मशरूम मृत कार्बनिक पदार्थों पर उगने वाला एक प्रकार का कवक (फफूँद) होता है जो वर्षा ऋतु में मिट्टी में से या पौधों की सड़ी-गली पत्तियों में से अपने आप खुम्भ या छतरी नुमा आकार के सफेद, लाल और पीले विभिन्न रंगों के कवक दिखते है। इसी को हम मशरूम कहते है, जिसे हमारे पूर्वज आदिकाल से ही खाने के लिए एवं दवा के रूप में प्रयोग करते आ रहे है। इनमें अन्य वनस्पति के समान हरित पदार्थ (क्लोरोफिल) नहीं होता। अब इसकी वैज्ञानिक खोजों द्वारा जानकारी हो चुकी है। इस पर पूरे विश्व में अनेक वैज्ञानिक एवं संस्थाएँ कार्य कर रही है। मशरूम तकनीकी रूप से वनस्पति कुल में रखा गया है तथा इसे कवक श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। सड रहे पदार्थ में से अपना भोजन कुछ महीन धागो जैसे रचना (कवक जाल) द्वारा सोखते है यह कवकजाल अधिकतर पदार्थ को ऊपरी सतह पर नजर नहीं आते। इनमें प्रजनन बीजाणुओं द्वारा होता है और यह बीजाणु इनके फलनकार्प में बनता है। जिसका हम खाने में उपयोग करते है, इसे ही मशरूम नाम दिया गया है। इसे खुम्बी, छतरी व कुकुरमुत्ता के नाम से भी जाना जाता है।
आदि काल से मशरूम को जंगलो से इकट्ठा कर खाने का बहुत बड़ा प्रचलन रहा है। इन मशरूमों का उत्पादन प्राकृतिक रूप से इतना अधिक होता है कि आदिवासी लोग इसे खाने के साथ-साथ इसे इकट्ठा कर नजदीकी बाजार में बिक्री के लिए ले जाते हैं। कुछ सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि कई टन मशरूम कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड एवं राजस्थान के पहाड़ों एवं जंगलों से इकट्ठा कर दिल्ली व अन्य स्थानों को भेजा जाता है। कश्मीर सरकार के वन विभाग की देखरेख में विश्व का सबसे मंहगा गुच्छी मशरूम या मारवेला मशरूम को पहाड़ो से एकत्र कराया जाता है इससे सरकार को काफी आय प्राप्त हो रहा है। यह यहाँ के लोगो का रोजगार का एक अच्छा साघन है। इससे लाखो परिवार की रोजी चलती है।
वर्तमान में विश्व में मशरूम उत्पादन प्रतिवर्ष 110 लाख टन है और इसमें 10 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से वृद्धि हो रही है। चीन विश्व का अकेले लगभग 65-70 प्रतिशत मशरूम उत्पादन कर रहा है। पिछले कुछ सालों में विशष्ठ मशरूम उत्पादन (आपस्टर मशरूम, मिल्की मशरूम, शिटाके मशरूम तथा कनपचड़ा मशरूम) में वृद्धि के कारण बटन मशरूम का उत्पादन पूरे विश्व में बढ़ा है। इसके अतिरिक्त औषधीय मशरूम जैसे गैनोडरमा (रिशी), मशरूम के उत्पादन में भी चीन अग्रणी देश है।
भारत में मशरूम की स्थिति
भारत में सभी प्रकार की जलवायु एवं व्यर्थ कृषि अवशेष पूरे साल उपलब्ध है। इसलिए यहाँ पर पूरे वर्ष मशरूम की खेती की जा सकती है। ऐसा अनुमान है कि हमारे भारत वर्ष में बहुत सारे कृषि अवशेष को या तो जला दिया जाता है या तो सड़ने के लिए छोड दिया जाता है। यदि इसका कुछ भाग मशरूम उत्पादन में प्रयोग किया जाये तो मशरूम उत्पादन में एक बड़ी कांति आ सकती है और किसानों को इससे दुगुनी आमदनी हो सकती है तथा मशरूम उत्पादन के बाद कार्बनिक पदार्थ खेती में भी उर्वरता बढ़ाएगी।
यद्यपि भारत में श्वेत बटन मशरूम को परीक्षण के तौर पर मशरूम अनुसंधान प्रयोगशाला सोलन में 1961-62 में किया गया परन्तु इसे सही दिशा 1990 के दशक में मिली क्योंकि यहां पर विदेशी कम्पनियों के माध्यम से बड़ी-बड़ी योजनाएं आई। इन योजनाओं के आने से मशरूम उत्पादन 1985-86 में 4000 टन से बढ़कर 1995-96 में 30-75000 टन प्रतिवर्ष हो गया था। इस समय भारत में मशरूम उत्पादन 125000 टन प्रतिवर्ष के आस पास है।
मशरूम का महत्व
ऋग्वेद में मशरूम के महत्व का वर्णन मिलता है। भारतवर्ष की अधिकांश आबादी शाकाहारी है एवं मशरूम का महत्व पोषण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। मशरूम को आहार के रूप में प्राचीन काल से ही उपयोग किया जा रहा है। मशरूम को यूनानियों ने रणभूमि में योद्धाओं को शक्ति प्रदान करने के लिए किया गया था। रोमवासियों ने इसे भगवान के लिए मोजन की संज्ञा भी दी है। किसी भी खाद्य पदार्थ के पौष्टिक गुणों के मूल्यांकन हेतु पोषण विज्ञान में सर्वमान्य तरीका है कि उसमें कितने शुष्क तत्व, ऊर्जा, प्रोटीन, शर्करा, वसा, रेशा, विटामिन्स तथा खनिज तत्व पाये जाते हैं।
मशरूम के पौष्टिक गुण
मशरूम को हमारे पूर्वज इसे सब्जी के रूप में तथा हमारे ऋषि-मुनि इसे दवाइयों के रूप में पहले से ही प्रयोग करते आ रहे है। लेकिन सही मायने में इसकी पौष्टिकता का पता अनुसंधान द्वारा पता चला है कि इसमें उच्चकोटि के प्रोटीन, विटामिन्स, लवण तथा प्रचुर मात्रा में खनिज तत्व विद्यमान है। उच्चकोटि के प्रोटीन का मतलब है, कि इसमें सभी प्रकार के आवश्यक एमिनो एसिड उपलब्ध है। मशरूम में प्रोटीन की मात्रा लगभग 30 से 35 प्रतिशत पायी जाती है। इसमें विशेष रूप से प्रोटीन की पाचन शक्ति 60-70 प्रतिशत तक होती है जो वनस्पति से प्राप्त प्रोटीन से भी अधिक ज्यादा है। मशरूम उत्पादको के भविष्य के हित के लिए यह जानना अति आवश्यक है कि उचित माध्यम एवं तरीके से लोगों को जानकारी दे ताकि इसकी प्रति व्यक्ति खपत बढ़े। विदेशो की अपेक्षा भारत में प्रति व्यक्ति मशरूम की: खपत 35 ग्राम प्रति व्यक्ति है जिसे और बढ़ाया जा सकता है। परिणामतः किसानों की विपणन की रामरया का समाधान हो सके।
मशरूम की पहचान खाद्य एवं कृषि संगठन (FA.O.) द्वारा मालनुट्रिशन (Malnutrition) क्षेत्री के लिए किया गया है। मशरूम में विद्यमान पोषक गुणों एवं इसके उत्पादन में कृषि अवशेषों की उपयोगिता के कारण इसका उत्पादन विगत 15 वर्षों में कई गुना बढ़ गया है मशरूम के पौष्टिक गुण सुखाये जाने अथवा डिब्बा बंद विधि से सुरक्षित करने अथवा आचार बनाने से नष्ट नहीं होते है। किसी भी खाद्य पदार्थ का मुल्याकंन उसमें मौजूद शुष्क तत्व, प्रोटीन, विटामिन्स, कार्बोहाइड्रेट, उर्जा, वसा तथा खनिज तत्व के आधार पर किया जाता है।
मशरूम का नाम | प्रोटीन % | वसा % | कार्बोहाइड्रेट % | ऊर्जा % | खनिज % | रेसा % | पानी % |
---|---|---|---|---|---|---|---|
श्वेत बटन मशरूम | 28.1 | 8.9 | 59.4 | 353 | 9.4 | 8.3 | 90.4 |
आयस्टर मशरूम | 30.4 | 2.2 | 57.6 | 345 | 9.8 | 8.7 | 90.8 |
दुधिया मशरूम | 17.7 | 4.1 | 64.3 | 360 | 7.4 | 3.4 | ए86.0 |
पैडी स्ट्रा मशरूम | 29.5 | 5.7 | 60.0 | 374 | 9.8 | 10.4 | 88.0 |
ऊर्जा (कैलोरी) :
मशरूम उर्जा का एक अच्छा स्रोत एवं न्यूनतम कैलोरी भोजन है, क्योंकि इसमें पानी अधिक (90 प्रतिशत) शुष्क अवयव कम (10 प्रतिशत) और वसा कम (0.6 प्रतिशत) है। वसा की कम मात्रा होने के कारण इसे मोटापा रोग, रक्तचाप एवं हृदय रोग के लिए उपयुक्त आहार माना गया है। 454 ग्राम ताजी मशरूम में 120 किलो कैलोरी पाई जाती है।
प्रोटीन :
मशरूम में 2.5 से 3.5 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है। सुखी हुई अन्य मशरूमों में प्रोटीन 25-30 प्रतिशत हो जाती है जिसकी पाचन शक्ति लगभग 70-90 प्रतिशत तक होती है क्योंकि दूसरी सब्जियों की अपेक्षा मशरूम में उपलब्ध प्रोटीन उच्च गुणवत्ता की है। वैज्ञानिको ने प्रयोग द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि दूध, अंडा, मांस तथा मछली में पाये जाने वाली प्रोटीन, वनस्पती जनित प्रोटीन की अपेक्षा अच्छी गुणवत्ता की होती है क्योकि वनस्पति प्रोटीन में कुछ अमीनों अम्ल की कमी पाई जाती है। जैसे गेहूँ, चावल में लाइसीन तथा ट्रिक्टोफेन की कमी, दालों में मिथियोनीन तथा सिस्टीन की कमी पाई जाती है। गुणवत्ता के मापदण्ड पर दूध को 100 मानकर अन्य खाद्य पदार्थों की तुलना की जाती है।
अन्य खाद्य पदार्थों की तुलना में मशरूम के प्रोटीन की गुणवत्ता
क्रमांक | खाद्य पदार्थ | प्रोटीन की गुणवत्ता |
---|---|---|
1 | अंडा | 95 |
2 | दूध | 100 |
3 | मीट, मछली, मुर्गा | 80-85 |
4 | मशरूम | 82 |
5 | दाल | 40-45 |
6 | गेहूँ, चावल | 50-55 |
विटामिन्स :
वास्तव में मशरूम में प्रचुर मात्रा में विटामिन श्री कॉम्पलेक्स, सी, नियासीन तथा पेन्टोथेनिक अम्ल अधिक मात्रा में पाया जाता है। मशरूम में वसा (तेल) की मात्रा कम होने के कारण वशा में घुलनशील होने वाले विटामिन्स जैसे ए. डी, ई तथा के की मात्रा बिलकुल न के बराबर होती है। मशरूम में आयरन की अधिकता होती है जो कि खून बनाने में अधिक सहायक होती है। जो कि गर्भावस्था तथा एभीनिया के रोगियों के लिए मशरूम एक उत्तम आहार है।
कार्बोहाइड्रेटसम :
शरूम में पाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेटस मैनीटोल 0.9 प्रतिशत, चीनी 0.28 प्रतिशत, ग्लाइकोजन 0.50 प्रतिशत तथा हैगी सैलूलोज 0.91 प्रतिशत मुख्य रूप से पाये जाते है। यह उन लोगो के लिए भी उपयुक्त मानी गई है जो मोटापा दूर करना चाहते है।
वसा :
वसा की मात्रा इसमें केवल 0.3 प्रतिशत होती है और आवश्यक वसा अम्ल लिनालिक एसिड प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह एक आवश्यक फैटी एसिड माना जाता है। इसके साथ ही मशरूम में एगोस्टिरोल होता है जो मानव शरीर में पहुंचकर विटामिन डी में परिवर्तित होता है।
रेशा :
मशरूम में रेशा की मात्रा बहुत अधिक मात्रा में होने के कारण पाचन शक्ति में वृद्धि करता है और हाइपरऐसीडिटी (कब्ज) दूर करता है। रेशा हमारी शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ा देता है। हरी साग-सब्जियों में रेशा की मात्रा अधिक होती है।
खनिज मात्रा :
मशरूम में पौटेशियम, मैग्नीशियम तथा आयरन की मात्रा अधिक होती है। लेकिन कैल्शियम की थोड़ी कमी होती है।
मशरूम के औषधीय गुण :
मशरूम की कुछ प्रजातियों का आयुर्विज्ञान तथा होम्योपैथी में प्रयोग किया गया है। जैसा कि सर्वविदित है कि रोग किसी भी तरह का हो हमारे शरीर के सभी संरचनाओं को प्रभावितकरता है। रोग के कारण भूख न लगना पाचन शक्ति में अवरोध आ जाना सामान्य रूप से देखने में आता है। मशरूम में उपस्थित क्षारीय राख पाचन शक्ति को प्राकृतिक रूप से बढ़ाता प्रकार पूर्व में मशरूम के पौष्टिक गुणों का विवरण दिया गया है उसके अनुसार उच्च रक्तचाप एवं हाइपर टेंशन रोगियों के लिए कब्ज या अजीर्ण रोग, मोटापा, हृदय रोग, कैंसर रोगियों तथा कुपोषण रोगियों के लिए मशरूम का सेवन इनके लिए अति लाभप्रद है। जैसा कि भारतवर्ष में सर्वाधिक पीड़ित मजदूर, महिलाएँ एवं बच्चे है। प्रोटीन एवं विटामिन की कमी इनमें बहुतायत रूप से देखी जाती है। मशरूम में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, विटामिन एवं खनिज उपलब्ध है। मशरूम का सेवन पुलाव, अचार सब्जी अथवा मिश्रित सब्जी किसी भी रूप में किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के फूड एवं एग्रीकल्चर आर्गेनाईजेशन (F.A.O.) ने विकासशील देशों की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए मशरूम को सम्पूरक आहार के तौर पर उपयोग करने की सिफारिश की है।
क्रमांक | मशरूम | रोग |
---|---|---|
1 | रिशी (गॅनोडरमा ल्यूलियन) | कैंसर |
2 | मेटाके (बाइफोला फोन्डोसा) | हृदय रोग |
3 | शिटाके (लेटाइनस इडोड्स) | वृक्क रोग |
4 | कार्गोसेस | मधुमेह |
5 | हेरिसियम | रक्तचाप, एलर्जी, आक्सीडेज |
6 | अमेनिटा मस्केरिया | मिर्गी |
7 | ओटिकुलेरिया औरिकुला | आंखो की सूजन एवं जलन तथा गले की सूजन |
भारत में खेती योग्य मशरूम :
विश्व के अधिकांश देशों में 80-90 के दशक में मशरूम के बारे में काफी कुछ जान लेने के कारण उनमें चेतना जागृत हुई कि मशरूम पर अनुसंधान व विकास की कई योजनाएं भारत वर्ष में चलायी जाय, जिससे लोगों में मशरूम के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी हो। इसी प्रकार इनकी उत्पादन क्षमता, बाजार मूल्य व मांग भी भिन्न-भिन्न है। इन सभी का संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है :
जहरीले एवं न खाने योग्य मशरूम के गुण एवं लक्षण :
मशरूम उच्चकोटि के पौष्टिक तत्वों से भरपूर होता है। परन्तु उनमें से कुछ मशरूम जहरीले व कुछ न खाने योग्य भी होते है। प्राकृतिक रूप से ये मशरूम वनों में, नम मिट्टी के स्थलों पर छतरीनुमा आकार मे तथा विभिन्न रंगो में अपने आप निकलते हुए दिखते है। इस मशरूम की मात्रा जंगली क्षेत्रों में बहुत अधिक होती है। आदिवासी इसे एकत्र कर बाजार-हाट में बेचते है या सुखाकर घरों में रखते है।
इन मशरूमों में कुछ जहरीली तथा न खाने योग्य होते है। ऐसे जहरीली मशरूम को "टोड स्टूल" मशरूम कहते है। इस मशरूम के सेवन से गैस्ट्रोइन्ट्राइटिस रोग लक्षण उत्पन्न होते है। जिससे मृत्यु भी हो सकती है। लेकिन जिस मशरूम की खेती होती है या खेती द्वारा उत्पादित मशरूम पुरी तरह से सुरक्षित होता है, क्योंकि खेती की विधि द्वारा स्वास्थ्यवर्धक प्रोटीन युक्त तथा किसी भी प्रकार से रोगमुक्त मशरूम ही उत्पादित किये जाते है।जहरीले मशरूम केवल प्रकृति में ही उगते हैं। वैज्ञानिको के अनुसार जहरीले मशरूमों को पहचानने के लिए कोई निश्चित विधि नहीं है। केवल अनुभव से ही ज्ञात किया जा सकता है कि कौन सा मशरूम खाने योग्य है और कौन सा नहीं।
लक्षण :
उपयुक्त पहचान के बाद यह समझा जा सकता है कि इन लक्षणों वालें मशरूम जहरीले है। जो मशरूम खाद्य पदार्थों में नहीं आने चाहिए जैसे अधिक रेशोयुक्त, छरहरे, सड़े एवं खराब दिखना, अनचाही गंध आना आदि। ये सभी न खाने वाले मशरूम होते है. जिसे नहीं खाया जाता है।खाने योग्य मशरूम कृत्रिम खेती द्वारा उगाया जाता है इनमें कोई अवगुण नही होते है। अतः यह भ्रांति हमेशा के लिए दूर कर लेना चाहिए कि खेती द्वारा प्राप्त मशरूम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते है अनुसंधान द्वारा ज्ञात कर लिया गया है कि मशरूम की खेती पूर्ण रूप से एक वैज्ञानिक विधि है जिसमें अन्य हानिकारक मशरूम उत्पन्न ही नही हो सकते है। खेती द्वारा उत्पादित बाजार में उपलब्ध मशरूम सुरक्षित एवं स्वच्छ वातावरण में तैयार किये जाते है। इसलिए ध्यान रहे कि मशरूम कुकुरमुत्ता नही बल्कि खेती द्वारा प्राप्त मशरूम मे उच्च कोटि के पोषण तत्व होते है, ये कभी भी जहरीले नही होते तथा इनके सेवन से स्वास्थ्य पर कोई भी विपरीत प्रभाव नही पड़ता है। अतः खेती से प्राप्त मशरूम को उपयोग निर्भय होकर किया जा सकता है।
"देहाती खेती" एक स्मार्ट फार्मिंग टेक्नोलॉजी प्लेटफार्म है, जाहाँ पर खेती-किसानी से जुड़ी हर जानकारी, आधुनिक तकनीक, और ग्रामीण विकास के उपायों को समर्पित है। हमारा उद्देश्य है किसानों को शिक्षित करना, उनकी आय बढ़ाना, और गांवों को समृद्ध बनाना। देहाती खेती का लक्ष्य भारतीय किसानों को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाना है।
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