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चना की खेती

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चना रवि मौसम की मुख्य दलहनी फसल है। चने की उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत किस्मों, समय पर बुवाई, राईजोबियम कल्चर से बीजोपचार, समुचित उर्वरक प्रबंधन, कीट प्रबंधन और आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई से उत्पादकता में दोगुनी तक वृद्धि लायी जा सकती है। दलहन, प्रोटीन का प्रमुख स्रोत होने के कारण इसकी उन्नत पैकेज प्रणाली अपनाकर खेती करने से उत्पादन में काफी वृद्धि लायी जा सकती है तथा संतुलित पोषाहार की समस्या का समाधान किया जा सकता है।

जलवायु

चना की खेती के लिए ठंडी एवं शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। लगभग 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान में पौधे का अच्छा विकास होता है।

भूमि

चने की खेती के लिए दोमट एवं भारी दोनों प्रकार की मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। चने के लिए भूमि लवणीय - क्षारीय एवं जल जमाव की समस्या से मुक्त हो अधिक उपयुक्त मानी जाती है।

खेत की तैयारी

पहले जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद की दो जुताई देसी हल अथवा कल्टीवेटर से करनी चाहिए। इसकी खेती करने के लिए मिट्टी को काफी भुरभुरी करने की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि चना फसल की जड़ों में वायु का संचार होना आवश्यक है। बुआई के समय भूमि में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है।

उन्नत प्रभेद

चना की मुख्य किस्मों में छोटा चना, मध्यम एवं काबुली चना है।
कुछ मुख्य किसमें निम्न प्रकार है :

जीo सीo पीo 105 : यह प्रभेद उकठा एवं जड़ गलन रोग के प्रति सहनशील है, दाना मध्यम आकार और परिपक्वता अवधी 140 से 145 दिन है। इसकी बुवाई 1 से 30 नवंबर तक की जा सकती है, औसत उपज 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

पूसा 356 : यह पछेती किस्म है, इसकी बुवाई 15 नवंबर से 15 दिसंबर तक करते हैं। दाना छोटा होता है, 130 से 140 दिनों में फसल तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता 15 से 18 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। फली छेदक, उकठा, एवं जड़ गलन का प्रकोप इस प्रवेद में नहीं पाया जाता।

पूसा 362 : इस किस्म के दाने मध्यम आकर के होते हैं, बुआई 15 नवंबर से 15 दिसंबर के मध्य में कर सकते हैं। फसल 130 से 140 दिनों में तैयार हो जाती है, इस किस्म की अपज क्षमता 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

पूसा 372 : यह पछेती किस्म हैं, इसकी बुआई 15 नवंबर से 15 दिसंबर तक करते हैं। दाना छोटा होता है, 130 से 140 दिनों में फसल तैयार हो जाती है इसकी उत्पादन क्षमता 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टयेर है। फली छेदक, उकठा एवं जड़ गलन का प्रकोप इस प्रभेद में नहीं पाया जाता।

डी. सी. पी. 92 - 3 : यह छोटे दाने की उकठा अवरोधी किसम है, इसकी बुआई 1 नवंबर से 30 नवंबर तक कर सकते हैं। लगभग 135 से 140 दिनों में फसल पूर्ण रूप से पक कर तैयार हो जाती है। इसमें उत्पादन 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टर प्राप्त होता है।

जे.पी. 14 : इस किस्म की बुआई 1 नंबर से 30 नवंबर के मध्य कर सकते हैं। दाना बड़ा होता है जिससे 20 से 25 क्विंटल उत्पादन प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त होता है। फसल 130 140 दिनों में पक कर तैयार होती है।

शुभ्रा : यह काबुली चना है, इसकी बुआई 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के मध्य की जाती है। फसल पक कर 135 से 140 दिनों में तैयार होती है, इसकी उत्पादन क्षमता 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

एच. के. 94 - 134 : यह उकठा एवं जड़ गलन रोधी किस्म है, इसकी बोआई 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के मध्य कभी भी कर सकते हैं। यह 140 से 145 दिनों में फसल पक कर तैयार हो जाती है। 18 से 20 क्विंटल उत्पादन प्रति हेक्टर प्राप्त होता है।

बी. जी. 1053 : यह उकठा रोग रोधी किस्म है, इसकी बुआई 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के मध्य की जाती है। उत्पादन क्षमता 12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टर 140 से 145 दिनों में फसल पक्का तैयार होती है।

बीजोंपचार

मिट्टी में दीमक एवं कीटवर्म बचाव हेतु 1.5 प्रतिशत क्विनाल्फोस या 1.5 प्रतिशत क्लोरपाइरीफास या मिथाईल पैराथियान चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर सेआखिरी जुताई के साथ खेत में मिला दें अथवा क्लोरोपाइरीफास 20 ई.सी. 8 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीच की दर से बीज उपचारित कर बुवाई करें। कीटनाशक से बीच को उपचारित करने से पूर्व बीज को कीट - व्याधियों से मुक्त रखने के लिए ट्राइकोडर्मा विरिडी 5 ग्राम प्रति किलो बीज से 1.5 से 2.0 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। बीजोपचार के समय फफूंदनाशी कीटनाशी एवं राइजोबियम कल्चर के क्रम में उपादानों का व्यवहार किया जाना उचित होगा।

बीज दर

शुद्ध फसल के लिए छोटे दाने वाले प्रभेदों के लिए 80 किलोग्राम तथा बड़े दाने वाले प्रभेदों के लिए 100 किलोग्राम ब्रिज प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करें। टाल क्षेत्रों के लिए बीज दर सामान्य से प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम अधिक की अनुशंशा है। मिश्रित फसल के रूप में बुवाई के लिए अनुशासित आधी बीज की मात्रा की आवश्यकता होती है।

बुवाई

बुवाई की दूरी 30 सेंटीमीटर X 10 सेंटीमीटर रखें, बोवाई की गहराई 5 से 6 सेंटीमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। पंक्ति में बुवाई करने से खरपतवार नियंत्रण में सुबिधा रहती हैं तथा बीज की मात्रा कम हो जाती है और फसलों का विकाश सही होता है।

पोषक तत्व प्रबंधन

राइजोबियम कल्चर का प्रयोग : बीज में राइजोबियम कल्चर का प्रयोग करने से दलहनी फसलों की जड़ों में नेत्रजन स्थिरीकरण बढ़ जाता है जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ जाती है तथा ऊपज में भी बढ़ोतरी होती है। राइजोबियम कल्चर का (200 ग्राम प्रति 5 पैकेट) प्रति हेक्टयर के लिए आवश्कता होती है। कल्चर का व्यबहार उसकी समाप्ति तिथि देखकर ही करें। 100 ग्राम गुड़ को 1 लीटर पानी में घोलकर हल्का गर्म करें ताकि घोल लसलसा हो जाए तदोपरांत ठंडा होने पर इस घोल में 80 किलो बीज को अच्छी तरह से मिला दें ताकि एक परत बन जाये। इसके बाद छाये में सुखाकर शीघ्र बुवाई कर दे।

फास्फोजिप्सम का प्रयोग : सघन खेती एवं गंधक रहित उर्वरकों के लिए अधिक उपयोग से मिट्टी में गन्धक की कमी हो रही है। फास्फोजिप्सम में 17 प्रतिशत गन्धक होता है जिसे चने की बुवाई पूर्व 200 किलो प्रति हेक्टर व्यवहार करने से गन्धक की आवश्यकता पूरी हो जाती है।

सूक्ष्म पोषक तत्व का प्रयोग : सभी क्षेत्रों में जिंक और बोरान की कमी पाई जा रही है जिसेसे दलहन की उपज प्रभावित होती है। सूक्ष्म तत्वों का उपयोग मिट्टी जाँच के आधार पर किया जाना चाहिए। जिंक एवं बोरॉन के व्यवहार उर्वरक के रूप में बुवाई के पूर्व अनुशासित मात्रा में 30 से 40 किलो कंपोस्ट के साथ खेत में करना चाहिए।

पि ० एस ० बी० का प्रयोग : यह फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने के लिए जीवाणु उर्वरक है। असिंचित भूमि में स्फुर की उपलब्धता घट जाती है। पि ० एस ० बी० प्रयोग करने से फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ जाती है। 4 किलो पि ० एस ० बी० को 50 किलोग्राम कंपोस्ट में मिलाकर खेतों में बुवाई से पूर्व व्यवहार करना चाहिए।

उर्वरको का प्रयोग : उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना उचित है। सामान उर्वराशक्ति वाले खेतों में 20 किलोग्राम नेत्रजन (45 किलोग्राम यूरिया) एवं 40 किलोग्राम फास्फोरस (250 किलोग्राम सुपर फास्फेट) अंतिम जुताई के समय व्यवहार करें। यदि डीएपी उपलब्ध हो तो प्रति हेक्टेयर के लिए 100 किलो डीएपी की मात्रा पर्याप्त है।

सिंचाई प्रबंधन

यदि बुवाई के समय खेत में नमी की कमी हो तो बोने के 4 से 5 दिनों से पूर्व हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। चने में 1 से 2 सिंचाई आवशयक होती है। यदि मिटटी हलकी हो तो प्रथम सिंचाई बुवाई के 45 दिनों के बाद एवं दूसरी सिंचाई दाना बनने के समय करें। सुक्ष्म सिंचाई (सिप्रंकलर सेट) से दलहनी फसलों की सिंचाई करना अधिक उपयुक्त है।

खरपतवार नियंत्रण

बथुआ, कटैया एवं प्याजी घास के प्रबंधन के लिए पेंडीमिथिलीन 3.3 लीटर को 800 - 900 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बोआई के 2 से 3 दिन के अंदर छिड़काव करें। अथवा फ्यूक्लोरीलीन 1.5 से 2 लीटर प्रति हेक्टेयर 600 - 700 लीटर पानी में घोल बनाकर खेत की तैयारी के बाद बोने के पूर्व नेपसेक छिड़काव यंत्र से छिड़काव करें।

पौधा संरक्षण

चना में रोग एवं कीट का प्रकोप कभी - कभी अधिक पाया जाता है जिससे उत्पादन घट जाता है, प्रकोप की दशा में निम्न नियंत्रण उपाय अपनाए।

फली बेधक कीट

इस कीट का पिल्लू पहले पत्तियों एवं फूलो को खाकर नुक्सान पहुंचाता है। इसके बाद फल्ली आने पर फली में छेदकर अंदर ही अंदर दानो को खाता है। इसके नियंत्रण के लिए क़्वीनालफॉस 25 ई ० सी० दवा की 800 मिलीलीटर मात्र 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करें।

सेमीलूपर : यह की पौधे की कोमल पत्तियों एवं फलियों को खाता है, इसके नियंत्रण के लिए क्लोरोपाइरीफॉस 2 प्रतिशत धूल की 25 किलोग्राम दवा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रकोप की दशा में खड़ी फसल में बुरकाव करें।

कजरा कीट : इस कीट का पिल्लू अंकुरित हो रहे बीज को क्षति पहुंचाने के साथ अंकुरित पौधों को जमीन की सतह से काट कर गिरा देता है। इससे बचाव हेतु क्लोरोपाइरीफॉस 20 इ ० सी० दवा की 2. 5 लीटर मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।

उखड़ा रोग : इस रोग के प्रकोप से पौधा सूखने लगता है, इसके नियंत्रण हेतु 5 ग्राम टाइकोडरमा द्वारा प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करने के बाद ही बीज की बुवाई करें। प्रकोप की दशा में कॉपर ऑक्सिक्लोराइड 50% घुलनशील घुलनशील चूर्ण 3 किलोग्राम मात्र 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

ब्लाईट : पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे - काले रंग के धब्बे बनते है जिससे पत्तियाँ गिरने लगती है इसके नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम से बीज उपचार करें साथ ही कार्बेन्डाजिम एवं मैन्कोज़ेब का 1. 5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करें।

कटाई

फसल तैयार हो जाने पर सुबह में कटनी करें, कटाई के बाद खलिहान में 4 से 5 दिन सुखाकर दौंनी कर लें। भण्डारण से पूर्व दानो को अच्छी तरह सूखा लें, अन्यथा सुंडी के लगने की अधिक संभावना रहती है।

चना की खेती में खर्च एवं मुनाफा का विवरण प्रति हेक्टेयर (2020- 21 के अनुसार)

खेत की तैयारी, बीज एवं बुआई खर्च
पटवन एवं सूक्ष्म सिंचाई
उर्वरक एवं निराई - गुड़ाई, खरपतवार नियंत्रण
पौधा संरक्षण
कटाई एवं मढाई
कुल खर्च

8850.00 रुपए
1500.00 रुपए
5840.00 रुपए
2200.00 रुपए
5500.00 रुपए
23890.00 रुपए

कुल उपज प्रति हेक्टेयर 20 क्विंटल दर 4450 / क्विंटल = 89000 रुपए
शुद्ध आय = 89000 - 23890 = 65110 रुपए

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