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दूधिया (मिल्की) मशरूम की खेती

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वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से उगने वाले दूधिया मशरूम की उत्पादकता एवं विशेषताओं को सर्वप्रथम 1974 में पहचाना गया। लगभग 20 वर्ष के शोध के उपरान्त इसकी व्यवसायिक खेती को मध्य एवं दक्षिण भारत में प्रारंभ किया गया। दूधिया मशरूम का आकार बटन मशरूम से मिलता जुलता है। बटन मशरूम की अपेक्षा दूधिया मशरूम का तना अधिक मांसल, लम्बा य आकार काफी मोटा होता है।

उगाने की विधि : 

पोषाधार (भूसा) का उपचार

भूसे में उपस्थित हानिकारक जीवों एवं उनके बीजों का नाश करने हेतु भूसे का उपचार निम्नलिखित में से किसी एक विधि से करना चाहिए - 

  • गर्म पानी द्वारा:
    भूसे को 80 डिग्री सेल्सियस (लगभग उबलते) से अधिक गर्म पानी में लगभग एक घंटे तक उपचारित करके उसी पानी में 14-16 घंटे भींगने दें। तत्पश्चात् भूसे को निकालकर पानी का रिसाव होने दें।
  • रासायनिक उपवार : 
    इस विधि से भूसे के उपचार हेतु 200 लीटर क्षमता के ड्रम में 100 लीटर में पानी भरकर उसमें 7.5 ग्राम बेविस्टीन एवं 125 मि.ली. फार्मेल्डिहाइड घोलकर भूसे को दबाकर वायुरोधी ढक्कन द्वारा मजबूती से बंद कर दें। भूसे को 14-17 घंटे भींगने के बाद पानी से निकाल लेना चाहिए।

दोनों में से किसी भी विधि से उपचारित भूसे को एक घंटे के जल रिसाव के बाद विसंक्रमित पॉलीथीन की चादर पर 4-5 घंटे धूप में फैलाकर बिजाई हेतु उचित नमी (60-65 प्रतिशत) की अवस्था पर आने देना चाहिए। खुला भूसा उपचारित करने की बजाय उसे जूट के बोरों में भरकर भी उपचारित कर सकते हैं। इस विधि से उपचारित बोरों को जल रिसाव के बाद ऊपरी सतह के पूर्णतः सूख जाने तक धूप में उलटते-पलटते रहना चाहिए।

बिजाई : 

बिजाई हेतु पॉलीथीन की थैलियों में 1200 ग्राम तैयार भूरो को भरकर दबाने एवं समतल करने के बाद सतह पर 75 ग्राम स्पान समान रूप से छिटक देते है इस सतह पर 1100 ग्राम भूसे की दूसरी तह बनाकर शेष 75 ग्राम स्पान बिखेर दें, तत्पश्चात् 700 ग्राम भूसे की अन्तिम परत बिछाकर ऊपर से नीचे की ओर बल पूर्वक दबाते हैं तैयार थैली का मुँह सुतली से बाँधकर बाँस की बेंच पर स्थापित करते हैं। साथ ही शैली के अन्दर उत्पन्न होने वाली जल वाष्प की मुक्ति हेतु थैली के नीचे के दोनों कोनों को थोड़ा-थोड़ा काटते हैं एवं ऊपरी भाग पर विसंक्रमित सूजा द्व ारा 20-25 छिद्र बना देते हैं तथा बिजाई उपरांत कवक वृद्धि का निरीक्षण करते रहते हैं।

आवरण मृदा (केसिंग) बिछाना : 
25 किग्रा कृषि/बाग भूमि से ली गयी दोमट मिट्टी एवं 25 कि.ग्रा. दो-तीन वर्ष पुरानी सड़ी हुई गोबर की खाद को आपस में भली प्रकार मिलाकर फार्मेल्डिहाइड के 2.0 प्रतिशत के घोल से गीला करके पॉलीथीन के थैलों में भरकर मुँह बांध दिया जाता है। तीन दिन उपरान्त इस मिट्टी को विसंक्रमित पॉलीथीन चादर पर पफैलाकर फार्मेल्डिहाइड की गंध समाप्त होने तक दो-दो घण्टे के अन्तराल पर उलटते-पलटते हैं। मृदा को जल वाष्प से भी उपचारित कर सकते हैं। तैयार मृदा का पी.एच. मान 7.5 होना चाहिए, कम होने पर कैल्शियम कार्बोनेट मिलाकर इसे व्यवस्थित किया जाता है।

आवरण मृदा बिछाने का समय:
भूसे में कवक जाल के फैल जाने पर प्रति बैग 500 ग्राम आवरण मृदा बिछाना चाहिए।

फसल प्रबन्धन : 
बिजाई के 15-20 दिन बाद कवक जाल फैल जाता है और आवरण मृदा बिछाने के 10-12 दिन बाद मशरूम कलिकायें उत्पन्न होने लगती हैं जो कि 7-8 दिन की वृद्धि उपरान्त तुड़ाई योग्य हो जाती है। अतः आवरण मृदा बिछाने के तुरन्त बाद से पानी का छिडकाव प्रारम्भ कर देना चाहिए और जब तक फसल उगती रहती है आवरण मृदा को सदैव नम बनाये रखना आवश्यक है। अच्छे मशरूम उत्पादन हेतु कमरे की वायु की आपेक्षित आर्द्रता80 प्रतिशत से अधिक एवं तापक्रम 30 से 35 डिग्री सेल्सियस के मध्य रहना चाहिए। आर्दता एवं तापमान के साथ-साथ गैसीय संतुलन बनाये रखने हेतु कमरे में सीमित वायु आवागमन रखना चाहिए।

तुड़ाई : 
जब फलकाय की लम्बाई 10-15 सेमी. हो जाये एवं इसकी टोपी खुलने लगे तो इसे घुमाकर तोड़ लेना चाहिए।

उपज :
प्रति बैग 750 ग्राम औसत उपज प्राप्त होती है।

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