साधारणतया कोई भी फसल उगाने के लिए या उसके प्रसारण के लिए बीजों का प्रयोग किया जाता है। कई प्रकार के पेड़-पौधों में बीज की जगह उनके अन्य हिस्से जैसे तना, गाँठ, जड़ आदि का प्रयोग किया जाता है। जैसे गन्ना, आलू, ग्लेडिओलस, डहलिया आदि।
उसी प्रकार मशरूम उत्पादन के लिए सबसे महत्वपूर्ण पदार्थ स्पॉन (बीज) होता है जिसकी गुणवत्ता पर मशरूम उत्पादक की सफलता निर्भर करती है। इसलिए मशरूम के शुद्ध कवक जाल जो कि अधिक पैदावार देने में सक्षम, सफेदरंग और बीमारियों एवं कीड़ो से रहित हो. पर निर्भर करता है।
मशरूम स्पॉन बोलचाल की भाषा में इसका बीज है, जिसकी बीजाई की जाने से फल (मशरूम) प्राप्त होता है परन्तु वास्तव में स्पॉन मशरूम की वानस्पतिक स्थित (Vigetative Stage) है, जिसे गेहूँ, ज्वार, मक्का के उपचारित दानों पर पी०पी० बैग या शीशियों में तैयार किया जाता है। स्पॉन का अर्थ है कि वह पदार्थ जिसे विशेष माध्यम पर लैब में तैयार किया जाता है। मशरूम के स्पॉन को देखकर मशरूम की गुणवत्ता की पूर्ण रूप से परखा नही जा सकता इसलिए मशरूम उत्पादको को अच्छी व विश्वसनीय संस्थाओं से ही स्पॉन खरीदना चाहिए।
स्पॉन बनाने की विधि :
मशरूम के स्पॉन बनाने की विधि में मुख्यतः तीन भाग है जो प्रयोगशाला में साफ-सुथरे एवं जीवाणु रहित वातावरण में तैयार किये जाते है।
शुद्ध संवर्धन बनाना :
शुद्ध संवर्धन निम्नलिखित दो विधियों द्वारा बनाया जाता है
1. ऊतक संवर्धन:
इसे बनाने के लिए सबसे पहले कवक जाल के विकास के लिए उचित कृत्रिम माध्यम को तैयार किया जाता है।
(क) पोटैटो डेक्सट्रोज
(ख) माल्ट एक्ट्रेक्ट :
ऊतक संवर्धन करने की विधि :
उतक संवर्धन करने की विधि निम्नलिखित चरणों में पूरी होती है :
बीजाणु संवर्धन :
बीजाणु संवर्धन को मशरूम के बीजाणुओं से तैयार किया जाता है। इसके लिए सबसे पहले मशरूम के बीजाणुओं की आवश्यकता होती है। मशरूम के बीजाणु मशरूम की टोपी के निचले हिस्से में बनी हुई गलफडो में पैदा होते है। जिनको पेट्री प्लेट में इकट्ठा करते है। बीजाणुओं को इकट्ठा करने के लिए भी उसी प्रकार से एक मशरूम के फलदेह का चुनाव करके उपचारित करते है, जिस प्रकार से उतक संवर्धन बनाने के बारे में उल्लेख किया गया है। उपचारित किये गये मशरूम के फलदेह को एक पेट्री प्लेट के उपर तार के बने हुए स्टैण्ड को रखकर उस पर मशरूम को सीधा खड़ा कर देते है और उसको बड़े आकार के बीकर से ढक देते है। मशरूम रखने से पहले पेट्री प्लेट, तार के स्टैण्ड और बीकर को 160 डिग्री सेन्टीग्रेट के तापमान पर डेढ़ से दो घण्टे तक ओवेन में निर्जीवीकरण कर लेते है। तीन चार दिन में मशरूम की टोपी के निचले हिस्से में लगी हुई झिल्लीदार परत फट जाने से पेट्री प्लेट में बीजाणु झड़कर इकट्ठे हो जाते है जिसे स्पोर प्रिन्ट भी कहते है। इसके बाद मशरूम को तार के स्टैण्ड सहित निकाल लेते है और पेट्री प्लेट को एक निष्कीटित किए हुए पेट्री प्लेट के ढक्कन से ढक देते है। इस पेट्री प्लेट के चारों ओर कागज लपेटकर रेफ्रीजरेटर में बीजाणु संवर्धन बनाने में सुरक्षित रख देते है।
अतः बीजाणु संवर्धन दो प्रकार से किया जाता है :-
(1) एकल बीजाणु संवर्धन :
प्रयोगों द्वारा यह देखा गया है कि सभी बीजाणु मशरूम की टोपी बनाने में सक्षम नहीं होते क्योंकि टोपी (कैप) बनाने के लिए जरूरी गुणसूत्र अलग-अलग बीजाणुओं में उपस्थित होते है। इसलिए एक बीजाणु के कवक जाल से मशरूम स्पॉन नहीं बनाया जाता क्योंकि इस विधि द्वारा बनाया गये स्पॉन की उत्पादकता निश्चित नहीं होती है।
(2) बहुबीजाणु संवर्धन :
स्पोर प्रिन्ट (बीजाणु छाप) को पांच से दस मिली० पानी में घोलकर मिलाया जाता है। बीजाणु वाले इस माध्यम को निर्जीवीकृत पेट्री प्लेटो में 25 डिग्री सेल्सियस पर उष्मापित में 4-5 दिन रखा जाता है। अथवा उपरोक्त विधि से एकत्रित किए हुए बीजाणुओं को निर्जीवीकृत संचारित निडिल की सहायता से प्रत्येक परखनली के अन्दर भरे हुए माध्यम से डाल देते है और सभी परखनलियों को 25-28 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रख देते है। दस दिन बाद माध्यम की उपरी सतह पर बहुत सी बारीक बारीक सफेद रंग की फफूँदी दिखाई पड़ने लगती है। यह फफूंदी बीजाणुओं के उगने के कारण बनती है। इस विधि को बहुबीजाणु संवर्धन या मल्टी स्पोर कल्पर के नाम से जाना जाता है। दो सप्ताह में माध्यम की सतह पर पर्याप्त मात्रा में फफूंदी फैल जायेगी। इसी फफूंदी को मास्टर या मदर स्पॉन बनाने के लिए प्रयोग में लाते है।
शुद्ध संवर्धन से मास्टर संवर्धन बनाना :
उपरोक्त विधि से बनाए गए किसी शुद्ध संवर्धन से मास्टर संवर्धन बनाते है। सबसे पहले अच्छी गुणवत्ता का गेहूँ या ज्वार के दानो का चुनाव करते है। जिसमें किसी प्रकार के कीड़े-मकोड़े तथा दानों में किसी प्रकार की बीमारी न हो पूरा साबूत दानों का ही चुनाव करते है। जितनी मात्रा में दाना लेते है उसमें डेढ़ गुना पानी की मात्रा में डालकर 20-25 मिनट तक उबालते है। इसके बाद इन दानों को जाली के उपर डाल देते है ताकि पानी निकल जाय। इसके पश्चात् इन दानों में दो प्रतिशत जिप्सम (कैल्सियम सल्फेट) तथा 0.5 प्रतिशत कैल्सियम कार्बोनेट (यह मात्रा सूखे दानों के आधार पर है) अच्छी तरह से मिला देते है। इन रसायनों को मिलाने से न केवल गेहूँ के दानों को अम्लीयता व क्षारीयता ठीक रहेगी अपितु यह दानों को आपस में चिपकने से भी रोकेगी। अब इन दानों को ग्लूकोज की खाली बोतलों या पी.पी. बैग में 500 ग्राम से 1000 ग्राम तक भर देते है। बोतलों मे दो तिहाई से ज्यादा उबले हुए दाने नही भरने चाहिए। तत्पश्चात नान एबजारवेन्ट रूई की डाट लगाकर इन सभी को बोतलों या पालीथीन बैग को आटोक्लेव में रखकर 20-22 पौंड प्रति वर्ग इंच के दबाव पर दो घण्टे के लिए निर्जीवीकरण करते है। निर्जीवीकरण के बाद आटोक्लेव को धीरे-धीरे कमरे के तापक्रम पर ले आते है। उसके 30 मिनट बाद आटोक्लेव का ढक्कन खोलकर सभी बोतलों/पी.पी. बैग कोनिकालकर अंतः कामित में या ठण्डे कमरे में रातभर के लिए स्थानान्तरित कर देते है। दूसरे दिन इन बैगो/ बोतलों को लेगिनार फलों में अल्ट्रा वायलेट किरणों में 30 मिनट रखने के बाद इसमें शुद्ध संवर्धन डालते है। स्पिरिट लैम्प की ली के उपर दानों से भरी हुई बोतल के मुंह पर लगी हुई डाट को खोलकर थोड़ी तिरछी कर देते है, ताकि अन्दर की तरफ से बोतल की सतह पर थोड़ा सा स्थान निकल जाए और इस स्थान पर शुद्ध संर्कान को निहिल की सहायता से डाला जा सके। प्रत्येक बोतल में शुद्ध संवर्धन के एक टुकड़े को बीचों-बीच रखते है। इन बोतलों की उष्मापन कक्ष में 24 ± 1 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखते है। इन बोतलों में तीन-चार सप्ताह में दानों के चारे तरफ मशरूम के कवकजाल पौल जाते है जिसे मास्टर या मदर रॉन कहते हैं।
स्पॉन बनाना :
व्यवसायिक स्पॉन बनाने हेतु निम्नलिखित उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है।
आवश्यक उपकरण :
स्पॉन बनाने की विधि :
उपरोक्त वर्णित विधि द्वारा बनाए गए एक बोतल मास्टर / मदर स्पॉन / संवर्धन से 15-20 स्पॉन बैग बनाए जा सकते है। बीज बनाने के लिए ज्वार या गेहूँ के दानों को उसी प्रकार से जिस प्रकार मास्टर संवर्धन बनाने हेतु चुनाव किया था इसके लिए भी चुनाव कर दानो को उसी प्रकार से पानी में उबालकर हल्का सा सुखा लेते है। तत्पश्चात् उसमें 2 प्रतिशत जिप्सम (कैल्सियम सल्फेट) तथा 0.5 प्रतिशत कैल्सियम कार्बोनेट सुखे दानों के आधार पर मिलाकर सुविधानुसार 500 ग्राम या 1000 ग्राम के बैग (पी.पी. बैग) में भर दिया जाता है। फिर लिफाफे (पी.पी.) आधा खाली रहे इन लिफाफे के उपर प्लास्टिक के छल्ले लगाकर नान एबजारवेन्ट रूई का डाट लगा दिया जाता है जिससे इसके अन्दर बाहर की हवा इन लिफाफों में प्रवेश न कर सके।
अब इन बैगों को आटोक्लेव में रखकर 22 पौण्ड प्रति वर्ग इंच के दाब पर दो घण्टे के लिए 126 डिग्री सेल्सियस तापक्रम पर इसे निर्जीवीकरण कर लेते है। तत्पश्चात् मशीन को कमरे के तापक्रम पर लाकर लिफाफो को निकालकर इन आकुलेशन कमरे में ठण्डा होने के लिए रातभर के लिए रख देते है। ठण्डा होने पर लेमिनार फ्लो में अल्ट्रा वायलेट किरण ॥ के सम्पर्क में आधे घण्टे के लिए रखते है। पहले से बनाये मास्टर संवर्धन की बोतल कोखोलकर कांच की छड़ी से दानों को अलग किया जाता है। इनमें से कुछ दानों को स्पिरिट लैम्प की उपस्थित में प्रत्येक लिफाफों / बैगों में डाल दिया जाता है। इन बैगों को भी मास्टर संवर्धन की तरह उष्मायन कक्ष में जहां का तापक्रम 24±1 विधी सेल्सियस हो रख देते है और 2-3 सप्ताह के अन्दर बोतल या बैगी में भरे हुए दानों के चारो तरफ फफूंदी की परत चढ़ जाती है तथा सभी दाने आपस में कवकजाल के द्वारा चिपक जाते है। इसी बीज (स्पॉन) को बीजाई करने के लिए उपयोग करते है।
अच्छे बीज के गुण :
आंशिक रूप से मशरूम का बीज बनाने में अपनाई जाने वाली तकनीकी विधियों का भी मशरूम की विशेषताओं पर प्रभाव पड़ता है-
स्पॉन परिवहन एवं सावधानियाँ तथा भण्डारण :
मशरूम के बीज को अनुपयुक्त वातावरण पर रखने से वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जहाँ तक हो सके परिवहन के दौरान स्पॉन को प्रशीतित गाड़ी में ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना चाहिए।
यदि स्पॉन का उत्पादन व्यवसायिक स्तर पर किया गया हो तो स्पॉन का भण्डारण 4-6 डिग्री सेल्सियस पर 4-6 महीने तक किया जा सकता है। एक बार भण्डारण किये गये स्थान को परिवहन उपरान्त पुनः भण्डारण नहीं करना चाहिए उसे तुरन्त बीजाई कर देना चाहिए। इससे उस स्पॉन की उत्पादकता अपेक्षाकृत अधिक होती है।
अतः इसका अभिप्राय यह है कि कोशिश यही करनी चाहिए कि हमेशा मशरूम का स्पॉन ताजा ही बीजाई के लिए उपयोग करना चाहिए। इसके कवकजाल कम्पोस्ट में शीघ्र फैलता है और पैदावार भी अधिक होती है।
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