रिशी (गैनोडर्मा ल्यूसिडम) विश्व का सबसे महत्वपूर्ण औषधीय मशरूम है। इसका प्रमुख कारण इस मशरूम में विद्यमान औषधिय गुण है। रिशी में औषधि गुणों के कारण इसे सर्व-औषधि गुण सम्पन्न, दीर्घायु मशरूम, अमरत्व मशरूम के उपनामों से पुकारा जाता है।
औषधीय गुण :
इस मशरूम में सबसे महत्वपूर्ण गुण मानव शरीर की रोगरोधी तथा कैसर एवं एड्स प्रतिरोधी क्षमता को भी बढ़ावा देता है। साथ-साथ इसे हृदय रोग, मधुमेह, गठिया, रक्तचाप इत्यादि में लाभप्रद पाया गया है। इसमें एंटीआक्सीडेंट गुण भी होते हैं। यह मशरूम लकड़ी के बुरादे पर उगाया जाता है। चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों जैसे आम, जामुन, पीपल, पोपलर, शीशम इत्यादि की लकड़ी का बुरादा उत्तम होता है। विश्व में रिशी दो विधियों से उगाया जाता है- बुडलागस (लकड़ी के लट्ठे) तथा सिन्थेटिक सन्स (प्लास्टिक के थैले में बुरादा)। लकड़ी के लट्ठों पर उगाने की विधि काफी पुरानी है और अब कम प्रचलित हैं अब सिंथेटिक लाग्स यानि बुरादे पर कमरा के अन्दर उत्पादन विधि अधिक प्रचलित है इसमें पैदावार ज्यादा और रोगों से सुरक्षा, दोनों ही लाभ हैं। रपॉन गेहूँ के दाने से या लकड़ी के बुरादे पर बनाते हैं।
उगने की विधि :
बुडलागस/सेंथेटिक लाग्स विधि :
लकड़ी के लट्ठों की बजाय बुरादे पर बोतल या पॉलीबैग में उगाने की विधि को बुडलागस कहते हैं। इसलिए कि जब बुरादे में माइसीलियम पूरी तरह फैल जाता है तो बुरादे का एक कड़ा लट्ठा बन जाता है जो पॉलीथीन हटाने के बाद भी टूटता नहीं हैं। चूंकि इस विधि में पूर्णतया निजर्मीकृत माध्यम का प्रयोग होता है और वैग एक ही फसल चक्र (लगभगचार-पाँच महीने) के लिये होता है इसलिये पैदावार भी ज्यादा आती है और रोग तथा कीडे की समस्या भी लट्ठा विधि से कम होता है।
सबस्ट्रेट :
उचित लकड़ी का बुरादा सबसे महत्वपूर्ण है। आम का बुरादा अच्छा होता है। बुरादा आरा मशीन से लाने के बाद धूप में अच्छी तरह सुखाकर प्रयोग होने तक सूखे वातावरण में रखते हैं। बुरादे में 20 प्रतिशत की दर से गेहूँ या धान का चोकर और उसमें मुख्यतः जिप्सम (कैल्शियम सल्फेट) और थोड़ी चाक मिट्टी (कैल्शियम कार्बोनेट) मिलाने के बाद इतना पानी मिलायें कि माध्यम में 65 प्रतिशत पानी हों। इस माध्यम का पी.एच. 5.5 रखते है अब इस माध्यम को पॉलीप्रोपाइलीन थैलों में लगभग 700 ग्राम सूखा यानि 2 किलो गीला बुरादा भरकर बैग के मुंह पर रिंग लगाकर अच्छी तरह रूई से बन्द करते हैं- जैसे स्पान की थैली को बंद करते हैं। इन थैलों को आटोक्लेव में 22 पौंड प्रेशर पर दो घंटे निजर्मीकृत (स्टेरिलाइज) करते हैं।
बिजाई :
बैग को ठंडा होने पर एक बैग में 20 ग्राम स्पॉन मिलाते हैं बीज को हम लैमिनर फ्लो के सामने या इनोकुलेशन रूम में स्वच्छ वातावरण में मिलाते हैं अन्यथा संदूषण हो जायेगा। इन थैलों को स्पॉन फैलने के लिये अब बन्द अंधेरे कमरों में रखते हैं तथा तापमान 28-32 डिग्री सेल्सियस बनाये रखते हैं। चूंकि यह बहुत धीमा कवक है इसलिये स्पॉन-रन एक महीना या उससे ज्यादा है।जब बैग पूरी तरह सफेद हो जाये, थोड़ा पीला पड़ने लगे और टॉप पर काले बुरादे का नामोनिशान न रह जाये तब कैंची से टॉप भाग को काट देते हैं यदि ऊपर मुंह की ओर कुछ बुरादे के काले कण दिखाई देते हैं तो उस पर ग्रीन फफूंद की बीमारी आ जाती हैं अब इन कटे थैलों को उत्पादन कक्ष में रैंक पर रखते हैं। प्रकाश होना चाहिए क्योंकि इस मशरूम की फुटिंग में प्रकाश जरूरी होता है। अब कमरे में प्रकाश, ताजी हवा. तापमान 25-28 डिग्री सेल्सियस तथा आर्द्रता लगभग 90 प्रतिशत बनाई जाती है तभी रिशी की पिनिंग होती है। पहले पिन लम्बाई में बढ़ती है फिर रूककर फैलने लगती है। इस समय आर्द्रता (80 प्रतिशत) और ताजी हवा की आवश्यकता होती है। इसी समय रिशी में रंग कत्थई रंग होता है। धीरे-धीरे सफेद और पीला रंग खत्म हो जाता है और पूरी कैप लाल या कत्थई हो जाती है जो संकेत है कि रिशी पक गई है। अब रिशी तोड़ने के लिये तैयार है।
तुड़ाई और सुखवन :
कैंची से रिशी को काट लेते हैं। 8-10 दिन पहले धूप में सुखाते हैं और बाद में उचित हो कि कम तापमान पर डीहयूमिडिफाइंग कैबिनेट में 7-9 प्रतिशत नमी तक सुखाते हैं। बाद में प्लास्टिक की बोतलों में भरकर कैप लगाकर सेलोटेप से अच्छी तरह बंद कर देते हैं। रिशी मशरूम में शुरू में लगभग 60 प्रतिशत नमी होती है यानि एक किलो रिशी सुखाने पर 400 ग्राम सूखा प्राप्त होता है। पहले पलश लेने के बाद पुनः शुरू की स्थितियां दोहराते हैं, यानि तापमान 30 डिग्री सेल्सियस और आर्द्रता 90 प्रतिशत से ऊपर, ताजी हवा एवं प्रकाश ताकि रिशी का दूसरा दौर शुरू हो जाए। पिनिंग के बाद उपरोक्त क्रियाओं का चक्र हू-ब-हू पूरा करना होता है। इस तरह रिशी की तीन पलश ली जा सकती है। एक किलो सूखे माध्यम से 150 से 250 ग्राम रिशी निकलता है।
"देहाती खेती" एक स्मार्ट फार्मिंग टेक्नोलॉजी प्लेटफार्म है, जाहाँ पर खेती-किसानी से जुड़ी हर जानकारी, आधुनिक तकनीक, और ग्रामीण विकास के उपायों को समर्पित है। हमारा उद्देश्य है किसानों को शिक्षित करना, उनकी आय बढ़ाना, और गांवों को समृद्ध बनाना। देहाती खेती का लक्ष्य भारतीय किसानों को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाना है।
मशरुम की वैज्ञानिक खेती : मशरूम का इतिहास। मशरूम उत्पादन । बटन मशरूम की खेती I ऑयस्टर (ढिंग्री)मशरूम् की खेती I दूधिया (मिल्की) मशरूम की खेती I रिशी मशरूम (गेयनोडर्मा लुसी डुम) की खेती I
मशरुम का बीज (स्पॉन) बनाना सीखे I मशरूम की बिमारियाँ एवम प्रबन्धन I