भारत वर्ष से गुलाब फूल को सर्वश्रेष्ठ फूल माना जाता है तथा इस को फूल का राजा भी कहा जाता है। सौरर्थ एवं सुगंध में गुलाब का फूलों में प्रथम स्थान है। गुलाब प्रकृति-प्रदत्त एक अनमोल उपहार है जिसकी आकर्षक बनावट, सुन्दर आकार, लुभावना रंग एवं अधिक समय तक फूल का सही दशा में बने रहने के कारण इसे अधिक पंसद किया जाता है। यदि गुलाब की खेती वैज्ञानिक विधि से किया जाय तो इसके बगीचे से लगभग पूरे वर्ष फूल प्राप्त किये जा सकते हैं। गुलाब के फूलों का प्रयोग हमारे यहाँ सौन्दर्य प्रदान के अतिरिक्त लक्ष्मी पूजन, मालायें, गुलदस्ते, इत्र, गुलाबजल तथा गुलकन्द आदि बनाने तथा विभिन्न प्रकार के सजावट आदि में प्रयोग किया जाता है।
स्थान का चुनाव :
ऐसा स्थान जहाँ धूप प्रायः पूरे दिन रहती हो अर्थात् गुलाब के लिए स्थान किसी मकान या बड़े पेड़ के पास नहीं होना चाहिए, क्योंकि छाया में गुलाब के पौधों वजड़ों का उचित विकास नहीं हो पाता है। ये अधिक नमी या अधिक पानी पसन्द नहीं करता है। अतः स्थान ऐसा हो जहाँ पर पौधों के चारों तरफ पानी न रूके। चुने हुए स्थान के चारों तरफ तेज हवा को रोकने का प्रबंध होनाचाहिए क्योंकि तेज हवाओं से गुलाब के पौधों को नुकसान होता है।
जलवायु :
गुलाब के लिए शीतोष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु सर्वोत्तम है। गुलाब की खेती के लिए 15.5 - 26.5 डिग्री सेन्टीग्रेट ताप क्रम उचित होता है। कम आर्द्रता वाला सूखा मौसम उपयुक्त होता है। जाड़ा के मौसम में जब तापमान 15-18 डिग्री सेल्सियस हो, अच्छे पुष्प प्राप्त होते हैं।
भूमि :
गुलाब की खेती के लिए सभी प्रकार की भूमि उपयुक्त होती है। लेकिन दोमट,बलुआर दोमट या मटियार दोमट मिटटी जिस में ड्यूमस प्रचुर मात्र में उत्तम होती है तथा पी. एच. मान 6-7 के मध्य होना चाहिए। पौधों के उचित विकास हेतु छायादार या जलजमाव वाली भूमि नहीं होनी चाहिए. ऐसी जगह जहाँ पर पूरे दिन धूप हो अच्छी होती है। छायादार जगह में उगाने से पौधों का एक तो विकास ठीक नहीं होगा, दसरे पाउडरी मिल्ड्यु, रस्ट आदि बीमारी का प्रकोप बढ़ जाता है।
खेत की तैयारी :
गुलाब को जिस खेत में लगाना होता है उसे एक माह (मई-जून) पहले तैयार कर लेना चाहिए और खेत को 15 दिनों तक खुला छोड दें। ताकि खेत में उपस्थित फफूँदी, हानिकारक कीट एवं खरपतवार नष्ट हो जायें। यदि खेत में दीमक की आशंका हो तो 3 लीटर प्रति हे० की दर से क्लोरपायरीफास दवा का प्रयोग कर सकते हैं।
उन्नत किस्में :
गुलाब की किस्मों में मुख्यतः सोनिया, स्वीट हर्ट, सुपर स्टार, सान्द्रा, हैपीनेस, गोल्डमेडल, मनीपौल, बेन्जामिन पौल, अमेरिकन होम, गलैडिएटर, किस ऑफ फायर, क्रिमसन गैलरी फर्स्ट रेट, ग्रेण्ड गाला (काँटा रहित किस्म) आदि है। डमस्करोज एवं नूरजहाँ सुगंधित तेल के लिए सर्वोत्तम मानी गई है।
रोपाई का समय :
पौधे की रोपाई के लिए उपयुक्त समय अंतिम सितंबर से अक्टूबर तक का महीना होता है।
रोपाई :
छोटे आकार वाले पौधों को 30-45 से० मी० की दूरी तथा बड़े आकार वाले पौधो को 60-90 से० मी० (किस्म के अनुसार) की दूरी पर रोपाई करनी चाहिए। रोपाई के पहले पौधो की सभी पतली टहनियों को काटकर हटा दें, केवल 4-5 स्वस्थ टहनियों को हीं रखें तथा इन टहनियों को भी करीब 10-12 सेमी० ऊपर से काटने के बाद हीं रोपाई करनी चाहिए। 25 से० मी० गहरा व 30-40 सेमी० व्यास के गढ्ढे खोदें। प्रति गढ्ढे में 8-10 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद मिलाकर भरें।
पौधों को अलग करके :
वर्षा ऋतु में गुलाब के पौधों के चारों तरु थोड़ी ऊँचाई में मिट्टी चढ़ा दी जाती है। इनके आधार से जब पौधे कुछ बड़े हो जाये तों उनके जड़ तथा कुछ मिट्टी के साथ उठाकर अलग-अलग लगा दिये जाते हैं।
खाद एवं उर्वरक :
गुलाब की खेती में खाद बहुत सोच समझ कर देनी चाहिए। खाद हमोशा नई वृद्धि से पहले तथा कुन्तन (कटिंग) के बाद पर्याप्त मात्रा में देना चाहिए तथा खाद के तुरन्त बाद सिचाई कर देनी चाहिए। गुलाब की खेती के लिए या अच्छे उत्पादन के लिए गुलाब के खेत में 200-250 क्विंटल सडी गोबर की खाद एवं नाइट्रोजन 100 किलोग्राम, फॉसफोरस 50 कि० ग्रा० एवं पोटाश 50 कि० ग्रा० प्रति हे0 की आवश्यकता होती है। व्यवसायिक स्तर पर खेती करने के लिए 5-6 कि० ग्रा० सड़ा हुआ कम्पोस्ट, 10 ग्राम नाइट्रोज न, 10 ग्राम फास्फोरस एवं 15 ग्राम पोटाश प्रति वर्ग मीटर देना चाहिए। आधी मात्रा छँटाई के बाद तथा शेष 45 दिनों बाद दें। भूमि की उर्वराशक्ति एवं पौधों के विकास को ध्यान में रखते हुए 50-100 ग्राम गुलाब मिश्रण (तथे उपग) जो कि बाजार में उपलब्ध है, छँटाई के एक सप्ताह बाद दिया जा सकता है।
कटाई-छुटाइ :
यह क्रिया गुलाब के पौधों से अच्छे आकार के फूल प्राप्त करने के लिए अतिआवश्यक होती है। अक्टूबर-नवम्बर का महीना इस के लिए उपयुक्त है। छंटाई करते समय यह ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि हाईब्रीड टी पौधो की गहरी छंटाई तथा अन्य किस्मों में हल्की स्वस्थ शाखाओं को छोड़कर अन्य सभी कमजोर एवं बीमारीमुक्त शाखाओं को काटकर हटा दें तथा बची हुई शाखाओं को भी 3-6 आँख के ऊपर से तेज चाकू या सिकैटियर द्वारा काट देना चाहिए। अन्य किस्मों में केवल पतली, अस्वस्थ एवं बीमारी मुक्त शाखाओं को ही काटकर हटायें तथा बची हुई शाखाओं की केवल ऊपर से हल्की छँटाई करें।
विंटरिंग :
पौधों को छाँटने के तुरन्त बाद विंटरिंग की क्रिया करते हैं। इस क्रिया में 30-45 से० मी० व्यास एवं 15-20 से०मी० गहराई की मिट्टी को निकालकर 7-10 दिनों तक जड़ों को खुला छोड़ देते हैं उस के बाद खाद एवं मिट्टी मिलाकर गड्ढे को भरकर तथा क्यारियाँ बनाकर सिंचाई करनी चाहिए। इससे पौधों को पूर्णतः आराम मिल जाता है जिस वजह से इसमें वृद्धि अच्छी होती है तथा पुष्प भी बड़े आकार के अधिक संख्या में पैदा होते हैं।
सिंचाई एवं खर पतवार प्रबंधन :
सिंचाई करने का मतलब यहाँ मिट्टी को गीला करना नहीं बल्कि नम करना है। गुलाब केपौधों को वर्षा ऋतु में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। गर्मी के दिनों में गुलाब के पौधों को आवश्यकतानुसार तीन-चार दिनों में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। तथा जाड़े में15-20 दिनों के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार सिचाई करें। फूल समाप्त होने पर सिंचाई बन्द कर दें। गुलाब की क्यारियों में जब खरपतवार दिखाई दे तो उनकी उथली हुई गुड़ाई करके निकाल देना चाहिए, जिससे गुलाब की जड़ों में वायु संचार होता है। यह क्रिया 10-12 दिनों के अन्तर से नियमित करनी चाहिए।
पौधा सरेक्षण :
गुलाब के पौधों में लगने वाले कीड़ों में दीमक, रेड स्केल, जैसिड, लाही थिप्स आदि मुख्य हैं। इस की रोकथाम समय पर करनी आवश्यक होती है। दीमक के लिए क्लोरपाइरीफॉस 2000-5 मि० ली० प्रति 10 वर्ग मीटर की दर से मिट्टी में मिलायें। रेड स्केल एवं जेसिडकीड़े की रोकथाम के लिए इण्टरपिड दवा का 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें। गुलाब की मुख्य बीमारी "डाइबैक" है। यह प्रायः छँटाई के बाद कटे भाग पर लगती है जिससे पौधा धीरे-धीरे ऊपर से नीचे की तरफ सुखते हुए जड़ तक सुख जाता है। तीव्र आक्रमण होने पर पूरा पौधा ही सूख जाता है। इसकी रोकथाम के लिए छँटाई के तुरन्त बाद कटे भाग पर चौबटिया पेस्ट (4 भाग कापर कार्बोनेट + 4 भाग रेड लेड + 5 भाग तीसी का तेल) लगायें। इसके साथ ही खेत की सफाई निकाई-गुड़ाई तथा खाद-उर्वरक उचित मात्रा में व्यवहार करें एवं पौधों को जल जमाव से बचायें, इससे कि बीमारी की रोकथाम में मदद मिलती है। इस बीमारी के अलावा "ब्लैक स्पाट एवं पाउड्री मिल्डयू" जैसी बीमारियों का प्रकोप भी गुलाब के पौधों पर होता है। इस की रोकथाम हेतु केराथेन 0.15 प्रतिशत या सल्फेक्स 0.25 प्रतिशत का छिड़काव करना उपयुक्त होता है।
डंठल की कटाई एवं पैकिंग :
जब पुष्प कली का रंग दिखाई दे ताकि कली कसी हुई हो तो सुबह या सायंकाल पुष्प डंठल को सिकेटयरया तेज चाकू या सिकेटियर से काटकर पानीयुक्त प्लास्टिक बकेट में रखें। इसके बाद 20-20 डंठल का बंडल बनाकर एवं अखबार में लपेट रबर बैंड से बांध दें। कोरोगेटेड कार्डबोर्ड को 100 × 30 से० मी० या 50 × 6-15 से० मी० के बक्से में पैक कर बाजार भेजना चाहिए।
उपज :
किस्मों के क्षमतानुसार 2.5 से 5.0 लाख पुष्प डंठल प्रति हेक्टर उपज प्राप्त होता है।
क्र. स. | विवरण | मात्रा | दर | राशि (रु०) |
---|---|---|---|---|
1 | खेत की तैयारी एवं रेखांकनः | |||
(क) ट्रैक्टर द्वारा जुताई | 8 घंटा | 450/ घंटा | 3600.00 | |
(ख) रेखांकन हेतु कार्यबल | 50 कार्यबल | 275 कार्यबल | 13750.00 | |
2. | बीज एवं बुआई/रोपाई: | |||
(क) बीज | 3703 पौधों | 20/ पौधों | 740740.00 | |
(ख) बीजोपचार (फफूंदनाशी/कीटनाशी रसायन) | 1/ कि.ग्रा. | 5000 कि.ग्रा. | 500.00 | |
(ग) बुआई / रोपाई | 40 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 11000.00 | |
3 | खाद एवं उर्वरकः | |||
(क) गोबर कि सड़ी खादः | 25 टन | 500/ टन | 15000.00 | |
(ख) नत्रजन | 100 किग्रा. | 13.80 किग्रा. | 1380.00 | |
(ग) स्फूर | 50 किग्रा. | 50 किग्रा. | 4000.00 | |
(घ) पोटाश | 100 किग्रा. | 24.50 किग्रा. | 2450.00 | |
(ङ) खाद एवं उर्वरक के व्यवहार | 20 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 1650.00 | |
4 | सिंचाई | 20 सिंचाई | 1000/ कार्यबल | 4000.00 |
5 | निकाई-गुड़ाई | 50 कार्यबल | 275 कार्यबल | 5500.00 |
6 | खर-पतवार नियंत्रण (रसायन का व्यवहार) | 0.00 | ||
7 | पौधा संरक्षण | 2000.00 | ||
8 | फसल की खुदाई, दुलाई एवं बाज़ार व्यवस्था | 30 कार्यबल | 275 कार्यबल | 8200.00 |
9 | भूमि का किराया | 1 वर्ष | 10000/ वर्ष | 7500.00 |
10 | अन्य लागत | 3000.00 | ||
11 | कुल व्यय : 910195.00 रुपये | |||
कुल ऊपज (कुंटल): 370370 फूल/5 रुपए /फूल (10 रुपए/ पौधा) | ||||
कुल आय (रूपये): 1851850.00 रुपये | ||||
शुद्ध आय (रूपये): 941655.00 रुपये | ||||
बिक्री दर @ 5/ रुपये प्रति फूल 10 रुपये प्रति पौधों | ||||
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