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लहसुन की खेती

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लहसुन रबी मौसम में पूरे देश में उगाई जाने वाली मसाला की नकदी फसल है। लहसुन का उपयोग मसालों के अतिरिक्त औषधि के रूप में भी किया जाता है। इसमें अपच, फेफड़ों की बीमारियाँ, रक्तचाप एवं दमा के उपचार के महत्वपूर्ण औषधीय गुण पाये जाते हैं। लहसुन का उपयोग अचार में भी काफी मात्रा में किया जाता है। इसके अधिक सेवन के कारण ही आज यह नकदी फसल बनी हुई है।

जलवायु :
लहसुन की खेती के लिए न तो अधिक सर्दी की आवश्यकता है और न ही अधिक गर्मी की, शरद ऋतु की सामान्य मौसम अनुकुल है। अत्यन्त गर्म और लम्बे दिन वाला समय कन्दों की वृद्धि के लिए अच्छा नहीं होता है।

भूमि :
लहसुन की खेती के लिए जीवांशयुक्त दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी गई है। वैसे सभी मिट्टियों में जिसमें जीवांश की मात्रा पर्याप्त होती है और जल निकास की समुचित व्यवस्था, लहसुन की अच्छी पैदावार सम्भव है।

खेत की तैयारी :
खेत की जुताई से पूर्व पुरानी फसलों के अवशेष एवं खरपतवारों को खेत से बाहर निकाले, इसके बाद मिट्टी पलटने वाले हल से पहली जुताई एवं तीन-चार जुताई कल्टीवेटर से करें। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाएं, जिससे मिट्टी भुरभुरी बन जाय। अंतिम जुताई के समय गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में समान रूप से बिखेर कर मिट्टी में मिला दें।

उन्नत प्रभेद :
लहसुन के प्रभेद को दो वर्गों में बाँटा गया है। एक वर्ग में शल्ककन्द / गाँठ (बल्ब) में केवल एक ही जवा होती है, जबकि दूसरे वर्ग के गाँठ / बल्ब में बहुत सारे जवा होते हैं। इसकी प्रमुख किस्में निम्न प्रकार है।

  • जमुना सफेद (जी-1) :
    इस किस्म की गाँठ का रंग सफेद होता है, जिसमें 28 से 30 जवे होते हैं, परपल ब्लाच रोग अवरोधी किस्म है, लगभग 150 से 180 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त होता है। यह 150 से 160 दिनों में फसल तैयार हो जाती है।
  • जमुना सफेद-2: 
     (जी-50)गाँठ का रंग सफेद, अधिक उजला होने के कारण अधिक पसन्द किया जाता है, एक गाँठ में 18 से 20 जवे होते है। फसल 160 से 170 दिनों में तैयार हो जाती है, इस किस्म की उत्पादन क्षमता 130 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
  • जमुना सफेद-3:
    (जी-282)इसकी गाँठ सफेद, बड़ा आकार एवं ठोस होता है, जवा का रंग सफेद तथा गूदा क्रीम रंग का होता है, है, गाँठ में 15 से 18 जवा पाया जाता है। इसकी उत्पादन क्षमता 175 से 200 क्विण्टल प्रति हेक्टेयर है, फसल 140 से 150 दिनों में खुदाई योग्य तैयार हो जाती है।
  • पंजाब लहसुन :
    इसकी गाँठ सफेद एवं जवा उजला होता है, उत्पादन क्षमता कम है लगभग 90 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई जाती है।
  • एग्रीफाउण्ड पार्वती :
    इस किस्म की गाँठ बड़े आकार की क्रीमी उजला रंग की होती है, इसके जवा बड़े आकार के होते हैं। प्रत्येक गाँठ में 10 से 16 जवा पाया जाता है। उपज क्षमता 175 से 222 क्विण्टल प्रति हेक्टेयर है, फसल 150 से 160 दिनों में तैयार हो जाती है।
  • एग्रीफाउण्ड सफेद :
    इस किस्म की गाँठ का रंग सफेद होता है, एक गाँठ में 20 से 25 जवा पाया जाता है तथा फसल 160 से 165 दिनों में तैयार हो जाती है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन 130 से 140क्विंटल तक पाया जाता है।

बीज दर :
प्रति हेक्टेयर 4 से 5 क्विंटल जवा की आवश्यकता होती है। बीज दर जवा की मोटाई पर निर्भर करती है। सामान्य तौर पर एक जवा की लंबाई 8 से 10 मिमी. होनी चाहिए।

बुआई का समय :
लगभग 20 अक्टूबर से 20 नवम्बर तक अपनी आवश्यकतानुसार लहसुन की बुआईकी जा सकती है।

बुआई का तरीका :
लहसुन की जवा की बुआई कतार में की जाती है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 10 से 15 सेमी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 7 से 8 सेमी. रखना चाहिए। लगभग 2 से 3 सेमी. की गहराई में जवा की बुआई हाथ द्वारा अथवा डिबलर से करना चाहिए। बुआई करते समय जवा का नुकीला भाग हमेशा ऊपर की ओर रखें।

पोषक तत्त्व प्रबंधन :
लहसुन की अच्छी पैदावार के लिए नेत्रजन 120 किग्रा., फास्फोरस 80 किग्रा. पोटाश 80किग्रा. एवं सल्फर 25 किग्रा. तथा जिंक सल्फेट 25-30 किग्रा. प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। एक तिहाई नेत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा बुआई से पूर्व मिट्टी में समान रूप से मिला देनी चाहिए। नेत्रजन की शेष मात्रा को दो बराबर भागों में बाँट कर 30 एवं 60 दिनों पर खड़ी फसल में उपरिवेशन करना लाभदायक रहता है।

सिंचाई प्रबंधन :
लहसुन में सिंचाई हल्की करनी चाहिए, ध्यान रहे जल जमाव न हो। पहली सिंचाई बुआई के 10 दिन बाद तथा आगे की सिंचाई आवश्यकतानुसार 10 से 12 दिन के अंतराल पर करतेरहना चाहिए।

 खरपतवार नियंत्रण :
इसमें निराई-गुड़ाई का बहुत बड़ा महत्व है, इससे खरपतवार का नियंत्रण होता है साथ ही बढ़ता है, जो फसल वृद्धि के लिए आवश्यक है। निराई-गुड़ाई से गाँठ का मिट्टी में वायु संचार बढ़ता विकास भी अच्छा होता है। समय-समय पर निराई-गुड़ाई कर खरपतवार निकालते रहनाचाहिए।

पौधा संरक्षण :
लहसुन में बहुत अधिक रोग व कीट का प्रकोप नहीं होता है। कुछ कीट, बीमारी का प्रकोप होता है जो निम्नवत है।

  • गुलाबी धब्बा :
    इस रोग के प्रकोप की अवस्था में पत्तियों पर भूरे धब्बे दिखाई देते हैं जिससे पत्तियों में भोजन निर्माण की गति धीमी पड़ जाती है और फसल कमजोर हो जाती है। इसके बचाव के लिए मैन्कोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण दवा का 2.5 ग्राम मात्रा लेकर प्रति लीटर पानी में घोल तैयार कर दो सप्ताह के अंतराल पर छिड़काव करते रहना चाहिए।
  • मृदुरोमिल आसिता :
    इसमें पत्तियों की सतह एवं ठण्डल पर बैगनी रंग के रोंये उभर आते हैं और पत्तियाँ पीली Stay पड़ने लगती है। इसके नियंत्रण के लिए 3 ग्राम जिनेव 78 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण अथवा 1 मिली. हेक्साकोनाजोल 10 प्रतिशत ई.सी. को प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर दो बार करें।
  • थ्रिप्स :
    यह कीट काफी छोटे आकार का होता है। पत्तियों एवं तनों से चिपक कर रस चूसते है, जिससे उजले धब्बे बन जाते है। इस कीट के नियंत्रण के लिए मेटासिस्टॉक्स 1.5 मिली. दवा के साथ में 0.1 प्रतिशत अथवा थायोमेथॉक्साम 70 घुलनशील चूर्ण (1 ग्राम 3 लीटर) पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

कंद की खुदांई :
लहसुन की फसल 130 से 180 दिन में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। इस अवस्था में पौधों की पत्तियों का रंग पीला पड़ने लगता है ऐसी दशा में खुदाई के 15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देनी चाहिए। जब फसल सम्पूर्ण 75 प्रतिशत पौधे भूरे रंग होकर झुक जायें तो इसकी खुदाई कर कंद को निकाल लेना चाहिए।

उपज :
अच्छी तरह से देख-रेख में खेती करने पर 125 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।

Table Example

लहसुन की खेती में प्रति हेक्टेयर आय व्यय का आकलन (वर्ष 2020-21 के अनुसार)

क्र. स. विवरण मात्रा दर राशि (रु०)
1 खेत की तैयारी एवं रेखांकनः
(क) ट्रैक्टर द्वारा जुताई 8 घंटा 450/ घंटा 3600.00
(ख) रेखांकन हेतु कार्यबल 20 कार्यबल 275 कार्यबल 5500.00
2. बीज एवं बुआई/रोपाई:
(क) बीज 5 कि.ग्रा 1200/ क्विंटल 60000.00
(ख) बीजोपचार (फफूंदनाशी/कीटनाशी रसायन) 500 ग्रा. 1000/ कि.ग्रा. 500.00
(ग) बुआई / रोपाई 15 कार्यबल 275/ कार्यबल 4125.00
3 खाद एवं उर्वरकः
(क) गोबर कि सड़ी खादः 25 टन 500/ टन 12500.00
(ख) नत्रजन 120 किग्रा. 13.80 किग्रा. 1656.00
(ग) स्फूर 80 किग्रा. 50 किग्रा. 4000.00
(घ) पोटाश 80 किग्रा. 24.50 किग्रा. 1600.00
(ङ) खाद एवं उर्वरक के व्यवहार 6 कार्यबल 275/ कार्यबल 1650.00
4 सिंचाई 06 बार 1000/ सिंचाई 6000.00
5 निकाई-गुड़ाई 20 कार्यबल 275/ कार्यबल 5500.00
6 खर-पतवार नियंत्रण (रसायन का व्यवहार) 3000.00
7 पौधा संरक्षण 4000.00
8 फसल की खुदाई, दुलाई एवं बाज़ार व्यवस्था 30 कार्यबल 275/ कार्यबल 8250.00
9 भूमि का किराया 10000/ वर्ष 5000.00
10 अन्य लागत 4000.00
11 कुल व्यय : 130881.00 रुपये
कुल ऊपज : 220 कुंटल
कुल आय (रूपये): 800000.00 रुपये
शुद्ध आय (रूपये): 669119.00 रूपये
बिक्री दर @ 4000/ रु. प्रति कुंटल
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