के ऊपर रूई की तरह बढ़कर मशरूम (फलनकाय) को भी पूरी तरह ढक देता हैं इस प्रकार परजीवी कवक द्वारा घेरा/ढका हुआ संक्रमित मशरूम भूरे अथवा गुलाबी भूरे रंग का होकर सड़ जाता है।

रोग कारक:
यह रोग हाइपोमाइसीज रोजिलस अथवा डिक्टिलियम डेन्डोआईडिज प्रर्याय-क्लाडोवोट्राइयम डेन्डोआइडेज नामक कवक है।

अनुकूल पर्यावरण :
अधिक तापमान एवं नमी इस रोग के लिए अनुकूल पर्यावरण स्थितियां हैं। केसिंग मृदा में कवक द्वारा संक्रमण होने पर यह रोग फैलता है। मशरूम तोड़ते समय असावधानीवश पीछे छूट गये मशरूम के टुकड़ों से यह रोग अधिक तीव्रता से फैलता है।

प्रवन्धन: 

  • मशरूम कक्ष की आपेक्षित आर्द्रता एवं तापक्रम रोग का संक्रमण होने पर कम रखनी चाहिए।
  • मशरूम तोड़ने के पश्चात् मशरूम के बचे हुए तने/दुकड़ों को तथा सड़े मत्तरूम को निकाल दें।
  • निजीकृत आवरण मृदा को ही उपयोग में लायें।
  • कारबेन्डाजिम 0.05 प्रतिशत की दर से या वेन्डामाइजोल 0.05 प्रतिशत की दर से या मैकोजब 0.2 प्रतिशत की दर से घोल बनाकर केसिंग करने के 7 दिन के पश्चात् स्प्रे करें।
  • कैल्सियम होड्पोक्लोराइट 70 प्रतिशत के घोल को रोगी स्थानों पर डालने से रोग की व्यापकता में कमी आती है।

2.  वेट बबल या माइकोगोन रोग : 

पहचान/लक्षण:
 रोगजनक का संक्रमण यदि खुम्ब कलिकाएं बनते समय होता है तो खुम्ब का आकार टेढ़ा-मेढ़ा हो जाता है और खुम्ब विकृति नजर आते हैं। लेकिन जब तना बनने के बाद संक्रमण होता है तो तना मोटा हो जाता है और टोपी भी विकृति हो जाती है। कई बार खुम्ब के ऊपर सफेद रूई के समान फफूंद उग जाता है और धीरे-धीरे इसका रंग भूरा हो जाता है, जिसके कारण खुम्ब सड़ जाता है और दुर्गन्ध पैदा करता है। सड़े हुए खुम्ब से अथवा खुम्ब के सड़े भागों से भूरा तरल पदार्थ इक‌ट्ठा होने लगता है और नमी की अधिकता में टपकने लगता है। शुष्क दशा में सूखा सड़ने के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। आवरण मृदा की सतह पर कवक वृद्धि सफेद पदार्थ के रूप में दिखाई पड़ती है।

रोग का कारक :
 यह रोग माइकोगोन पर्निसिओसा नामक कवक से होता है।

अनुकूल पर्यावरण :
रोगजनक कवक मृदावासी है जो क्लेमाइडो बीजाणु के रूप में 3 वर्ष तक उत्तरजीवी बना रहता है नये स्थानों पर रोगजनक/रोग का संक्रमण संदूषित आवरण मृदा के द्वारा होता है। उत्पादन कक्ष में रोग का फैलाव मशरूम पर स्थित रोगजनक बीजाणुओं द्वारा होता है, जो हवा, पानी, मक्खी एवं कीट द्वारा फैलते हैं।
प्रबन्धन :

  • स्वच्छ, रोगरहित या निजर्मीकृत आवरण मृदा को उपयोग में लायें।
  • आवरण मृदा (केसिंग मिट्टी) को भाप द्वारा 54.4 डिग्री सेल्सियस पर 15 मिनट तक उपचार करने से उसके उपरान्त प्रयोग में लाने से इस रोग को रोका जा सकता है।
  • खुम्ब उत्पादन के समय संक्रमित वैगों को प्लास्टिक से ढकने से इस रोग के फैलाव/विस्तार को कम किया जा सकता है।
  • केसिंग के तुरन्त बाद और उसके नौवें दिन बाद कारवेन्डाजिम या वेनलेट या विनोभाईल या स्वोरगोन (स्पोरटेक) का ०.४ प्रतिशत फार्मलीन के छिड़काव करें।
  • खुम्ब को मक्खियों से बचाये रखें।

3.  ड्राई बवल या भूरा दाग या वर्टिसिलियम रोग : 
पहचान या लक्षण:
इस रोग का प्रभाव दो माह पुरानी फसल पर सबसे ज्यादा होता है। रोग संक्रमण के करीब 2-3 सप्ताह के अन्दर पूरी फसल नष्ट हो जाती है। रोग के लक्षण सर्वप्रथम आवरण मृदापर रोग जनक के कवक तंतु सफेद या पीले भूरे रूप में दिखाई पड़ते है। यदि रोगजनक का संक्रमण मशरूम वृद्धि की प्रारम्भिक अवस्था में होता है व रोगी मशरूम की बढ़वार रूक जाती है। परन्तु यदि इसके बाद रोग जनक का संक्रमण होता है तो खुम्ब की टोपी पर छोटे-छोटे भूरे धब्बे दिखाई देते है। बाद में कई धब्बे मिलकर बड़े भूरे रंग के कुछ धंसे हुए से दिखाई पड़ते है। मशरूम अथवा मशरूम का तना फटने लगता है। टोपी की आकृति बिगड़ कर एक ओर झुक जाती है।

रोग कारक :
यह रोग वर्टिसिलियम फंजाइकोला नामक कवक से होता है।

अनुकूल पर्यावरण :
रोग जनक कवक के बीजाणु नमीयुक्त मृदा में वर्ष तक उत्तरजीवी बने रहते हैं। रोगजनक का संक्रमण संदूषित आवरण मृदा के द्वारा होता है। उत्पादन कक्ष में रोग का फैलाव हवा, अत्याधिक नमी, संदूषित यंत्रों, श्रमिकों के हाथों व कपड़ों एवं मक्खियों के माध्यम से होता है। मशरूम की तोड़ाई में देरी करने से यह रोग और फैलता है।

प्रवन्धन :

  • स्वच्छ / रोगरहित या निजर्मीकृत आवरण मृदा को उपयोग में लायें।
  • अन्य सभी उपाय वेट बबल प्रबन्धन के अनुसार करें।
  • खुम्ब उत्पादन के समय संक्रमित वैगों को प्लास्टिक से ढकने से इस रोग के फैलाव/विस्तार को कम किया जा सकता है।
  • केसिंग के तुरन्त बाद और उसके नौवें दिन बाद काबेन्डेजिम 0.05 प्रतिशत एवं 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।
  • केसिंग के बाद 0.8 प्रतिशत फार्मलीन से छिड़काव करें।
  • खड़ी फसल पर कारबेन्डाजिम 0.05 प्रतिशत या डाइनेथ एम-45. 0.2 प्रतिशत के घोल का छिड़काव करें।
  • फसल समाप्त होने के बाद खाद को उत्पादन केन्द्र के पास गत फेंके।

4.  ट्रफल रोग
पहचान व लक्षण:
रोग के प्रारम्भिक लक्षण कम्पोस्ट एवं आवरण मृदा पर दिखाई पड़ते है प्रारम्भ में इस रोगजनक की वृद्धि सफेद रंग की खुम्ब कलिकाओं के समान दिखाई पड़ती है जो बाद में क्रीम पीली हो जाती है। समयानुसार कवक तन्तु मोटे होने लगते हैं जो एक ठोस, सिकुडे हुए गोल या अनियमित आकार की संरचना बनाते है जिसे एस्कोकार्प कहते हैं। एस्कोकार्प परिपक्व होने पर गुलाबी एवं सूखने पर लाल हो जाते हैं। बाद में ये फटकर चूर्ण के रूप में बिखर जाते हैं। तथा इसमें से क्लोरीन की तरह गंध आती है। अन्त में रोगजनक के कारण मशरूम की बढ़वार रूक जाती है और कम्पोस्ट का रंग हल्का भूरा हो जाता है।

रोग का कारक : यह रोग डाईक्लिओमाइसीज माइक्रोस्पोरस नामक कवक से होता है।

अनुकूल पर्यावरण: यह कवक एस्कस बीजाणु या कवकतन्तु के रूप में उत्तरजीवी बना रहता है। रोग का संक्रमण मुख्यतः आवरण मृदा द्वारा होता है। 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान होने पर रोग के लक्षण आने लगते हैं।

प्रबन्धन :

  • कम्पोस्ट बनाने हेतु पक्की फर्श को ही प्रयोग में लायें।
  • कम्पोस्ट निजर्मीकृत अवश्य करें।
  • आवरण मृदा निजर्मीकृत करने के उपरान्त ही प्रयोग में लायें।
  • फसल लगी होने पर उत्पादन कक्ष का तापमान 18 डिग्री सेल्सियस के नीचे रखें।
  • रोगी भागों (कम्पोस्ट / आवरण मृदा) तथा 2 प्रतिशत फार्मलीन का छिड़काव करें।
  • रोग लक्षण प्रकट होते ही कार्बोन्डाजिम 0.05 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।

5.  हरी फफूंद या ट्राइकोडर्मा रोग : 

पहचान/लक्षण :
 इस रोग के लक्षण आवरण मृदा पर, कम्पोस्ट पर, स्पान की बोतलों में या बैगों में, स्पानिंग के बाद बीजों पर हरे रंग की कवक वृद्धि के रूप में दिखाई पड़ते हैं। रोगजनक की अन्य प्रजातियों द्वारा रोग के लक्षण कभी-कभी मशरूम की ऊपरी सतह परगहरे भूरे रंग धब्बे के रूप में दिखाई पड़ते हैं। रोगजनक मशरूम को पूर्णरूप से बका लेता है फलस्वरूप मशरूम मुलायम होकर सड़ने लगता है। बाद में मशरूम के रोगी भाग पर कटकर सूखी दरारे बन जाती है। सम्पूर्ण फसल नष्ट हो जाता है।

रोग कारक :
यह रोग ट्राइकोडर्मा हरजेनियम, ट्राइकोडर्मा विरिडी, ट्राइकोडर्मा, पेनिसिलियम साइक्लोपियम और एसपरजिलरा प्रजाति नामक कवक द्वारा होता है। ये कवक मृदा जनित है।

अनुकूल पर्यावरण :
रोगजनक का संक्रमण संदूषित कम्पोस्ट, आवरण मृदा द्वारा होता है तथा रोगजनक का फैलाव हवा तथा नमी द्वारा होता है। पूर्णतया तैयार कम्पोस्ट को प्रयोग में न लाने पर यह रोग और फैलाता है।

प्रबन्धन :

  • आवरण मृदा, कम्पोस्ट पूर्णतया निजीकृत करके ही प्रयोग में लाये। साथ ही कम्पोस्ट पूर्णतया सड़ी हुई ही उपयोग में लायें।
  • मरे हुए खुम्बों को निकालकर फेंक दें।
  • रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही कार्बन्डाजिम 0.05 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।

6.  भूरा मोल्ड या ब्राउन प्लास्टर मोल्ड
पहचान या लक्षण:
स्पान मिलाये हुए कम्पोस्ट पर या आवरण मृदा पर आटे के समान सफेद गोले घेरे दिखाई देते हैं जो बाद में भूरे रंग के हो जाते हैं।

रोग का कारक : यह रोग पेपुलास्पोरा वाइसिना नामक कवक द्वारा होता है।

अनुकूल पर्यावरण: कम्पोस्ट में स्पानिग करते समय अत्यधिक नमी का होना, स्पान रन के समय तापमान 28 से 30 डिग्री सेल्सियस का होना, खड़ी फसल में उत्पादन कक्ष का तापमान 18 डिग्री सेल्सियस से अधिक होना रोग के फैलाव में सहायक है।

प्रबन्धन :

  • निर्जीवीकृत कम्पोस्ट एवं आवरण मृदा को उपयोग में लायें।
  • कम्पोस्ट में पर्याप्त मात्रा में जिप्सम मिलाना चाहिए एवं अधिक मात्रा में पानी न डालें।
  • पीक हीटिंग से पहले व बाद में कम्पोस्ट ज्यादा गीला न हो।
  • स्पानिंग करते समय कम्पोस्ट में नमी 60-65 प्रतिशत से अधिक न हो।
  • रोग ग्रसित भागों को हटाकर उस पर 2 प्रतिशत फार्मलीन या 0.05 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम घोल का छिड़काव करें।

7.  सफेद प्लास्टर मोल्ड
पहचान या लक्षण:
आरम्भिक अवस्था में कम्पोस्ट या केसिंग मृदा पर आटे की तरह सफेद जाल चकतों के रूप में दिखाई देता है और अन्त तक सफेद ही बना रहता है।

रोग कारक:
यह रोग स्कोपुलेरिओपसिस प्यूमिकोला नाम कवक द्वारा होता है।

अनुकूल पर्यावरण:
कम्पोस्ट का पी.एच. 8 से अधिक होने पर यह रोग तेजी से फैलता है।

प्रबन्धन :

  • कम्पोस्ट को तैयार करते समय पानी व जिप्सम की उचित मात्रा मिलाएँ।
  • कम्पोस्ट से अमोनिया की गना नहीं आनी चाहिए।
  • कम्पोस्ट की पी.एच. 8.0 से कम होना चाहिए।
  • कार्बेन्डाजिम 0.05 प्रतिशत का छिड़काव या बिनोमिल 0.05 प्रतिशत का छिड़‌काव 10 दिन के अन्तराल पर करें।
  • आटे की तरह सफेद जाल की भांति चकत्तों पर फार्मलीन (4 प्रतिशत) लगाने से यह कवक नष्ट हो जाता है।

8.  आलिव ग्रीन मोल्ड
पहचान व लक्षण:
प्रारम्भ में कम्पोस्ट या आवरण मृदा पर बहुत छोटा गेंद की भांति सफेद संरचना बनती है जो अन्त में आलिव ग्रीन रंग में बदल जाती है।

अनुकूल पर्यावरण:
इस रोग का संक्रमण संदूषित कम्पोस्ट या आवरण मृदा द्वारा होता है। कम्पोस्ट बनाते समय ऑक्सीजन की कमी होने पर यह रोग अवश्य फैलता है।

प्रबंधन :

  • स्वच्छ निजर्मीकृत कम्पोस्ट एवं आवरण मृदा को उपयोग में लायें।
  • संक्रमित कम्पोस्ट या केसिंग मृदा को निकाल कर फेंक दें।
  • रोगी भाग पर 2 प्रतिशत फार्मलीन या 0.05 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम के घोल का छिड़काव करें।

9.  पीली फंफूद या यलो मोल्ड
पहबान/लक्षण:

प्रारम्भिक अवस्था में सफेद रंग का कवकजाल कम्पोस्ट पर दिखाई पड़ता है जो बाद में पीले-भूरे रंग में परिवर्तित हो जाता है। यह कम्पोस्ट व केसिंग मृदा के बीच के हिस्से में भी पीले-भूरे रंग का दिखाई पड़ता है। इस रोग के कारण मशरूम उत्पादन में बाधा उत्पन्न होती है।

अनुकूल पर्यावरण:
इस कवक का संक्रमण मुर्गी की साद, केसिंग मृदा व स्पेंट कम्पोस्ट को उचित प्रकार से निर्जगीकृत न करने से आता है।

रोग का कारक :
इस रोग का कारक माइसीलियोक्योरा ज्यूटिया, माइसीलियोपथोरा क्राइसोस्पोरियम, माइसीलिपोपथोरा सल्फ्यूरियम व सेपेडोनियम स्पे. नामक कवक हैं।

प्रबन्धन :

  • केसिंग मृदा का पास्चुरीकरण उचित ढंग से करें। 64 डिग्री सेल्सियम तापमान पर 4 घंटे के लिए केसिंग मृदा पाश्चुरीकरण करने पर कवक मर जाता है।
  • वैनोमिल (400-500 पी.पी.एम.) या ब्लाइटाक्स-50 (400-500 पी.पी.एम.) या कैल्शियम हाइपोक्लोराइट (0.15 प्रतिशत) के घोल का स्प्रे करें।

10.  इंकी कैप रोग
पहचान व लक्षण:
कम्पोस्ट एवं केसिंग मृदा पर मशरूम के स्थान पर लम्बे तने तथा नीली टोपियो वाले मशरूम निकलते हैं और कुछ समय बाद इनकी टोपियां खुलकर फैल जाती है। जिनसे असंख्य बीजाणु निकलकर पूरी कम्पोस्ट को बेकार कर देते हैं। यह अनचाहे मशरूम, कम्पोस्ट से अमोनिया गैस के ठीक प्रकार से न निकलने का संकेत देता है इससे उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और कभी-कभी उत्पादन बिल्कुल ही प्राप्त नहीं होता है।

रोग का कारक :
 यह रोग कोपराइनस लेगोपस, कोपराइनस अट्रामेन्टेरियस, कोपराइवस मिकासियस नामक कवकों द्वारा होता है।

प्रबन्धन :

  • कम्पोस्ट से अमोनिया गैस की गंध समाप्त होने के उपरान्त ही बीजाई करनी चाहिए।
  • केसिंग मृदा बिछाने के पश्चात् डाइथेन जेड-78 के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए।
  • कम्पोस्ट व केसिंग मृदा को पास्चुरीकरण ठीक प्रकार से करें।
  • अनचाहे कवक को, टोपियाँ खुलने के पूर्व ही उखाड़कर मृदा में गाड़ दें।

(ख) जीवाणु जनित रोग

1.  जीवाणु दाग रोग या वैक्टीरियल ब्लाच रोग
पहचान/लक्षण: इस रोग के कारण मशरूम के तनों पर प्रारम्भिक अवस्थाओं में गहरेपीले रंग के धब्बे बनते हैं जो बाद में सुनहरे या चाकलेटी भूरे रंग के हो जाते है ये धब्बे तनों पर 2-3 मि.मी. तक गहरे होते है। जिसके कारण मशरूम ऊतकों से भूरा-पीला सा पानी निकलने लगता है। प्रातः ये धब्बे मशरूम की टोपी पर बटन अवस्था में प्रकट होते है। परन्तु इन्हें मशरूम वृद्धि की किसी भी अवस्था में देखा जा सकता है। कभी-कभी नमी की उपस्थिति में भण्डारित मशरूम पर भी जीवाणु पाये जा सकते हैं। नमी की अधिकता से इन धब्बो का आकार बढ़ना शुरू हो जाता है और अन्त में धब्बे आपस में मिल जाते है तथा मशरूम की टोपी पूरी तरह धब्बों से ढक जाती है। रोगी मशरूम की टोपी टेढ़े-मेढे हो जाते हैं तथा उनकी टोपी फट जाती है प्रारम्भिक अवस्था में कवक का संक्रमण होने पर पिन हेड भूरे होकर बढ़ना बन्द कर देते हैं तथा इनमें चिपचिपा पानी भर जाता है।

रोग कारक : यह रोग स्यूडोमोनास टोलेसाई नामक जीवाणु के कारण होता है।

अनुकूल पर्यावरण:
रोगजनक जीवाणु का संक्रमण कम्पोस्ट, केसिंग मृदा मशरूम उत्पादन में लगे कृषकों, औजारों, मक्खी एवं कीट द्वारा होता है मशरूम की टोपी पर संक्रमण के पश्चात् नमी की उपस्थिति में जीवाणु वृद्धि करता है और यदि मशरूम पर पानी का छिड़काव करने के पश्चात् 3 घण्टे तक नमी बने रहे, तो टोपी एवं तनों को काफी हानि पहुंचाती है। इसके अतिरिक्त अधिक आपेक्षित आर्द्रता पर बाहर से आने वाली हवा कमरों की हवा अपेक्षा अधिक गर्म हो, तो मशरूम सतह पर नमी अधिक होती है फलस्वरूप रोग की व्यापकता बढ़ जाती है।

रोग प्रबन्धन :

  • कम्पोस्ट व आवरण मृदा को अच्छी तरह पास्चुरीकरण करें।
  • कम्पोस्ट व हमेशा पक्के फर्श पर बनाना चाहिए। फर्श को 2 प्रतिशत फार्मलीन घोल से उपचारित कर लेना चाहिए।
  • मशरूम बैगों पर पानी के छिड़काव के पश्चात् मशरूम टोपियों पर से जल्दी पानी सुखाने के लिए उचित संवातन का प्रबन्ध होना चाहिए।
  • रोगग्रस्त खुम्बों को निकालकर ब्लीचिंग पाउडर 0.05 प्रतिशत घोल कर छिड़काव करें इसके अतिरिक्त टेरामाइसीन या स्ट्रप्टोमाइसीन 200 पी.पी.एम. या आक्सीट्रेट्रासाइक्लिन 300 पी.पी.एम. का भी छिड़काव रोग को नियंत्रित करता है।

2.  जिन्जर ब्लाच रोग

पहचान/लक्षण:
इस रोग के लक्षण भूरा दाग रोग के समान ही होता है अन्तर केवल इतना है इसमें अदरक के रंग के धब्बे जी 1-2 मि.मी. गहरे होते हैं, मशरूम के तनों एवं टोपी पर बनते हैं इन अदरक के रंग के धब्बे बाद तक नहीं बदलते हैं और न किसी रंग का मशरूम से पानी निकलता है।

रोग कारक: यह रोग स्युडोमोनास टोलेसाई नाशक जीवणु द्वारा होता है।

अनुकूल पर्यावरण: जीवाणु दाग रोग के समान।

प्रबन्धन: जीवाणु दाग रोग के समान।

(ग)  विषाणु जनित रोग : 
विषाणु जनित रोग लगने पर खुम्ब घने गुच्छे में निकलते हैं। खुम्ब कलिकाएं देर से बनती है। कई सुम्ब कलिकाएं केसिंग परत के अन्दर ही बनती है। सुम्ब मटमैला हो जाता है और इसकी टोपी जल्द ही खुल जाती है। तना लम्बा व कमान की तरह मुड़ जाता है। खुम्ब हुने पर गिर जाता है।

प्रबन्धन :

  • स्वच्छता का ध्यान रखें व स्पान वाइरस रहित उपयोग में लायें।
  • फसल पेटियों/ बैगों को 2 प्रतिशत सोडियम पेन्टाक्लोरोफिनेट व 0.05 प्रतिशत सोडियम कार्बोनेट (सोडा) के मिश्रण से उपचारित करें।
  • फसल समाप्त होने पर फसल कक्ष एवं प्रयोग होने वाले औजारों आदि को उपचारित करें।

कीट प्रबन्धन

अन्य फसलों की भांति खुम्ब को कई प्रकार के कीट क्षति पहुँचाते हैं। मक्खियां, स्प्रिंग टेल्स और माइंट मशरूम की बीजाई से लेकर तुडाई तक किसी भी अवस्था में क्षति पहुँचाते है। इसके अतिरिक्त मशरूम के उत्पादन कक्षों में सही मात्रा में नमी और तापमान रखने की आवश्यकता होती है जो कि मशरूम के कीट-पतंगों के प्रजनन के लिए उपयुक्त है। खुम्ब में निम्नलिखित कीट-पतंगे आते हैं : 

1.  सेसिड मक्खी

सेसिड  मक्खियों बहुत सूक्ष्म होती है। इन्हें इनके छोटे लार्वो की सहायता से पहचाना जा सकता है जो पदरहित, सफेद तथा नारंगी रंग के होते हैं। इनका सिर स्पष्ट नहीं होता, यद्यपि उनके सिर के स्थान पर दो बिन्दु मौजूद होते हैं। सेसिड की प्रजनन क्षमता बहुत तीव्र होती है जिसके फलस्वरूप यह उत्पादन को भारी हानि पहुँचाते है। इसका लार्वा, कवक जाल, डंडों के बाहरी भाग को खा जाते है।

2.  सियारिड मक्खी

ये मशरूम की सर्वाधिक क्षतिकारक मक्खी होती है। यह मक्खी दिखने में मच्छर जैसी होती है। ये प्रायः खाद तथा सड़ती हुई पादप-सामग्रियों में रहती हैं और खुम्ब की गंध से आकर्षित हो कर उत्पादन कक्ष तक पहुँचती है। इसके लार्वा, सफेद, पदरहित 1.8 मि.मी लम्बे मैगट होते हैं जिनमें काला चमकता हुआ मुंडक होता है। यदि इनका आक्रमण प्रारंभिक अवस्था में हो तो ये स्पॉन विस्तार में बाधा डालते हैं। जिसके फलस्वरूप उत्पादन बहुत कम हो जाता है लार्वा खुम्ब की कलिकायें तथा बटनों दोनों को क्षतिग्रसा करते हैं। खाद में प्रत्येक मादा मक्खी लगभग 100-140 अंडे देती हैं।

3.  फोरिड मक्खी

फोरिड एक छोटी 2.3 मि.मी. कूबड़ मुक्त पीठ वाली मक्खी है। इनके लार्यों का रंग सफेद होता है और यह पदरहित होते हैं जिनका रंग भूरा-काला होता है। लार्वा के मुड़क का सिर नुकीला होता है। ये मक्खियों तेज गति से इधर-उधर भागती है। मादा प्रौढ़ मक्खियों बढ़ते हुए खुम्बो की गीले सतहों पर अंड़े देती है। लार्वा खुम्बों के डण्डों पर सुरंग बनाते हैं। खाद में एक मादा लगभग 50 अण्डे देती है।

प्रबंधन और रोकथाम
अग्रिम नियंत्रण विधियाँ

  • साफ-सफाई 
    साफ-सफाई मशरूम उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि उत्पादन कमरों के आस-पास स्पेन्ट कम्पोस्ट की ढेरी नहीं पड़ी हो। खाद बनाने के प्रांगण में खाद बनाने के 24 घंटे पूर्व 2 प्रतिशत फार्मलीन का छिड़काव करना चाहिए।
  • खिड़कियों में जाली लगाना 
     मशरूम की मक्खियाँ बढ़ते हुए कवक जाल की गंध की ओर आकर्षिक होती हैं। मशरूम उत्पादन के समय यह मक्खियाँ उत्पादन कक्षों में प्रवेश करती है। छोटे आकार के कारण इन मक्खियों को 34-40 मेश/सेंमी. आकार के नाईलॉन या तार के जाले से इनके प्रवेश को रोका जा सकता है।
  • जहर का उपयोग
    मक्खियों को नियंत्रित करने के लिए 'बैगोन' को पानी के साथ 1:10 के अनुपात में मिलाकर और उसमें थोड़ी सी चीनी डालकर उत्पादन कक्षों में रखने पर मक्खियों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।
  • चिपचिपी पट्टियां 
    पीले रंग का जीरो वाट का बल्ब दीवार पर लगाने और उसके नीचे पॉलीथीन की शीट में चिपचिपा पदार्थ लगाकर मक्खियों को नियंत्रण किया जा सकता है।

उपचार के तरीके

  • स्पीनिंग के 7 दिन बाद, बेड या बैग में 3 मि.ली. मेलाथियान / 10 लीटर पानी के घोल का छिडकाव करें।
  • फसल में इनका प्रकोप हो तो डाईकलोरोयोस (न्यूवान) की 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव थैलों, पेटियों, दीवारों और फर्श पर करें।
  • उत्पादन के समय मक्खियों के प्रकोप को रोकने के लिए दीवारों और फर्श पर डेसिज 4 मिली/10 लीटर पानी का छिड़काव करें।
  • पूरा उत्पादन लेने के बाद खाद की कक्ष से दूर गड्‌ढे में फेंक कर मोटी मि‌ट्टी की परत से दबा दें।

4.  स्प्रिंग टेल्स : 
स्प्रिंग टेल्स लगभग 0.7-2.25 मि.मी. लम्बा एक सूक्ष्म कीट है जिनके शरीर के दोनों किनारों पर हल्की बैंगनी रंग की पट्टियों होती है। इनके शरीर का रंग मटमैला होता है। इन कीटों के पंख नहीं होते हैं व छेडने पर उछलते हैं। यह खुम्ब के कवक जाल को खाते हैं जिससे खुम्ब कलिकाओं का बढ़ना रूक जाता है तथा खुम्ब के ऊपर छोटे-छोटे गड्डे बना देते हैं। यह कीट बटन खुम्ब से ज्यादा क्षति ढींगरी खुम्ब को पहुंचाते हैं

प्रबन्धन

  • उत्पादन कक्ष व आसपास की जगह की सफाई र
  • फसल फर्श से थोड़ा ऊपर लगाएं।
  • कम्पोस्ट का पास्चूरीकरण ठीक से करें।
  • प्रभावित स्थान को मैलाथियान की 0.05 प्रतिशत घोल से उपचारित करें।

5.  भृंग :
यह एक छोटा सा कीट है जिसका शरीर दो पंखों से ढका रहता है। यह प्रायः भूरे या काले रंग के होते हैं। यह कीट प्रायः ढींगरी खुम्ब को ही नुकसान पहुँचाते है। सुडियो और प्रौढ़ कीट, दोनों ही ढींगरी को खाते है जिससे ढ़गरी में कई आकार के छेद हो जाते हैं एवं बाद में बिल्कुल खत्म हो जाती है।

रोकथाम

  • ढींगरी की तुड़ाई उचित अवस्था में करें।
  • दरवाजे और खिड़कियों में जाली लगाएँ व दरवाजे के नीचे खाली जगह को बन्द कर दें।
  • उत्पादन कक्ष के आसपास ब्लीचिंग पाऊडर का छिड़काव करें।

सूत्रकृमि एवं माईट का प्रबन्धन

अन्य फसलों की भाँति मशरूम में कई प्रकार के सूत्रकृमि एवं माईट हानि पहुँचाते हैं। जो निम्नलिखित है:-

(1) डीटायलेंकस मायसीलीओफेगस

यह सूत्रकृमि मशरूम के मायसीलीयम का रस चुसकर नुकसान पहुँचाता है तथा 13-25 डिग्री सेल्सियस तापक्रम पर अच्छी वृद्धि करता है जो कि खुम्भ के आकार को प्रभावित करती है। यह सूत्रकृमि अत्यधिक तेजी से अपनी जनसंख्या बढ़ा देते हैं और ये 50 सूत्रकृमि मात्र 30 दिनों में अपनी संख्या लगभग एक लाख कर देते है। इस सूत्रकृमि का आर्थिक हानि स्तर केसिंग के समय 3 सूत्राकृमि /100 ग्राम कम्पोस्ट होता है जो कि मात्र 70 दिनों में खुम्ब मायसीलीयम को पूर्ण रूप से नष्ट कर देते हैं। इसी कारण यह खुम्ब की फसल का विश्वभर में सबसे ज्यादा हानिकारक शत्रु है।

(2) ऐफेलेकोआइडस कम्पोस्टीकीला

ऐफेलेंकीआइडस सूत्रकृमि की विभिन्न प्रजातियां मशरूम की फसल में हानि पहुँचाती हैं, परन्तु भारत सहित विश्वभर में ऐफेलेंकोआइडस कम्पोस्टीकीला सबसे महत्वपूर्ण एवं हानिकारक प्रजाति हैं। यह सूत्रकृमि भी बड़ी तेजी से मशरूम मायसीलीयम को खाता है। इसका जीवन चक्र अति लघु (मात्र 3 दिनों/23 डिग्री सेल्सियस) होने के कारण यह अपनी जनसख्या तुरन्त बढ़ा देता है।इस सूत्रकृमि का आर्थिक हानि स्तर सूत्रकृमि /100 ग्राम कम्पोस्ट होता है जो मात्रा 81 दिनों में मशरूम की फसल को पूर्ण रूप से नष्ट कर देते हैं।
रोग लक्षण

  • प्रारंभिक अवस्था में स्पॉन हल्के भूरे रंग बदलने लगते हैं।
  • इसके बाद नायसीलीयम की वृद्धि धीमी हो जाती है तथा इसमें चकते बन जाते है, जहाँ मायसीलीयम वृद्धि नहीं करता।
  • कम्पोस्ट की सतह सिकुड़ने लगती है तथा अंतः उत्पादन कम हो जाता है।
  • खुम्ब अपना पूर्ण आकार नहीं ले पाती।

सूत्रकृमि संक्रमण के कारण :
सूत्रकृमियों का संक्रमण कम्पोस्ट, केसिंग मृदा, गन्दी ट्रे. उपयोग में लिए जाने वाले यंत्रों द्वारा, सिंचित जल द्वारा, सेसिड मक्खी द्वारा तथा मुख्यत: बची हुई कम्पोस्ट के प्रयोग द्वारा होता है।
प्रबन्धन

  • मशरूम /खुम्ब गृह तथा उसके आस-पास के स्थान को साफ रखें तथा 5% फार्मेलिन घोल का छिड़काव कर मक्खी मच्छर इत्यादि न बढ़ने दें।
  • कच्चे फर्श पर कम्पोस्ट न बनाये तथा कम्पोस्ट में मृदा न मिलने दें। इसके लिए सीमेंट के फर्श का प्रयोग करें।
  • उपयोग में आने वाले सभी यंत्रों को 5 प्रतिशत फार्मेलिन से उपचारित कर प्रयोग में लें।
  • केसिग को पूर्णतया निर्जमित करें।
  • सिंचित मिट्टी जल सूत्रकृमि से संक्रमित न हो।
  • कम्पोस्ट में 2-5 प्रतिशत सुखी नीम की पत्तियाँ मिलावें जो कि सूत्रकृमियों के वृद्विगुणन को रोकने में सहायक होती है।
  • मशरूम की फसल में कीटनाशकों का प्रयोग वर्जित हैं क्योंकि खुम्ब कीटनाशकों के प्रति बड़ी सहिष्णु होती हैं तथा कीटनाशकों का प्रभावसीधा खुम्ब पर होता है। यदि सूत्रकृमियों का प्रकोप आर्थिक हानि स्तर से अधिक होता है तब थाओनाजीन का 30 पीपीएम को कम्पोस्ट में प्रयोग कर सूत्रकृमियों का प्रभाव कम किया जा सकता है।

माइटस (टारसोनेमस माइसीजियोफेगस)

पहचान के लक्षण :

  • माइटस का रंग हल्का भूरा, चमकीला तथा इनका आकार अति सूक्ष्म होता है।
  • ये माइटस मशरूम के कवक जाल को भोजन के रूप में प्रयोग करते है।
  • ये खुम्ब के तनों व टोपियों पर भी धब्बे व छेद बना देते हैं जिनसे सुम्ब की गुणवत्ता में कमी आती है।

रोकथाम

  • मशरूम घर को स्वच्छ रखना चाहिए।
  • कम्पोस्ट को बनाकर उसका निर्जीवीकरण कर देना चाहिए।
  • कम्पोस्ट पर डायजिनान (20 ई.सी.) का 1.5 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी की दर से छिड़काव करने से कीटों से बचाया जा सकता है।
Disabled Selection, Right-Click, and Page Source



"देहाती खेती" एक स्मार्ट फार्मिंग टेक्नोलॉजी प्लेटफार्म है, जाहाँ पर खेती-किसानी से जुड़ी हर जानकारी, आधुनिक तकनीक, और ग्रामीण विकास के उपायों को समर्पित है। हमारा उद्देश्य है किसानों को शिक्षित करना, उनकी आय बढ़ाना, और गांवों को समृद्ध बनाना। देहाती खेती का लक्ष्य भारतीय किसानों को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाना है।

दैनिक अपडेट्स पाने के लिए सब्सक्राइब करें

कैटेगरी के अनुसार पढ़े

शरुम की वैज्ञानिक खेती :     मशरूम का इतिहास।     मशरूम उत्पादन ।     बटन मशरूम की खेती I     ऑयस्टर (ढिंग्री)मशरूम् की खेती I      दूधिया (मिल्की) मशरूम की खेती I      रिशी मशरूम (गेयनोडर्मा लुसी डुम) की खेती I
                                                  मशरुम का बीज (स्पॉन) बनाना सीखे I         मशरूम की बिमारियाँ एवम प्रबन्धन I

फसलों की उन्नत उत्पादन तकनीक :     गेहूं की वैज्ञानिक खेती।     जौ की खेती।     धान की वैज्ञानिक खेती।     मक्का की खेती।

दलहन फसल :     चना की खेती ।     मटर की खेती।     मसूर की खेती।     अरहर की खेती।     मुँग की खेती ।     उरद की खेती।     खेसारी की खेती । 

तेलहन फसलें :     तोरी एवं सरसो की खेती I     तीसी की खेती I     तिल की खेती I

उद्यानिक फसलों की वैज्ञानिक खेती :     आलू की खेती I     टमाटर की खेती I     बैंगन की खेती I     शिमला मीर्च की खेती I     लौकी की खेती I     परवल की खेती I     ओल की खेती I     गुलाब की खेती I     ग्लेडियोलस की खेती I
                                                                      गेंदा फूल की खेती I        मेंथा की खेती I        रजनीगंधा की खेती I        तुलसी की खेती I

मसाला फसलों की वैज्ञानिक खेती :      अदरक की खेती I     हल्दी की खेती I     मिर्च की खेती I     धनिया की खेती I     लहसुन की खेती I

चारा फसल :     बरसीम की खेती I     जई की खेती I     नेपियर घास की खेती I

© देहाती खेती, 2025 ||  सर्वाधिकार सुरक्षित ।