ग्लैडियोलस फूल अपनी सुन्दरता, डंठल में फूलों का एक-एक करके खिलना, विभिन्न आकार-प्रकार एवं रंगों तथा फूलदान में अधिक समय तक सही दशा में रहने के कारण मुख्य स्थान रखता है। व्यावसायिक दृष्टि से इसे कटे फूल उत्पादन हेतु उगाया जाता है, परन्तु उद्यान को सुन्दर बनाने के लिए क्यारियों एवं गमलों में भी इसे लगाया जाता है। कटे फूल को गुलदस्ता, मेज सज्जा एवं भीतरी सज्जा के लिए मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है।
जलवायु :
ग्लेडियोलस की खेती के लिए ठण्डी एवं नम जलवायु की आवश्यकता होती है। शरद ऋतु सबसे अच्छी मानी गयी है, औसत तापमान 15 से 20 सेंटीग्रेड सर्वोत्तम पाया गया है।
भूमि :
बलुई दोमट मिट्टी जिस में जीवांश पदाथों की प्रचुरता हो इसकी खेती के लिए अच्छी मानी गयी है। मिट्टी का पी. एच. मान 5.5 से 6.5 अच्छी उपज प्राप्त होती है। जल निकास का उचित प्रबंध होना अति आवश्यक है, जलमग्न अवस्था में पौधे खराब हो जाते हैं और पुष्पन अच्छी नहीं हो पाती है।
खेत की तैयारी :
खेत का चुनाव करने के बाद उसे समतल कर लें फिर एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 बार देशी हल से जुताई करके पाटा चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लें। चूँकी यह फूल वाली फसल है इसलिए फूल के समुचित विकास हेतु खेत की तैयारी सही ढंग से होनी चाहिए। खेत को खरपतवार रहित रखें तथा निकाई करते समय सावधानी बरतें क्योंकि इस में फूल बहुत अधिक संख्या में निकलते हैं।
उन्नत किस्में :
व्यावसायिक रूप से उत्पादन हेतु फ्रेंडशिप व्हाइट, फ्रेंडशिप पिंक, वाटरमेलन पिंक, लिली आसकर, जैकसन, विस-विस, यूरोवीज न एवं भारत में विकसित प्रमुख किस्में आरती, अप्सरा, अग्नि रेखा, सपना, शोभा, सुचित्र, मोहनी, मनोहर, मयूर, मुक्ता, मनीषा, मनहार आदि है।
प्रवर्धन :
ग्लैडियोलस का प्रवर्धन कन्द से होता है। कन्द लगभग 3-5 सेमी. व्यास का होना चाहिए। लट्टूनुमा आकार वाले कन्द चिपटे कन्द की अपेक्षा उत्तम पाया गया है। एक कन्द से कई छोटे-छोटे कन्द जिन्हें कारमेल कहते हैं, तैयार होते हैं। परन्तु ये इतने छोटे होते हैं जो कि रोपाई योग्य नहीं रहते हैं। अतः इन्हें 2-3 बार रोपाई करनी पड़ती है उसके बाद ही सही आकार के कन्द प्राप्त हो पाते हैं। कन्द रोपाई का उपयुक्त समय सितम्बर एवं अक्टूबर माह है। खुदाई के बाद कन्द लगभग तीन माह तक सुषुप्तावस्था में रहते हैं। अतः सुषुप्तावस्था में इनकी रोपाई न करें अन्यथा इनका अंकुरण नहीं होगा। रोपाई करने के पहले भूरे रंग के बाहरी छिलके को हटाकर 0.2 प्रतिशत कैप्टान या 0.1 प्रतिशत बेनलेट के घोल में 30 मिनट तक उपचारित करने के बाद ही कन्दों की रोपाई करनी चाहिए। उत्तम होगा यदि कन्दों को अंकुरित कराके रोपाई करें। इसके लिए कन्द को अंधेरे एवं गर्म स्थान पर बालू भरे ट्रे में लगाकर रखना चाहिए। बालू को नम बनायें रखें तथा ट्रे को पॉलिथीन से ढँक दें। व्यावसायिक खेती हेतु कन्दों को 20-30×15-20 या 25×15 सेमी. की दूरी पर 5-10 सेमी. गहराई पर रोपाई करें। प्रदर्शनी हेतु स्पाइक तैयार करने के लिए बड़े आकार के कन्द (5.0-7.5 सेमी. व्यास के) को 30×20 सेमी. पर रोपना चाहिए। यदि कन्द की रोपाई 20-25 दिन के अन्तराल पर कई बार में की जाय तो स्पाइक लगातार अधिक समय तक मिलती रहती है।
खाद एवं उर्वरक :
ग्लैडियोलस की अच्छी उपज प्राप्त करने हेतु प्रति वर्ग मीटर भूमि में 5 किग्रा. कम्पोस्ट, 30 ग्राम नाइट्रोजन, 30 ग्राम फॉस्फोरस व 20 ग्राम पोटाश देना चाहिए।कम्पोस्ट, फॉस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइटोजन की चौथाई मात्र रोपाई के समय देनी चाहिए, जबकि शेष नाइटोजन की मात्र को तीन बार में बराबर-बराबर भाग में प्रथम पौधे में 3-4 पत्तियाँ आने पर, दूसरी बार स्पाइक निकलते समय तथा अन्तिम बार जब फूल निकलना समाप्त हो जाय। अन्तिम बार नाइट्रोजन की मात्र कन्दों की सही वृद्धि के लिए देते हैं।
पौधे को सहारा देना :
जब स्पाइक (फूल की डंठल) निकलने लगे उसी समय बाँस की फट्टी का पौधों को सहारा देते हैं ताकि स्पाइक न तो टेढ़ी-मेढ़ी हो सके न ही जमीन की तरफझुकेगा।
अन्य क्रियाएँ:
खेत को खरपतवार से मुक्त रखें साथ ही जड़ पर दो बार मिट्टी चढ़ाये एक तो तीन-चार पत्ती की अवस्था पर और दूसरी बार जब स्पाइक निकलने लगे एवं आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। स्पाइक निकलते समय खेत में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।
स्पाइक की कटाई :
सबसे नीचे वाले फूल का रंग दिखाई देते ही तेज चाकू या सिकैटियर की मदद से स्पाइक काटने के तुरन्त बाद पानी युक्त बाल्टी में स्पाइक को रखें।
पौधा संरक्षण :
ग्लैडियोलस को थ्रिप्स कीड़ा से ज्यादा नुकसान होता है इस के लिए 0.5 मिली. इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस. एल. प्रति लीटर पानी में या 0.15 प्रतिशत नुवाक्रान के घोल का छिड़काव 15-20 दिन के अन्तराल पर करें। भंडारण के समय भी कभी-कभी ये कीड़े कन्द को क्षति पहुँचाते हैं। अतः भंडारण के समय भी आवश्यकतानुसार 2-3 छिड़काव करना लाभदायक है। ग्लैडियोलस में मुख्य रूप से भूमि जनित दो बीमारियाँ स्ट्रोमेटीनिया ग्लैडियोली और फ्यूजेरियम आम्सीस्पोरम का साधारणतया प्रभाव पाया जाता है। इसके प्रभाव के कन्द सड़ जाते हैं। इस बीमारी से बचाव के लिए बीमारी रहित कन्द का चुनाव करें तथा कन्द की रोपाई के पहले 0.2 प्रतिशत कैप्टान से या गर्म पानी में 48° डिग्री से. पर 30 मिनट तक उपचारित करनाचाहिए। खड़ी फसल में बीमारी से बचाव हेतु 0.25 प्रतिशत मैन्कोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का छिड़काव करें।
कन्द की खुदाई एवं भंडारण :
यदि पौधे से स्पाइक को नहीं काटा जाता है और उसे क्यारी या गमले में ही सुन्दरता प्रदान करने के लिए पूर्णतः खिलने देते हैं तो यह ध्यान रखें कि पौधे पर बीज न बनने पाये अन्यथा कन्द को नुकसान पहुँचता है। जब पत्ती पीले या भूरे रंग की हो जाय एवं सूखना शुरू करे तो कन्द एवं कारमेल को खुरपी की सहायता से खुदाई करें। कन्द को खोदने के बाद 0.2 प्रतिशत कॉर्बेन्डिाजिम 50 प्रतिशत घुलनरील चूर्ण या 0.1 प्रतिशत बेनलेट घोल से 30 मिनट तक उपचारित कर के छायादार स्थान पर 2-3 सप्ताह तक सुखाकर लकड़ी की पेटी या जूट के बैग में रखकर हवादार एवं ठंड कमरे में भंडारित करें। यदि कोल्ड स्टोरेज में 4° डिग्री से तापक्रम पर भंडारित किया जाय तो यह सर्वोत्तम होगा।
उपज :
उचित फसल प्रबंधन से एक हेक्टेयर क्षेत्रफल से लगभग 2-2.5 लाख पुष्प डंठल प्राप्त की जा सकती है।
क्र. स. | विवरण | मात्रा | दर | राशि (रु०) |
---|---|---|---|---|
1 | खेत की तैयारी एवं रेखांकनः | |||
(क) ट्रैक्टर द्वारा जुताई | 8 घंटा | 450/ घंटा | 3600.00 | |
(ख) रेखांकन हेतु कार्यबल | 50 कार्यबल | 275 कार्यबल | 13750.00 | |
2. | बीज एवं बुआई/रोपाई: | |||
(क) बीज | 150000 | 3.00/बल्क | 450,000.00 | |
(ख) बीजोपचार (फफूंदनाशी/कीटनाशी रसायन) | 1/ कि.ग्रा. | 500/ कि.ग्रा. | 500.00 | |
(ग) बुआई / रोपाई | 40 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 11000.00 | |
3 | खाद एवं उर्वरकः | |||
(क) गोबर कि सड़ी खादः | 10 टन | 500/ टन | 5000.00 | |
(ख) नत्रजन | 200 किग्रा. | 13.80 किग्रा. | 2760.00 | |
(ग) स्फूर | 200 किग्रा. | 50/ किग्रा. | 10000.00 | |
(घ) पोटाश | 200 किग्रा. | 24.50 किग्रा. | 4900.00 | |
(ङ) खाद एवं उर्वरक के व्यवहार | 20 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 5500.00 | |
4 | सिंचाई | 16 सिंचाई | 1000/ कार्यबल | 16000.00 |
5 | निकाई-गुड़ाई | 50 कार्यबल | 275 कार्यबल | 13750.00 |
6 | खर-पतवार नियंत्रण (रसायन का व्यवहार) | 0.00 | ||
7 | पौधा संरक्षण | 2000.00 | ||
8 | फसल की खुदाई, दुलाई एवं बाज़ार व्यवस्था | 50 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 13750.00 |
9 | भूमि का किराया | 1 वर्ष | 10000/ वर्ष | 10000.00 |
10 | अन्य लागत | 50000.00 | ||
11 | कुल व्यय : 640510.00 रुपये | |||
कुल ऊपज (कुंटल): 2 लाख स्पाइक एवं 2.50 लाख बल्क | ||||
कुल आय (रूपये): 1350000.00 रुपये | ||||
शुद्ध आय (रूपये): 7,09,490.00 रुपये | ||||
बिक्री दर @ 3/ रुपये स्पाइक एवं 2 लाख बल्ब @ 3 रुपये प्रति बल्ब | ||||
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