श्वेत बटन मशरूम पूरे भारत वर्ष में सर्वाधिक लोकप्रिय मशरूम है, जो कई वर्षों से होटलो, शादी विवाह एवं सर्वोच्च पार्टियों में विशिष्ट स्थान रखता है। इस मशरूम का उत्पादन पौध अवशेषों के साथ कई तरह के रसायनों को मिश्रित कर कम्पोस्ट (खाद) पर किया जाता है। श्वेत बटन मशरूम का उत्पादन उत्तरी भारत में हरियाणा, पंजाब एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किया जा रहा है। हरियाणा के ज्यादातर जिले जैसे सोनीपत, पानीपत, करनाल एवं मेवात में व्यापक स्तर पर इसकी खेती की जा रही है। उत्पादित मशरूम को दिल्ली एवं अन्य बड़े शहरों में बेचा जाता है। देश के मेट्रो शहर में अब श्वेत बटन मशरूम बाजारों में उपलब्ध है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उच्च कोटि की कोई भी पार्टी मशरूम के बिना आयोजित नहीं की जा रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार मशरूम की मांगें दिन व दिन बढ़ोतरी हो रही है। उत्तरीय भारत में अधिकांश शहरो में, दक्षिण भारत में बैंगलोर, मैसूर, मदास, कोचिन आदि में मशरूम की मांग बढ़ती जा रही है।
श्वेत बटन मशरूम जिसका वानस्पतिक नाम एगेरिकस बाइस्पोरस (Aqaricus bisporus) है। यह पूरे विश्व में सर्वाधिक उत्पादन किया जाना वाला मशरूम है। इस मशरूम के वानस्पतिक वृद्धि के लिए 23±1 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है जबकि मशरूम उत्पादन के लिए 14-18 डिग्री सेल्सियस तापमान लगातार 30-35 दिनों तक उपलब्ध होना चाहिए। अत्यधिक कम तापमान भी उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
उत्पादन विधि :
श्वेत बटन मशरूम की खेती के लिए निम्नलिखित विधियों द्वारा क्रमवार करना चाहिए :
कम्पोस्ट एवं कम्पोस्ट बनाने की विधियाँ :
कम्पोस्ट का अर्थ
मशरूम उत्पादन के लिए तैयार गेहूँ का भूसा या धान पैरा व अन्य पदार्थो के मिश्रण कने कम्पोस्ट कहते है। जो श्वेत बटन मशरूम की खेती के लिए पौध अवशेष रसायन और जानवरों या मुर्गियों के खाद इत्यादि को मिश्रित कर एक निश्चित विधि से तैयार किया जाता है। इस मिश्रण को कुछ ऐसा उपचारित या सड़ाया किया जाता है कि उसमें मशरूम के वानस्पतिक बाढ़ को प्रोत्साहन मिलता है क्योंकि यह मशरूम की खेती की पहली आवश्यकता है।
इसकी आवश्यकता क्यो ?
आमतौर पर खाद को बनाने के लिए जो तकनीक प्रयोग में लायी जाती है उसमें एक माध्यम तैयार किया जाता है, जिसमें केवल विशिष्ट फफूंद की ही पैदावार हो तथा अन्य फफूंदियों व जीवाणुओं के लिए अनुकूल न हो। इस तरह के माध्यम को ही चयनात्मक कहा जाता है। इसलिए यह अनिवार्य है कि खाद या दूसरी सामग्री की खाद बनाई जाए, ताकि एक ऐसे माध्यम की रचना हो सके, जो टिकाऊ हो और उसमें सहज प्राप्त पुष्टिकाओं की मात्रा प्रतियोगी जीवों के लिए कम हो जाए। इस तरह की कम्पोस्ट तैयार करना मशरूम उत्पादन में सर्वाधिक कठिन कार्य है तथा संतोषजनक परिणाम काफी लंबे अनुभव के बाद प्राप्त होते है।
कम्पोस्ट बनाने की तकनीक:
कम्पोस्ट तैयार करने से पहले यह आवश्यक है कि सामग्री के लिए सही तत्वों का सही मात्रा में चयन किया जाए। भारत वर्ष में घोड़ो का प्रतिस्थापन, कारों, ट्रको व ट्रैक्टरों द्वारा लेने से लीद की जगह एक प्रतिस्थापन मिश्रण की खोजबीन शुरू हो गई थी। अमेरिका में आज भी एक सफल मिश्रण सिन्डेन ने सन् 1964 में किया। यह मिश्रण मक्का के पौधों के टुकड़ो, शिब्बा फली, घास, जिप्सम, अमोनियम नाइट्रेट, म्यूरेट आफ पोटाश तथा सूखा बुरज्ज ग्रेन का बना होता था। दूसरे संशलेषी सूत्रीकरण का आविष्कार बाद में हुआ. जिनका दूसरे देशों में सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया। इस सामग्री में गेहूँ तथा चावल का मूसा प्रमुख है। गेहूँ के भूसे (तूड़ी) का प्रचलन अधिक है। क्योंकि यह आसानी से सभी जगह मिल जाता है। उन भागों में जहाँ चावल की खेती अधिक होती है वहां पर इसके भूसे का प्रयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य अनाजों के भूसे जैसे जई. जी. ज्वार या कोइ भी अन्य कृषि व्यर्थ अवशेष जिनमें सेलूकोज अधिक मात्रा में हो. प्रयोग में लाए जा सकते है। भूसे के अतिरिक्त जो सामग्री इस मिश्रण में डाली जाती है उसका एक अनुपात में डाला जाता है।
कम्पोस्ट की किस्में :
कम्पोस्ट खाद की आमतौर पर दो किस्में होती हैं-
प्राकृतिक खाद :
प्राकृतिक खाद को घोडे की लीद से बनाया जाता है। इसे अस्तबलों से इकट्ठा किया जाता है, जहाँ बिछौने के लिए घास, गेहूँ या जौ के भूसे का प्रयोग किया गया है। इस खाद में अन्य खादों की अपेक्षा मशरूम की अधिक पैदावार होती है।
संश्लेषित खाद :
इस खाद को बनाने के लिए गेहूँ का भूसा, धान का पुआल या दूसरी वानस्पतिक सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है।
इन दोनों प्रकार की खाद में मूल या आधार सामग्री के अतिरिक्त अन्य उत्पादन मुर्गी की खाद, चोकर, यूरिया जैसे उत्प्रेरक भी मिलाए जाते है। क्योंकि भूसे में नाइट्रोजन व अन्य आवश्यक तत्वों की मात्रा बहुत कम होती है जिससे सड़ने की प्रक्रिया बहुत ही धीमी होतीहै। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए उत्प्रेरकों का प्रयोग किया जाता है।
कम्पोस्ट में प्रयोग लाए जाने वाले पूरक :
कम्पोस्ट को बनाने के लिए दो तरह के पूरकों की आवश्यकता होती है-
वानस्पतिक मूल पूरक
कम्पोस्ट को गेहूँ का भूसा तथा धान की पुआल के साथ कार्बनिक और अकार्बनिक उत्प्रेरिकों को निर्धारित अनुपात में मिलाकर बनाया जाता है। विदेशो में विशेषतया युरोप में घोड़े की लीद ही मूल आधार सामग्री मानकर खाद बनाई जाती है। जबकि हमारे भारतवर्ष में गेहूँ का भूसा तथा धान का भूसा को मूल आधार मानकर कम्पोस्ट बनाई जाती है क्योंकि यह हमारे देश में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
अन्य पूरक :
खाद/कम्पोस्ट का सूत्रीकरण :
कम्पोस्ट ही वह पदार्थ है जिस पर मशरूम को उगाया जाता है संतुलित मिश्रण में कई तरह के सूक्ष्म जीवों को जीव रासायनिक क्रियाओं मिश्रण को इस तरह प्रभावित करती हैकि उन्हें वानस्पतिक बढ़वार के लिए उपयुक्त रूप दे देती है। कम्पोस्टिंग करने से कार्बनिक पदार्थों का विघटन होता है, सूक्ष्म जैविक प्रोटीन बनाते है तथा रेशेदार क्रिया द्वारा मिश्रण में सभी तरह के पोषण तत्व तैयार हो जाते है।
उपरोक्त वस्तुओं की मात्रा इस प्रकार निश्चित की जाती है कि सामग्री में नाइट्रोजन शुष्क भार का 1.5-1.75 प्रतिशत तक हो तथा कार्बन नाईट्रोजन में 25-30:1 प्रतिशत का अनुपात हो। यह प्रक्रिया पूरी होने के समय अनुपात 16:1 पर आ जाता है। इसके आधार पर कम्पोस्ट का सूत्र बनाया जाता है जिसमें प्रत्येक वस्तु की मात्रा निश्चित हो जाती है। इसी प्रक्रिया को सूत्रीकरण कहते है। प्रयोगों द्वारा कम्पोस्ट बनाने के कई सूत्रों का परीक्षण किया गया है। सर्वाधिक उपयुक्त कुछ सूत्र नीचे दिये जा रहे है, जिनमें से उपलब्ध सामग्रियों के आधार पर सुविधानुसार फार्मूला चुना जा सकता है।
वस्तु | मात्रा कि.ग्रा. | पानी प्र.श. | शुष्क भार कि.ग्रा. | नाइट्रोजन प्र.श. | नाइट्रोजन कि.ग्रा. |
---|---|---|---|---|---|
गेहूँ का भूसा | 300 | 10 | 270 | 0.4 | 1.08 |
चोकर | 15 | 10 | 13.5 | 2.0 | 0.27 |
मुर्गी की खाद | 125 | 10 | 112.5 | 2.6 | 2.94 |
युरिया | 5.5 | - | 5.5 | 4.6 | 2.53 |
जिप्सम | 20 | - | 20.0 | - | - |
कुल | 465.5 | - | 421.5 | - | 6.8 |
नाइट्रोजन (प्रतिशत) = 6.8 x 100 = 1.61
421.5
वस्तु | मात्रा (कि.ग्रा.) |
---|---|
गेहूँ का भूसा | 300.00 |
किसान खाद (केन) | 9.00 |
युरिया | 3.66 |
चोकर | 15.00 |
जिप्सम | 30.00 |
वस्तु | मात्रा (कि.ग्रा.) |
---|---|
धान की पराली | 300.00 |
घोड़े की लीद | 12.00 |
केन | 4.5 |
युरिया | 5.00 |
म्यूरेट आफ पोटाश | 2.00 |
जिप्सम | 30.00 |
बिनौले की खली | 5.00 |
वस्तु | मात्रा (कि.ग्रा.) |
---|---|
घोड़े की लीद | 1000.00 |
गेहूँ का भूसा | 500.00 |
मुर्गी की खाद | 300.00 |
युरिया | 7.00 |
ब्रूयर्स ग्रेन | 60.00 |
जिप्सम | 30.00 |
वस्तु | मात्रा (कि.ग्रा.) |
---|---|
गेहूँ या चावल का भूसा | 300.00 |
युरिया | 4.50 |
कैन | 6.00 |
सुपर फास्फेट | 2.50 |
म्युरेट आफ पोटाश | 3.00 |
चोकर | 15.00 |
शीरा | 5.00 |
जिप्सम | 30.00 |
कम्पोस्ट बनाने की विधि :
विदेशो में जहाँ यह उद्योग काफी विकसित है लम्बी अवधि की विधि से तैयार नहीं की जाती, लेकिन हमारे देश में अब भी लम्बी अवधि की खाद मौसमी मशरूम उत्पादकों में काफी प्रचलित है। हमारे देश में कम्पोस्ट बनाने की मुख्यतः दो विधियों प्रचलित है :-
1. लम्बी अवधि से कम्पोस्ट बनाने की प्रणाली।
2. अल्पावधि (छोटी) से कम्पोस्ट बनाने की प्रणाली।
खाद को लम्बी अवधि तथा अल्पावधि दोनो ही ढंग से तैयार किया जाता है। लम्बी अवधि से तैयार की गई खाद में कई प्रकार की बीमारियों लगने की संभावना रहती है, लेकिन अल्पावधि वाली विधि से बनायी गई खाद में बीमारी की कम संभावना रहती है। अतः मशरूम उत्पादन के लिए खाद तैयार करने के लिए अल्पावधि की विधि ही लाभदायक रहती है।
अल्पावधि से खाद बनाने में निम्नलिखित लाभ है-
लम्बी अवधि से खाद बनाना :
यह विधि लगभग 28 दिन में पूरी की जाती है। खाद बनाने के पक्के फर्श का होना अति आवश्यक है यदि पक्का फर्श नहीं है तो जहाँ पर खाद बनाने की प्रक्रिया पूरी करनी है उस जगह को अच्छी तरह से साफ-सफाई कर फार्मलीन से उस जमीन को उपचारित कर लेना चाहिए। लेकिन यदि फर्श के साथ-साथ छत भी हो तो खाद का वर्षा आदि से बचाव हो जाता है। इस अवधि में कम्पोस्ट को लगभग 8 बार उलट-पुलट किया जाता है। इस विधि की विशेषता यह है कि कम्पोस्ट की निर्जीवीकरण की आवश्यकता नहीं होती। चूँकि निर्जीवीकरण करने के लिए कुछ विशेष यंत्रो जैसे बायलर, ब्लोवर एवं इनसुलेटेड चैम्बर की आवश्यकता होती है। जो हर किसी मशरूम उत्पादक के पास नहीं होती है। इसलिए इसका प्रचलन छोटे एवं मध्यम स्तर के उत्पादकों में अधिक है।
यद्यपि इस विधि से तैयार कम्पोस्ट में पोषण क्षमता कुछ कम होती है एवं कई तरह के सूक्ष्म जीव जैसे मोल्डस (फफूँद), सूत्रकृमि तथा कीट प्रकोप से संक्रमित हो सकते है। फिर भी इस विधि द्वारा तैयार कम्पोस्ट से सफल खेती की जा सकती है। केवल व्याधियों की रोकथाम के लिए उत्पादक को सचेत एवं होशियार रहना पड़ता है। अल्पावधि की अपेक्षा इसमें 10 दिन का समय ज्यादा लगता है।
कार्य विधि:
ढेर बनाने से दो दिन (48 घण्टे) पहले भूसे को पक्के फर्श पर अच्छी तरह गीला रखा जाता है। गीला करते समय भूसे को पैरो से दबाया या ऊपर-नीचे करके अच्छी तरह से भिगोया जाता है। जिससे भूसा पूरा पानी सोख ले। जिस फर्श पर यह कार्य कर रहे है वह फर्श एक तरफ ढाल लिये हो और उसी तरफ एक नाली हो जो किसी गढ्ढे (हाँद) में घुलती हो तो अच्छा रहता है। इस गढ्ढे में जो पानी इकट्ठा होता है उसको दोबारा प्रयोग में लाने से रिसे हुए पानी में पोषक तत्व उसी खाद में मिलाया जा सकता है और पोषक तत्व नष्टहोने से बच जाता है। ढेर बनाने से पहले चोकर एवं उर्वरक (अमोनियम सल्फेट, सुपर फारफेट और युरिया) को मिश्रित कर कम्पोस्टिंग के 24 घण्टे पूर्व अलग से गीला रखा जाता है। इस मिश्रण को गीली जूट की बोरी या टाट से ढक कर रख लेना चाहिए। इससे उर्वरक अच्छी तरह से घुल जायेंगे। लम्बी अवधि में मुर्गी की खाद न प्रयोग करे तो अच्छा रहता है नहीं तो मोल्ड (फफूँद) आने की सम्भावना बढ़ जाती है।
शून्य दिवस :
जिस दिन से कम्पोस्टिंग के लिए विभिन्न पदार्थों को मिश्रित कर लकड़ी की फट्टो की सहायता से ढेर बना दिया जाता है, उस दिन से कम्पोस्टिंग की क्रिया आरम्भ मानी जाती है और इसे शून्य दिवस कहते है।
इस दिन लकड़ी के तीन तख्ते जिनकी लम्बाई व चौड़ाई एवं ऊचाई (5×5×5 फुट) हो, इस प्रकार खड़ा किया जाता है कि मानो एक कमरे की तीन दीवारें है। अब गीले भूसे को एक समान 30-35 सेमी की तह में खाद को चबूतरे पर बिछा देना चाहिए और उसके ऊपर उर्वरक मिश्रण का छिड़काव या बिखेर देना चाहिए। जंदरे की सहायता से इस मिश्रण को पूर्णतया गीले भूसे से मिला देना चाहिए। इसको अच्छी तरह से मिला लेने के बाद लकड़ी के फट्टों के बीच में भर दिया जाता है तथा हल्का-हल्का दबाया जाता है। यदि कोई भाग सूखा दिखाई देता है तो उसे गढ्ढ़ो में एकत्रित पानी से दुबारा भूसा या मिश्रण के ऊपर डालकर गीला कर दिया जाता है। जब यह जगह तख्ते की ऊंचाई तक पूरी भर जाती है तब दाएँ-बाएँ दोनों तख्तों को आगे खिसका कर और जगह बना ली जाती है। इस प्रकार जब तक भूसा व मिश्रण खत्म नही होते तब तक लम्बा ढेर बनाते चले जाते है। ढेर बनाने के 24-48 घण्टे के अन्दर ही इस ढेर का तापमान बढ़ना शुरू हो जाता है। जो कि इसका तापमान 70-75 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। घ्यार रहे यदि ढेरी की ऊंचाई अधिक हो जायगी तो ढेर में हवा (आक्सीजन) की कमी से सड़न उत्पन्न हो सकती है, उसी प्रकार यदि ढेर की ऊचाई कम होने पर अपेक्षित गर्मी उत्पन्न न हो सकेगी जो कि मिश्रण के सड़न के लिए अति आवश्यक है। इस देरी को 4 दिन तक बिना किसी व्यवधान के रखा रहने देना चाहिए।
6ठे दिन (पहली पलटाई) :
उपर्युक्त ढेरी को पहली बार उलट-पुलट किया जाता है। मुख्यतः इसकी तीन भागों में बांटकर इसकी पलटाई निश्चित की जाती है। बाहरी भाग जो कि खुला रहने से आमतौर पर शुष्क रहता है। तथा अच्छी तरह से सड़ते-गलते नही है। बाहरी भाग का तापक्रम लगभग 30-35 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। जो कि इस तापक्रम पर सूक्ष्म जीव सक्रिय नही रहते। मध्य भाग जिसका तापक्रम लगभग 65 डिग्री सेल्सियस से अधिक होता है इसी भाग में सुक्ष्म जीव ज्यादा सक्रिय होने के कारण मध्य भाग में सड़ने की प्रक्रिया तेज होती है।
अन्तिम भाग में तापक्रम 70-75 डिग्री सेल्यिस के बीच होने के कारण इस भाग में भी राढ़ने की प्रक्रिया धीमी होती है। अतः बेर के प्रत्येक हिस्से को उलट-पलट कर ठीक तापमान पर ले जाना जरूरी होता है। इसके लिए बेरी को फावडे के द्वारा काटकर फैला दिया जाता है जिससे उसमें हवा लग जाये। अब इसमें थोड़ा पानी भी डाल दिया जाता है जिससे मिश्रण का सूखापन दूर हो जाता है। इस उलट-पुलट के तुरन्त बाद मिश्रण को पुनः देरी के रूप में बदल दिया जाता है। लकड़ी की फट्टों की मदद से बेरी की लम्बाई, उचाई, चौड़ाई को पूर्णतः बनाकर बिना किसी व्यवधान के चार दिन तक रखा रहने दिया जाता है।
10 वाँ दिन (दूसरी पलटाई) :
आज का दिन दूसरी बार बेरी को उलट-पुलट करने का दिन है। इस दिन भी फावडे के द्वारा ढेरी को काटकर पीछे की तरफ से अच्छी तरह उलट-पलट कर पुनः ढेरी में परिणि ात कर दिया जाता है। इसमें आवश्यकतानुसार पानी अवश्य डालना चाहिए। अब देरी की ऊँचाई कुछ कम हो जायेगी। इसलिए देरी दबाने का कार्य नहीं करना चाहिए। इस ढेरी को अगले तीन दिनों तक रखा रहने दिया जाता है।
13 वें दिन (तीसरी पलटाई) :
आज का दिन ढेरी को तीसरी बार उलट-पुलट करने का दिन है। ढेरी को पुनः फावडे से काटकर आगे की तरफ से उलट-पुलट करने के लिए फैलायें और उसमें जिप्सम की पूरी मात्रा मिला दे। इसके बाद पुनः ढेरी में बदल दें।
जिप्सम का कार्य :
जिप्सम वानस्पतिक एवं जीव-जन्तुओं के कोशिकाओं का एक अनिवार्य घटक है। खाद की प्रक्रिया में इसका खास महत्व है:-
16वें दिन (चौथी पलटाई) :
आज का दिन चौथी बार उलट-पुलट करने का दिन है। खाद के ढेर को ठीक उसी जगह से तोड़ना चाहिए जैसा कि दसवें दिन किया था तथा फिर से ढ़ेर बना देना चाहिए।
19वें दिन (पांचवी पलटाई) :
इस दिन खाद के डेले बन जाने की संभावना होती है जिसे अवश्य ही तोड़ देना चाहिए। इस समय डेरी दबाने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं होती। अब इस बेरी को पुनः तीन दिन के लिए छोड़ देते है।
22वें दिन (छठी पलटाई) :
इस दिन उलट-पुलट करते समय मिश्रण में से अमोनिया गैस की गना धीरे-धीरे समाप्त होना चाहिए। पुनः डेरी बनाकर तीन दिन तक छोड़ देते है।
25वें दिन (सातवी पलटाई) :
इस दिन सातवी पलटाई दी जाती है। बेर बनाते समय मिश्रण को थोड़ा फैलाकर और बेले आदि को तोडकर उसमें पयुराडान या लिण्डेन (800-900 ग्राम प्रति टन भूसा) को अच्छी तरह से मिलाकर ढेर बना दिया जाता है। यह प्रक्रिया पाँचवी पलटाई में भी की जा सकती है।
28वें दिन (आठवीं पलटाई) :
इस दिन कम्पोस्ट का परीक्षण अमोनिया व पानी के लिए किया जाता है। इस दिन लगभग कम्पोस्ट बनकर तैयार रहती है। पानी की मात्रा का पहचान करने का सबसे आसान तरीका है कि थोड़ी सी खाद, जितनी हाथ की मुट्ठी में आ जाए, को लेकर जोर से दबाना चाहिए तथा पानी दोनों उंगलियों के बीच से धीने से बाहर आना चाहिए, परन्तु लगातार पानी नहीं टपकना चाहिए। पानी की यही मात्रा सबसे उत्तम मानी गई है। जो कि 60-70 प्रतिशत तक होती है। और खाद में अमोनिया गैस आदि नही है तो खाद को किसी भी प्रकार के पात्रों में बिजाई के लिए भर दिया जाता है।
यदि विपरीत परिस्थितियों में खाद में अब भी अगर अमोनिया रह जाए और पानी की मात्रा ज्यादा हो तो तीन दिन बाद एक पलटाई और दे दी जाती है। जब तक अमोनिया खत्म न हो जाए, बिजाई नहीं करनी चाहिए नहीं तो मशरूम में फफूंद मर जाते है। अतः तैयार कम्पोस्ट में निम्नलिखित लक्षण होना चाहिए :
लम्बी विधि द्वारा तैयार खाद का रासायनिक उपचार :
ऐसा देखा गया है कि लम्बी विधि से बनाई गई खाद में कई तरह की बीमारियों जिसमें पौली फफूंद मुख्य है घर कर लेती है। जिससे उत्पादन काफी घट जाती है। राष्ट्रीय खुम्भअनुसंधान केन्द्र, सोलन ने खाद में लगने वाली पीली फफूंद और अन्य बिमारियों से निजात पाने का एक साधारण रासायनिक विधि विकसित की है।
इस विधि के अनुसार जब खाद पूर्ण रूप से तैयार हो जाये तो उसे फर्श पर फैला दे और करीब 40 लीटर पानी में 1.5 ली० फार्मेलीन व 50 ग्राम बाविस्टिन का घोल बना ले। अब इस घोल को पूरी खाद पर (1) टन खाद) अच्छी तरह से स्प्रे करते हुए मिलायें। इसके बाद इस खाद का एक ढेर बना ले और इसे पॉलीथीन सीट या त्रिपाल से दो दिन के लिए ढक दे। दो दिन के बाद पॉलीथीन हटा लें और बेलचे से पलटाई करें और बाद में इस खाद में बीजाई कर दें।
अल्प अवधि से खाद तैयार करने की विधि :
इस विधि से खाद बनाने का ढंग प्रायः एक जैसा ही रहता है, चाहे हम कोई भी सूत्रीकरण प्रयोग में लाए। अल्प अवधि वाले तरीके से खाद बनाने का कार्यक्रम लम्बी अवधि वाले तरीके से बिल्कुल अलग है। कम्पोस्टिंग की यह विधि केवल 18 दिन में पुरी हो जाती है जो इस विधि से तैयार कम्पोस्ट अपेक्षाकृत अधिक उत्पादन देते है एवं रोग व कीट से कम प्रभावित होते है। लघु कम्पोस्टिंग विधि दो चरणों में पूरी की जाती है:-
1. प्रथम चरण (अनाक्सीकृत ढेरी करना) :
कम्पोस्टिंग की यह विधि केवल 15-18 दिन में पूरी हो जाती है। इस विधि से तैयार कम्पोस्ट अपेक्षाकृत अधिक उत्पादन देते है एवं रोग व कीट से कम प्रभावित होते है। यही कारण है कि अधिकांश उत्पादक इसी विधि द्वारा खाद बनाते है।
कम्पोस्टिंग की क्रिया आरंभ करने के 4 दिन पूर्व गेहूँ के भूसे को पानी से गीला किया जाता है। गीला करने की विधि जैसे लम्बी विधि के समान ही अच्छी तरह से ऊपर-नीचे करके गीला कर भूसे का ढेर बना देते है। खाद बनाने के दो दिन पूर्व ढेर को तोड़कर आवश्यकतानुसार और पानी डालकर एक बार फिर दबाकर ढेर बना देते है। इस तरहकम्पोस्टिंग के पहले 4 दिन की क्रिया द्वारा गेहूँ का भूसा या पैरा कुट्टी की अनाक्सीकृत (आक्सीजन के बिना) देरी करना कहते है।
2. द्वितीय चरण (भीतरी खाद बनाना) :
इसकी आवश्यकता निम्नलिखित हैं :
निर्जीवीकरण (पाश्चुराइजेशन) :
कम्पोस्ट को निर्जीवीकरण करने के लिए विशेषकक्ष की आवश्यकता होती है। इस कक्ष में एक तरफ बल्क/ट्रेज की रखा जाता है। और दूसरी ओर गर्म हवा एवं भाप को प्रभावित करने का प्रबन्ध होता है। यह कक्ष बाहर से बन्द करने पर पूरी तरह से सील हो जाता है, लेकिन अन्दर के भाग का तापमान बाहर से भी देखने का प्रबन्ध किया जाता है। कक्ष में खाद या खाद से भरी ट्रे जितना शीघ्र हो सके लगा देना चाहिए, ताकि खाद द्वारा पैदा की गई उष्मा का नुकसान न हो।
कम्पोस्ट को पाश्चुराइज करने के लिए प्रथम चौबीस घण्टे तक कक्ष का तापमान 40-50 डिग्री से.ग्रे. तक बनाया जाता है, यह तापमान कमरे में गर्म हवा छोड़ने से प्राप्त किया जाता है। इसके पश्चात् अगले 24 घण्टे तक कक्ष का तापमान 50-60 डिग्री सेन्टीग्रेट तक बढ़ा दिया जाता है। कमरे में खाद तथा वायु का तापमान यही होना चाहिए। फिर अगले दिन कमरे में भाप छोड़ी जाती है और कक्ष का तापमान 60 डिग्री सेन्टीग्रेट तक बढ़ा दिया जाता है। जिस पर कम से कम 4-6 घन्टे रखा जाता है। इस विधि द्वारा पाश्चुराइजेशन करने से लगभग सभी प्रकार के कीट, व्याधि आदि नष्ट हो जाते है। अब कक्ष में भाप का जाना बन्द कर देते है। और केवल गर्म हवा को जारी रखते है। जिससे कक्ष का तापमान 50-55 डिग्री सेन्टीग्रेट दो-तीन दिन तक बना रहे क्योंकि इस अवधि में कम्पोस्ट द्वारा उत्पादित सारी अमोनिया का उत्पादन हो जाय तब तक इसी तापक्रम को बनाकर रखते है। इसके पश्चात् खाद के तापमान को ताजी हवा देकर 25-28 डिग्री सेन्टीग्रेट तक लाया जाता है। इस समय कम्पोस्ट में आर्द्रता 60-70 प्रतिशत तक होना चाहिए।
अच्छे खाद के गुण :
जब खाद में यह सभी लक्षण हो उसके ठण्डे होने पर बीज (स्पॉन) को खाद में पुरी तरह से मिलाया जाता है। खाद चाहे किसी भी प्रणाली से बनायी जाय (लम्बी अवधि या अल्प अवधि) उसमें अगर यह सब लक्षण पाए जाए तभी बीजाई करनी चाहिए।
मशरूम की खेती में प्रयुक्त होने वाले बीज (स्पॉन) को मशरूम का बीज कहा जाता है। और मशरूम के बीज को खाद में मिलाने की प्रक्रिया को बीजाई या स्पॉनिंग कहते है। जैसा कि विदित है कि मशरूम उत्पादन में प्रयुक्त होने वाला बीज शुद्ध होना चाहिए इसमें किसी भी प्रकार का अशुद्धियों नहीं होनी चाहिए। जहाँ से आप बीज क्रय कर रहे है वह विश्वसनीय स्रोत हो और बीज को पुरी तरह से देखभाल कर उसमें किसी भी प्रकार का पीला, गुलाबी, काला, हरा आदि रंग के फफूंद नहीं होने चाहिए।
बीजाई करने की विधियाँ :
मशरूम के स्पान (बीज) की बीजाई करने की मुख्यतः चार विधियों प्रयोग में लाई जाती है
बीज (स्पॉन) की मात्रा :
बीजाई की विधि कोई भी हो लेकिन बीज की मात्रा 0.5 प्रतिशत से 0.76 प्रतिशत खाद के लिए पर्याप्त होता है। इससे कम मात्रा में बीज का प्रयोग करने से खाद में मशरूम का फफूंद जाल देर से फैलता है, जिसका प्रभाव मशरूम उत्पादन पर पड़ता है। यदि इससे ज्यादा मात्रा में बीज प्रयोग किया जाता है, तो खाद में मशरूम का फफूंद जाल बहुत शीघ्र फैल जाता है लेकिन जिस अनुपात में अधिक बीज डाला जाता है उस अनुपात में अधिक पैदावार नही मिलती है।
खाद में बीज डालना :
जब खाद तैयार हो जाय तो इसमें बीजाई की जाती है। बीजाई के समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है कि खाद में पानी की मात्रा 60-70 प्रतिशत तक हो, अमोनिया गैस की उपस्थिति न हो, तथा पी.एच. 7.5-7.8 के बीच हो तो ही बिजाई करनी चाहिए। बीजाई करने के लिए ऐसे स्थान या कमरे का चुनाव करना चाहिए जहाँ की हवा स्थिर हो। और वहीं पर फर्श को फार्मलीन से उपचारित कर लेना चाहिए इसके बाद कम्पोस्ट के ढेर को पहले फर्श पर बिछा कर ठंडा कर लेना चाहिए। ठंडा होने पर खाद में उपरोक्त मात्रा (0.5-0.75 प्रतिशत) बीज मिलाकर लकड़ी की पेटियों में या पालीथीन में भर दिया जाता है। खाद को इन पात्रों में भरने के बाद थोड़ा दबाना (जितना हाथ का वजन है) चाहिए। तथा पेटियों / पालीथीन /रेक्स के उपर 2 प्रतिशत फार्मालीन में भिगोया हुआ अखबार बिछा (ढक देना) देना चाहिए।
बीजाई उपरान्त प्रबन्धन :
इस प्रकार भरे हुए पात्रों को बीज फैलने वाले कमरे में या उत्पादन वाले कमरे में रखदिया जाता है। जहाँ का तापमान 2411 विधी सेन्टीग्रेट तथा आर्दता 80 प्रतिशत हो। इस तापमान और आर्द्रता पर बीज खाद में 12-15 दिन में पूरी तरह से कवक जाल फैल जाता है। यदि तापमान इससे कम हो तो कवकजाल फैलने में ज्यादा दिन लग सकता है। इसलिए यह तापक्रम इस समय देना अति आवश्यक होता है, चाहे जिस विधि से यह तापक्रम बनाया जाय। यदि कमरे का तापक्रम 25 जिची सेल्सियस से ज्यादा होता है तो मशरूम के कवकजाल के लिए अचम नहीं होता है और कई प्रकार की बीमारियों च मोल्ड उगने लगते है। जो मशरूम के कवकजाल को फैलने में बाधा उत्पन्न करते है। नमी व तापमान के अतिरिक्त कमरे में हवा का आदान-प्रदान आसानी से होना चाहिए जिससे कमरे में आवश्यकता अनुसार आक्सीजन की मात्रा बनी रहे।
खाद में कवकजाल फैलते समय कमरे में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा 0.1-0.5 प्रतिशत के बीच होनी चाहिए। जो कि इस समय थोड़ा ज्यादा होनी चाहिए, यह सामान्य हवा के आदान-प्रदान से नियन्त्रित किया जा सकता है। इसके साथ-साथ यदि मशरूम की पेटियों या रैक्स में उगाया जा रहा है, तो इनमें दिन में एक या दो बार पानी का छिड़काव करना अति आवश्यक है, ताकि उसमें उपर बिछाया गया अखबार या कागज गीला रहे। अन्यथा कम्पोस्ट में कवकजाल की वृद्धि रूक जायेगी। जबकि पालीथीन के बैगों में पानी देने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं पड़ती।
केसिंग :
जब खाद में बीज मिलाने के पश्चात उसमें मशरूम के फफूंद फैल जाय, तो उसके उपर मिट्टी या अन्य किसी मिश्रण की एक परत बिछाई जाती है। या यूं कह ले कि केसिंग एक प्रकार मिट्टी होती. है, जिसे खाद पर बिछाने से मशरूम निकलने लगती है।
केसिंग मिश्रण बिछाने का समय :
अधिकतर केसिंग मिश्रण तभी बिछाया जाता है जब कवकजाल से सारी की सारी खाद भर कर सफेद दिखने लगती है। वैसे यह स्थिति अनुकूल परिस्थितियों में बीजाई के 12-15 दिन बाद कवकजाल खाद में फैल जाता है। यदि कवकजाल पूरे खाद में नहीं फैला है तो उस समय केसिंग कर देने से विभिन्न प्रकार के प्रतियोगी कवक या कीड़ो का आने का खतरा बना रहता है।
केसिंग मशरूम के पिन हेड बनने में मदद करती है। यदि केसिंग मिश्रण खाद के ऊपर न बिछाया जाय तो अधिक मात्रा या उचित मात्रा में मशरूम नहीं निकलती है तथा खाद को सूखने से एवं नमी बनाने में मदद करती है।
केसिंग मिश्रण के गुण
अच्छी केसिंग मिश्रण में निम्नलिखित गुण होने चाहिए :-
केसिंग के लिए प्रायः मिट्टी एवं गोबर की खाद का प्रयोग किया जाता है। जबकि विदेशों में पीट मॉस का प्रयोग किया जाता है जो कि बहुत ही अच्छा केसिंग का काम करता है। हमारे देश में पीट आसानी से नही मिल पाती। वैसे कश्मीर में कुछ पीट उपलब्ध है लेकिन अनुसंधान द्वारा पता चला कि यह केसिंग के लिए अच्छी नहीं है, जितना कि विदेशो की पीट / राष्ट्रीय खुम्भ अनुसंधान केन्द्र, सोलन ने कुछ सिफारिश की कि डेढ़ वर्ष पुरानी गोबर की खाद तथा दोमट मिट्टी 1:1 अनुपात के मिश्रण को प्रयोग करें। इसके अतिरिक्त जो मिश्रण अधिक लोकप्रिय है वह इस प्रकार हैं।
केसिंग मिश्रण को उपचारित करना :
उपरोक्त किसी भी सूत्रीकरण से केसिंग मिश्रण तैयार किया जा सकता है। लेकिन मिश्रण को उपचारित करना अति आवश्यक है। इन मिश्रण को आपस में मिलाकर जाली से छान कर पेटियों में भर देना चाहिए और इस मिश्रण का पाश्चुरीकरण करना चाहिए। पाश्चुरीकरण करने के लिए इस मिश्रण को आंशिक निर्जीवीकरण कमरे या केसिंग के पाश्चुरीकरण कमरे में रखा जाता है। जब केसिंग का तापमान 65 डिग्री सेन्टीग्रेट हो जाए तो इसको 4-6 घण्टे तक रखना चाहिए। इस तापमान पर यह मिश्रण कीटाणु रहित हो जायेगा। केसिंग परत बिछाने के लिए इसको ठंडा होने देना चाहिए।
रसायन द्वारा केसिंग मिट्टी का निर्जीवीकरण :
रासायनिक उपचार विधि द्वारा भी केसिंग मिश्रण को उपचारित किया जा सकता है। यह प्रक्रिया केसिंग प्रक्रिया शुरू करने से 10 दिन पहले करना चाहिए या बीजाई के उपरान्त यह कार्य कर लेना चाहिए। इसके लिए फार्मलीन का 2 प्रतिशत का घोल बनाया जाता है। घोल बनाने के लिए 1 लीटर फार्मलीन 20 लीटर पानी में मिला लिया जाता है। केसिंग मिश्रण को इस घोल से पूरी तरह गीला किया जाता है इसके पश्चात् मिश्रण को पालीथीन के थैलों में भर देते है या पॉलीथीन सीट से चारो ओर दबाकर ढक देते है। इस सीट को केसिंग की प्रक्रिया शुरू करने से 12-24 घण्टे पहले हटाया जाता है। उसके बाद मिश्रण को एक साफ सुथरे फावडे से थोड़ा फैला देते है जिससे इसमें मौजूद रसायन (फार्मलीन) निकल जाय।
केसिंग मिश्रण को बिछाना :
जब केसिंग मिश्रण कीटाणु रहित हो जाय तो इसको पेटियों / रेक्स या थैलियों में बिछाने के लिए तैयार करना होता है। केसिंग मिश्रण का पी.एच मान 7.5-7.8 से ज्यादा नहीं होना चाहिए। यदि कम हो तो इसमें कैल्सियम कार्बोनेट मिला लेना चहिए। इसके बाद कैसिंग मिश्रण बिछाने के लिए तैयार हो जाती है। जिन बैगों में या पेटियों में केसिंग करनी है उसके ऊपर का कागज/अखबार हटा देना चाहिए। कागज हटाकर खाद को उपर से रफलिंग कर देते है ओर इसे समतल कर केंसिंग मिश्रण को खाद के उपर 1 इंच मोटी बिछा दिया जाता है। इससे कम मोटी तह बिछाने पर कवक जाल केसिंग के उपर आ जाता है, और इससे अधिक मोटी परत बिछाने पर जो मशरूम निकलते हैं, उनके तने काफी लम्बे होते है, या कई बार मशरूम के पिन हेड केसिंग के अन्दर ही रह जाते है।
केसिंग बिछाते समय सावधानियाँ :
केसिंग के बाद फसल की देखभाल :
एक बार स्पॉन रन (बीज बढ़वार) हो जाने तथा केसिंग हो जाने के बाद बटन मशरूम का उत्पादन 15-20 दिन में प्राप्त हो जाता है। सफलतापूर्वक मशरूम की पैदावार को निकालने के लिए मशरूम उगाने वाले कमरे की वातावरणीय परिस्थितियों पर नियंत्रण रखना जरूरी है। कमरे का तापक्रम बढ़ने पर अनेक प्रकार के मोल्ड या इंकी कैम्पस आ जाते है। इसके लिए जरूरी है कि मशरूम की अच्छी पैदावार होती रहे कुछ आवश्यक कारक कमरे में बनाकर रखा जाय।
उपरोक्त मात्रा को कमरे में नियन्त्रित करने के लिए समय-समय पर ताजी हवा का प्रवेश करते रहते है। क्योंकि फसल उत्पादन के समय यदि ताजी हवा न दी गयी तो एक समय ऐसा भी आता है कि मशरूम उत्पादन भी बन्द हो जाता है। इसलिए जरूरी है कि मशरूम भवन में ताजी हवा देने के लिए दरवाजे के बिल्कुल विपरित वाली दीवार पर खिड़की रख कर हवा दी जाती है। बटन मशरूम की पिन हेड्स इतनी संवेदनशील होती है कि थोड़ी सी कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा भी इनको हानि पहुंचा जाती है।
पानी देना या छिड़काव :
जब फसल उत्पादन के समय पानी का छिड़काव करना हो तो यह ध्यान रखा जाता है कि मशरूम तोड़ने के पश्चात् ही पानी का छिडकाव करे। यदि छिड़काव पहले करेंगे तो मशरूम मिट्टी से लथपथ हो जायेगी जिससे इसकी गुणवत्ता खराब हो जाती है। साथ ही यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि खाद का उपरी भाग सदैव ही नम रहना चाहिए फसल उत्पादन के दौरान कमरे में 2 या 3 बार पानी देना आवश्यक होता है। पानी का छिड़काव तीन अवस्था में की जाती है।
मशरूम की तुड़ाई :
मशरूम की टोपी का आकार जब 2.5 से 3 से.मी. हो जाए तो यह तोड़ने योग्य हो जाता है। मशरूम की तुड़ाई आम तौर पर सुबह के समय ही करनी चाहिए। प्रत्येक मशरूम को अंगुठे और उसके साथ वाली दोनो उंगलियों से पकड़ कर इनको दाहिने की तरफ घुमा कर हल्का सा दबाकर तोड लिए जाते हैं। तुढ़ाई के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस मशरूम की तुड़ाई की जा रही है उसके पास वाली छोटी मशरूम को क्षति न पहुंचे। डंठल के निचले भाग को जिसमें मिट्टी या केसिंग लगी होती है, तेज चाकू या ब्लेड से काटकर अलग कर देते है और इस मशरूम को एक टोकरी में इकट्ठा कर लिया जाता है और मिट्टी वाले भाग कहीं दूर गढ्ढे में पफेंक देते है या मिट्टी में दबा देते है। जिस जगह से मशरूम की तुड़ाई की गई है उस जगह पर गड्ढ़ा बन जाता है, तो उसके पास की केसिंग मिट्टी से ढक देते है।यदि सही अवस्था में मशरूम की तुड़ाई न की गयी तो यह मशरूम की टोपी नीचे से खुलकर एक छाते का आकार ले लेती है। खुली हुई छतरीनुमा मशरूम का विपणन बहुत मुश्किल हो जाता है और उचित मूल्य भी नही प्राप्त होता।
वर्गीकरण एवं पैकिंग :
मशरूम की पैदावार से अधिक मूल्य प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि मंडियों में भेजने से पहले उनकी छंटाई ठीक तरह व भली-भांति की जाए। मशरूम की तुड़ाई के बाद उसकी वर्गीकरण कर लेते है इसमें से खुली हुई मशरूम को अलग कर लेते हैं। इसकी कटिंग कर साफ पानी से धुलाई कर लेते है। चूँकि मशरूम में आयरन की मात्रा अधिक होती है। इसलिए इसको छूने से या पकड़ने से इसका रंग हल्का भूरा हो जाता है। इसके लिए 1 प्रतिशत पोटैशियम मेटाबाई सल्फाइड के घोल में उपचारित करके अतिरिक्त पानी को निकालने के बाद 200 ग्राम की क्षमता वाले 150 गज की मोटाई वाले पॉलीथीन के लिफाफो में भरकर बंद कर दें। चूंकि मशरूम में पानी की मात्रा 90 प्रतिशत तक होती है। तो पालीथीन के अन्दर भाप जैसा बन जाता है इससे इसकी गुणवत्ता खराब होती है। इसके लिए पॉलीथीन में 8-10 छेद कर देते है। तो इस समस्या से निजात मिल जाती है।यदि मशरूम को दूर की मंडियो में भेजना है तो मशरूम के पैकेट को थर्मोकोल वाले ढक्कन दार बड़े डिब्बो या पात्रों में बर्फ के टुकड़े लिफाफो की तह के बीच रख कर भेजाजा सकता है। इस तरह से पैक की गयी मशरूम 6-7 घंटे तक ताजी अवस्था में रहती है। यदि मशरूम को घर पर रखना है तो इन्हें 3-4 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रेफ्रीजरेटर में 3-4 दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
परिवहन :
मशरूम की थोडी मात्रा को स्थानीय बाजारों में आसानी से विक्रय किया जा सकता है। यदि बाजार उत्पादन स्थल से काफी दूर है तो वातानुकूलित बस या रेल के डिब्बों में ही ले जाना चाहिए। यदि ऐसी व्यवस्था नही है तो कोशिश करनी चाहिए कि इनको रात के समय ही ले जाना चाहिए। क्योंकि दिन की अपेक्षा रात में मौसम ठण्डा होता है। यदि ऐसा करते है तो काफी समय तक मशरूम को सुरक्षित रखा जा सकता है।
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