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तीसी की खेती

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तीसी को अलसी भी कहा जाता है। इसके बीज छोटे चपटे फाइबर युक्त, विभिन्न औषधीय गुणों से भरपूर होते है। तीसी के सेवन से रक्त चाप को नियंत्रित करता हैं डायबिटीज एवं हृदय रोग से छुटकारा दिलाता है, शरीर को ऊर्जा एवं स्फूर्ति प्रदान करता है। रक्त में शर्करा तथा कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करता है। कैंसर रोधी हार्मोन की सक्रियता को बढ़ाता है। जोडों के दर्द, हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने के साथ यकृति को स्वस्थ रखता है, खाँसी में तीसी लाभकारी सिद्ध हुआ है। त्वचा को स्वस्थ रखता है एग्जिमा जैसी बीमारी से छुटकारा दिलाता है। तीसी में ओमेगा फैटी श्री एसिड पायी जाती है जो दूसरे शाकाहारी खाद्य पदाथों में नहीं पाया जाता है। तीसी का तेल सरसों तेल के स्थान पर उपयोग में लाया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में तीसी का रकबा घटा है पहले तीसी की खेती चना व दूसरी फसलों के साथ मिलाकर मिश्रित फसल के रूप में खेती प्रचलित थी।

जलवायु  : तीसी की खेती के लिए ठण्डी एवं नम जलवायु की आवश्यकता होती है, पूरे देश में शरद ऋतु में इसकी खेती की जाती है। इस फसल में अधिक ठण्ड एवं पाला को सहने की क्षमता होती है।

भूमि  : सभी प्रकार की मिटटी में तीसी की खेती सम्भव है, परन्तु दोमट मि इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम है। मिट्टी में जीवांश पदार्थों की प्रचुरता होने फसल को विकास करने का अवसर मिलता है और उत्पादन बेहतर होता है।

खेत की तैयारी : सर्व प्रथम खेत से पुरानी फसलों के अवशेष एवं खरपतवारों को निकाल कर अलग कर दें। इसके बाद यदि खेत में नमी की कमी हो तो हल्की सिंचाई कर बरकनी आने पर दो-तीन जुताई करें। पहली जुताई मि‌ट्टी पलटने वाले हल से शेष कल्टीवेटर से जुताई कर पाटा लगाए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाना चाहिए, इससे मिट्टी भुरभुरी बन जाती है और खेत समतल। इसी समय खेत को आवश्यकतानुसार क्यारियों में बाँट लें, साथ ही सिंचाई के लिए नालियाँ बना लें। खेत की अंतिम जुताई के समय लगभग 15 टन कम्पोस्ट खाद समान रूप से बिखेर कर मिट्टी में मिला दें।

उन्नत प्रभेद : तीसी की अनेक प्रभेद विकसित किये गये है, क्षेत्र विशेष के अनुसार किसान भाई उत्तम प्रभेद का चयन कर सकते है। तीसी के कुछ प्रभेद निम्न है-

  • पार्वती : इसकी बुवाई 20 अक्टूबर से 20 नवंबर तक कर सकते हैं, सिंचित क्षेत्र के लिए यह अत्यंत उपयुक्त किस्म है। इसमें तेल की मात्रा 42 प्रतिशत तक पाई जाती है। लगभग 140 से 145 दिनों में फसल पक कर तैयार हो जाती है। उत्पादन क्षमता 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
  • गरिमा  : इसकी बुआई भी 20 अक्टूबर से 20 नवंबर तक कर सकते हैं इसमें भी तेल 42 प्रतिशत तक पाया जाता है। फसल 125-130 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। उत्पादन क्षमता सतत 12 से 14 विब्दल प्रति हेक्टेयर हो सकती है।इस प्रभेद की बुवाई 20 अक्टूबर से 20 नवंबर तक करते है, तेल की मात्रा 40 प्रतिशत है, पैरा फसल के लिए यह उपयुक्त प्रभेद है। फसल 120 से 130. दिन में तैयार हो जाती है, लगभग 10 से 12 क्विंटल/हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त हो सकता है। पैरा फसल हेतु उपयुक्त है।
  • शुभ्रा : इसकी बुवाई 20 अक्टूबर से 20 नवंबर तक अपनी सुविधानुसार कभी भी कर सकते है। इसमें तेल की मात्रा सबसे अधिक 44 प्रतिशत पाई जाती है। फसल 130 से 135 दिनों में तैयार होती है। उत्पादन 10 से 12 क्विंटल/हे. प्राप्त होता है।
  • रश्मि : यह सिंचित क्षेत्र के लिए उपयुक्त किस्म है, तेल की मात्रा 41 प्रतिशत पाई जाती है। लगभग 20 अक्टूबर से 20 नवंबर तक इसकी बुवाई की जा सकती है। फसल 140 से 145 में तैयार हो जाती है और 10 से 12 क्विंटल/हे. उत्पादन प्राप्त होता है।
  • मीरा : इसकी बुआई 20 अक्टूबर से 20 नवंबर तक की जाती है, सिंचित क्षेत्र के लिए उपयुक्त किस्म है। फसल की परिपक्वता अवधि 135 से 140 दिनों है, उत्पादन 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है।
  • श्वेता : इसकी बुआई 20 अक्टूबर से 20 नवंबर तक कभी भी कर सकते है। इसमें तेल की मात्रा 41 प्रतिशत पाई जाती है। फसल 140 से 145 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है और उत्पादन क्षमता 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।इस किस्म की बुवाई भी 20 अक्टूबर से 20 नवंबर के मध्य कर सकते है। इसमें तेल की मात्रा 43 प्रतिशत है और पैरा फसल के लिए उपयुक्त किस्म है। इसमें उत्पादन 12 से 15 क्विंटल/हे. तक पाया जाता है।

बीज दर  : एक हेक्टेयर में तीसी की खेती के लिए 20-25 से 30 किग्रा. बीज बो आवश्यकता होती है।

बीज उपचार : यह सबसे आवश्यक कार्य है। बीज उपचार रोग एवं कीटो के प्रकोप को नियंत्रित करता है। प्रति किग्रा. बीज को बीज बुआई से पूर्व 2.5 ग्राम बेविस्टीन दवा की दर से उपचारित करना चाहिए।

बुवाई : तीसी की बुआई पंक्ति से पंक्ति 25 सेमी. और पौधों से पौधो की दूरी 5 सेमी. रखना चाहिए। इससे पौधों का विकास अच्छा होता है और उत्पादन बेहतर प्राप्त होता है। छिटकवाँ अथवा कूँड़ में बुआई कर सकते हैं।

पोषक तत्व प्रबंधन : सिंचित खेती में 80 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा. फास्फोरस एवं 20 किग्रा. पोटाश की आवश्यकता होती है। असिंचित दशा में 50 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा. फास्फोरस एवं 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर डालना चाहिए। सिंचित अवस्था में नत्रजन की आधी मात्रा और फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय देना चाहिए। शेष नेत्रजन को खड़ी फसल में फूल आते समय दें। असिंचित क्षेत्र में नत्रजन फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय खेती में देना लाभदायक रहता है।

सिंचाई प्रबंधन : तीसी की खेत में नमी रहनी चाहिए इससे फसल वृद्धि अच्छी होती है।: सामान्य और पर सीसी में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। फिर भी रखेत में यी खत्म होने की स्थिति में आवश्यकता के अनुसार बहुत ही हल्की सिंचाई करनी चाहिये।

खरपतवार नियंत्रण : तीसी की फसल को लगभग एक से डेढ़ माह तक खरपतवारों से मुक्त रखना आवश्यक है। जहां तक सम्भव हो यथा समय निराई-गुडाई करके खरपतवारों को खेत से निकाल देना चाहिए। खरपतवारों के रसायनिक नियंत्रण हेतु पेन्डीमिथलीन 30 ई.सी. 3 लीटर दवा 800 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरंत बाद एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में छिड़‌काव करना लाभदायक रहता है।

पौधा संरक्षण  : तीसी में कुछ रोग एवं कीट पाये जाते है, जिनसे फसल को काफी क्षति होती है। इसका निम्न प्रकार से प्रबंधन कर फसल को बचाया जा सकता है।

  • लिनसीड मिज : व्यस्क कीट सुन्दर नारंगी रंग का होता है, मादा मक्खी पौधो के फूलों की कली में अंडे देती है, जिससे शिशु निकल कर फूलों की कली को खाती है। जिसके कारण गॉल का निर्माण होता है और उत्पादन में काफी कमी आ जाती है। इसके नियंत्रण के लिए फसल की अगात बुआई करें, फसल चक्र अपनायें, इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस.एल. का 1 मिलीलीटर प्रति 2 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़‌काव करें। आक्सीडेमेटान मिथाइल 25 ई.सी. 1 मिलीलीटर दवा प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें।
  • सेमीलूपर कीट  : इसका वयस्क पीलापन लिये हुए भूरे रंग का होता हैं पंख पर सफेद रंग का निशान होता है। इसकी खास पहचान है कि ये अपने शरीर को वलय के आकार में मोड़कर चलता है। पिल्लू पौधो की पत्तियाँ खाकर नष्ट कर देता है, जिसके कारण पौधों पर फूलों एवं फलों की संख्या काफी कम हो जाती है। इसकेनियंत्रण के लिए खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें, खेत को खर-पतवार मुक्त रखें, आक्सीडेमेटान मिथाइल 25 ई.सी. का। मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से पानी में मिलाकर छिड़‌काव करें।
  • पाउडरी मिल्ड्यू : इस रोग में पत्तियों पर सफेद पाउडर दिखाई देते हैं। अधिक आक्रमण होने पर शाखायें एवं फूल भी प्रभावित होता हैं इस रोग के कारण पत्तियाँ सूखकर गिर जाती है। इसके नियंत्रण के लिए खेत को खर-पतवार से मुक्त रखें, सल्फर ४। घुलनशील चूर्ण का 3 ग्राम प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़‌काव करें।
  • कजरा कीट : इसके पिल्लू भूरे अथवा स्लेटी रंग के होते है, जिसका शरीर चिकना होता है। दिन में भूमि के अन्दर दार में छिपे रहते है और संध्या के समय बाहर निकल कर छोटे-छोटे पौधों को भूमि की सतह से काट कर गिरा देते है। इसके नियंत्रण के लिए खेतों में प्रकाश फंदा का प्रयोग करें, खेतों में जगह-जगह पर सूखी घास-फूस के ढेर लगा दें, रात्रि में पौधों के खाने के बाद पिल्लू ढेरों में छिप जाते है सुबह इन को हटा कर नष्ट कर दें, मिथाइलपैराथियान 2 प्रतिशत धूल 25 किग्रा, प्रति हे. की दर से अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें।
  • हरदा रोग  : इस रोग में पत्तियों पर पहले गुलाबी रंग का धब्बा बनता है, जो बाद में तना एवं फली पर भी बनने लगता है। प्रभावित पत्तियाँ रंगहीन होकर सूख जाती है। इसके नियंत्रण के लिए रोग रोधी किस्म का प्रयोग करें, खेत को खर-पतवार से मुक्त रखें, रोग ग्रसित पौधो को जला दें, मैन्कोजेब 75 घुलनशील चूर्ण का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें।
  • उखड़ा रोग : इस रोग में पौधो दोपहर में मुरक्षा आते हैं और सुबह में हरा भरा दिखाई देताजिसके कारण पत्तियाँ सूखकर गिर जाती है। इसके नियंत्रण के लिए खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें, रोगरोधी किस्म का प्रयोग करें, फसल चक्र अपनायें, ट्राइकोडरमा 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार कर ही बुआई करें, नीम की खल्ली 2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें।

फसल कटाई : जब पौधो पीले पड़ने लगे और फलिया सूखने लगे तब फसल की कटाई कर लेनी चाहिए।

उपज : प्रभेद एवं फसल प्रबंधन के अनुसार तीसी फसल की उपज प्रति हेक्टेयर 10 से 15 क्विंटल प्राप्त हो सकती है।

तीसी में उत्पादन खर्च एवं मुनाफा प्रति हेक्टर

Simple Table Example
खेत की तैयारी, बीज एवं बुआई खर्च 8450.00 रुपये
पटवन एक सूक्ष्म सिंचाई से 1200.00 रुपये
उर्वरक, निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण 4400.00 रुपये
पौधा संरक्षण 1500.00 रुपये
कटाई एवं मढ़ाई 5000.00 रुपये
कुल खर्च 20,550.00 रुपये
2x2 Table Example
उपज 14 क्विंटल दर 4400/क्वंटल 61,600.00 रुपये
शुद्ध आय प्रति हेक्टर = 61600 -20550 41,050.00 रुपये
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