हल्दी की खेती
हल्दी देश की प्रमुख मसाला फसल है, क्षेत्रफल एवं उत्पादन में इसका पहला स्थान है। हल्दी का उपयोग हमारे भोजन में प्रतिदिन है। इसका सभी धार्मिक कार्यों में मुख्य स्थान प्राप्त है। साथ ही हल्दी में काफी मात्रा में औषधीय गुण पाया जाता है इसका उपयोग दवा एवं सौंदर्य प्रसाधनों में भी होता है। हल्दी के निर्यात से काफी विदेशी मुद्रा देश को अर्जित हो रही है।
जलवायु :
हल्दी उष्ण एवं उपोषण जलवायु की फसल है, फसल के विकास के लिए गर्म एवं नम जलवायु उपयुक्त होती है। परंतु गांठ बनते समय ठण्डी जलवायु की आवश्यकता होती है। साथ ही इस समय 25 से 30 डिग्री. से. तापमान उपयुक्त पाया गया है।
भूमि :
हल्दी की खेती के लिए जल निकास युक्त बलुई दोमट से हल्की दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। फसल वृद्धि के लिए जीवांश पदार्थों की प्रचुरता आवश्यक है।
खेत की तैयारीः
हल्दी के कंद जमीन में मिट्टी के नीचे बनते हैं इसलिए मिट्टी काफी मुलायम होनी चाहिए। इसके लिए चार-पांच जुताई की आवश्यकता होती है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से शेष कल्टीवेटर अथवा देशी हल से करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाना चाहिए जिससे मिट्टी भुरभुरी बन जाये। अंतिम जुताई के समय 250 से 300 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद अथवा कम्पोस्ट खेत में सामान रूप से बिखेर कर मिट्टी में मिला देनी चाहिए। इसी समय निराई-गुड़ाई तथा सिंचाई सुविधानुसार खेत को क्यारियों में बांट लेना चाहिए।
पोषक तत्व प्रबंधन :
अच्छे उत्पादन के लिए 100 से 150 किग्रा. नेत्रजन, 50 से 60किग्रा. स्फूर, 100 से 120 किग्रा. पोटाश एवं 20 से 25 किग्रा. जिंक सल्फेट की आवश्यकता होती है। स्फूर, पोटाश एवं जिंक को बीज बुआई से पूर्व खेत में सामान रूप से बिखेर कर मिट्टी में मिला देनी चाहिए। नेत्रजन को 3 बराबर भागों में बांटकर पहला बुवाई से 40 से 45 दिनों के बाद, दूसरा 80 से 90 दिन एवं तीसरा 100 से 120 दिन बाद देनीचाहिए।
उन्नत प्रभेद :
हल्दी की खेती के लिए निम्न अनुशंसित प्रभेदों का चयन अपनी आवश्यकतानुसार अथवा स्थानीय वैज्ञानिकों के सलाह पर कर सकते है।
राजेन्द्र सोनियाः
इस किस्म के पौधों छोटे 60 से 80 सेमी. ऊँची तथा 195 से 210 दिन में फसल तैयार हो जाती है। इस किस्म की उपज क्षमता 400 से 450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा पीलापन (कुरकुमिन) 8 से 8.5 प्रतिशत पाया जाता है।
आर.एच. 5:
इसके पौधे भी छोटे जो लगभग 80 से 100 सेंमी. ऊँची तथा 210 से 220 दिन में फसल तैयार हो जाती है। इस किस्म की उपज क्षमता 500 से 550 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा पीलापन 7.0 प्रतिशत होता है।
आर.एच. 1/10:
इसके पौधे मध्य ऊँचाई के लगभग 110-120 सेमी. ऊँचाई की होते हैं तथा फसल 210 से 220 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म की उपज क्षमता 500 से 550 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
आर.एच, 13/90:
इसके पौधे मध्यम आकार के जो 110 से 120 सेमी. ऊँचाई के होते है इसके तैयार होने में 200 से 210 दिनों का समय लगता है। इस किस्म की उपज क्षमता 450 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
आई आई एस आर प्रगति (नयी प्रजाति) :
असिंचित दशा में यह किस्म कम अवधि (मात्र 180 दिनों) में 380 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का उत्पादन होता है जबकि सिंचाई की उत्तम व्यवस्था होने पर इसकी उत्पादकता 500-530 क्विंटल प्राप्त की जा सकती है। इस प्रजाति में औसत कुरकुमिन (पीलापन) 5.02 प्रतिशत पाया जाता है तथा यह सूत्रकृमि रोधी किस्म है।
एन.डी.आर. 19 :
इसके पौधे मध्यम आकार के जो लगभग 115 से 120 सेमी. ऊँचे होते है तथा इसको तैयार होने में 215 से 225 दिनों का समय लगता है। इसकी उपज क्षमता 350 से 375 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
बीज दर :
हल्दी की बुआई के लिए 30 से 35 ग्राम के प्रकंद जिसमें 4 से 5 स्वस्थ्य कलियाँ हो, कि 30 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है।
बुआई का समय :
बुआई के लिए उचित समय 15 मई से 31 मई तक का सर्वोत्तम समय है। बुआई का कार्य समय पर पूरा करना चाहिए जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है।
बीजोपचार
कदे की बुआई से पूर्व उपचारित करना अत्यंत आवश्यक है। जिससे प्रमुख बीमारियों के प्रकोप से फसल को बचाया जा सके। कंद को मैन्कोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण दवा के 2.5 एवं कार्बेन्डाजिम । ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 30 से 40 मिनट तक उपचारित करना चाहिए।
बुआई
इसकी बुआई दो तरह से की जाती है। पहला समतल विधि एवं दूसरा मेड़ विधि जिसे निम्न तरह देखें।
समतल विधिः
इस विधि में भूमि को तैयार कर समतल कर लेते हैं और कुदाल से पंक्ति से पक्ति 30 सेमी. तथा गांठ से गांठ 20 सेमी. की दूरी पर कंद की बुआई की जाती है।
मेड़ विधिः
इसमें दो तरह से की जाती है, एकल पंक्ति विधि तथा दो पंक्ति विधि, एकल पंक्ति विधि में 30 सेमी. के मेड़ पर बीच में 20 सेमी. की दूरी पर गांठ को रख देते हैं तथा 40 सेमी. मिट्टी चढ़ा देते हैं। जबकि दो पंक्ति विधि में 50 सेमी. मेड़ पर दो लाईन में जो पंक्ति से पंक्ति 30 सेमी. तथा गांठ से गांठ 20 सेमी. की दूरी पर रखकर 60 सेमी. मिट्टी ऊपर चढ़ा देते हैं।
झपनी :
बुआई के बाद खेत को शीशम की पत्तियों की 5 सेमी. परत से ढ़क देनी चाहिए। इससे खर-पतवारों का नियंत्रण होता है, साथ ही गांठों का जमाव सामान रूप से होता है।
खरपतवार प्रबंधन :
हल्दी में निराई-गुड़ाई का बहुत अधिक महत्व है, इससे खर-पतवारों का नियंत्रण होता है, वहीं कंदों के विकास के लिए अच्छा अवसर प्राप्त होता है। पहली निराई-गुड़ाई 30 से 40 दिनों के बाद तथा दूसरी 60 से 70 दिनों बाद तथा तीसरी 90 से 100 दिनों के बाद करनी चाहिए। निराई-गुड़ाई के समय पौधों के जड़ों के चारों तरफ मिट्टी चढ़ाना चाहिए।
सिंचाई प्रबंधन :
हल्दी फसल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है. गांठ बनते समय या सितंबर-अक्टूबर में एक सिंचाई की आवश्यकता होती है।
पौधा संरक्षण :
हल्दी में कीट एवं बीमारियों के प्रकोप से फसल को काफी क्षति होती है जिससे नियंत्रण से क्षति को कम किया जा सकता है जो निम्नवत है।
तना छेदक :
इसके व्यस्क कीट पीले-भूरे रंग के होते हैं तथा पिल्लू पीले रंग के होते हैं। इसके पिल्लू तने को छेद कर तना के भीतरी भाग को खाते हैं अंत में पौधे मर जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए पौधो के आक्रान्त भाग को काटकर नष्ट कर दें। खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें साथ ही खेत को खरपतवार से मुक्त रखें। मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी. तरल का 800 मिलीलीटर 800 से 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें।
थ्रिप्स :
यह कीट देखने में छोटा काला-भूरा तथा बेलनाकार होता है। कीट के व्यस्क एवं शिशु पत्तियों को खुरचकर उससे निकलने वाले द्रव्य को चूसता है जिसके कारण पत्तियों पर जगह-जगह उजले धब्बे बन जाते हैं, अधिक आक्रमण की स्थिति में पौधे मर जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए खेत में मित्र कीटों का संरक्षण करें, नीम आधारित जैविक कीटनाशी का 5 मिली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। ऑक्सीडेमेटान मिथाइल 25 ई.सी. का 800 मिलीलीटर 800 से 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
प्रकन्द सड़न रोग :
इस रोग में पौधे की पत्तियाँ पीली होकर मुरझा जाती है, जो बाद में सूख कर मर जाती है। इसके नियंत्रण के लिए खेत में जल निकास का उत्तम प्रबंधन करें साथ ही फसल चक्र अपनायें एवं कार्बेन्डाजिम तथा मैन्कोजेब संयुक्त उत्पाद का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर प्रकन्द को आधे घण्टे तक उपचारित कर बुआई करें। मैन्कोजेब 75 घुलनशील चूर्ण का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें, आवश्यकतानुसार 15 दिनों पर पुनः छिड़काव करें।
उपज :
हल्दी की उपज किस्म एवं उत्पादन के तौर तरीकों पर निर्भर करता है। हल्दी की औसत उपज 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
हल्दी की खेती में प्रति हेक्टेयर आय व्यय का आकलन (वर्ष 2020-21 के अनुसार)
क्र. स. | विवरण | मात्रा | दर | राशि (रु०) |
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1 | खेत की तैयारी एवं रेखांकनः | |||
(क) ट्रैक्टर द्वारा जुताई | 8 घंटा | 450/ घंटा | 3600.00 | |
(ख) रेखांकन हेतु कार्यबल | 20 कार्यबल | 275 कार्यबल | 5500.00 | |
2. | बीज एवं बुआई/रोपाई: | |||
(क) बीज | 20 कुंटल | 3000 / कुंटल | 60,000.00 | |
(ख) बीजोपचार (फफूंदनाशी/कीटनाशी रसायन) | 500 ग्रा. | 500/ कि.ग्रा. | 250.00 | |
(ग) बुआई / रोपाई | 15 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 4125.00 | |
3 | खाद एवं उर्वरकः | |||
(क) गोबर कि सड़ी खादः | 25 टन | 500/ टन | 12500.00 | |
(ख) नत्रजन | 75 किग्रा. | 13.80 किग्रा. | 1035.00 | |
(ग) स्फूर | 50 किग्रा. | 50 किग्रा. | 2500.00 | |
(घ) पोटाश | 50 किग्रा. | 24.50 किग्रा. | 1225.00 | |
(ङ) खाद एवं उर्वरक के व्यवहार | 6 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 1650.00 | |
4 | सिंचाई | 02 कार्यबल | 1000/ सिंचाई | 2000.00 |
5 | निकाई-गुड़ाई | 20 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 5500.00 |
6 | खर-पतवार नियंत्रण (रसायन का व्यवहार) | 3000.00 | ||
7 | पौधा संरक्षण | 4000.00 | ||
8 | फसल की खुदाई, दुलाई एवं बाज़ार व्यवस्था | 30 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 8250.00 |
9 | भूमि का किराया | 10000/ वर्ष | 5000.00 | |
10 | अन्य लागत | 4000.00 | ||
11 | कुल व्यय : 137135.00 रुपये | |||
कुल ऊपज : 250 कुंटल | ||||
कुल आय (रूपये): 500000.00 रुपये | ||||
शुद्ध आय (रूपये): 362865.00 रूपये | ||||
बिक्री दर @ 2000/ रु. प्रति कुंटल | ||||