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मक्का की खेती

मक्का राज्य के सभी जिलों में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण फसल है। मक्के के दाने से विभिन्न प्रकार के उत्पाद बनाए जाते हैं जिससे अनेकों व्यवसाय संचालित है। मानव खाद में मक्के की जितनी बड़ी भूमिका है उससे कहीं अधिक पशुओं के चारे में इसकी उपयोगिता है। बढ़ती हुई जनसंख्या को भोजन की व्यवस्था में मक्का का महत्वपूर्ण योगदान है। वैज्ञानिकों का मानना है कि दूसरी हरित क्रांति में मक्का महत्वपूर्ण हो सकता है। किसान मक्के के भुट्टे को बाजार में बेचकर एक नकदी फसल के रूप में आय प्राप्त करते हैं।

जलवायु

मक्का की खेती के लिए नमी एवं गर्मी युक्त वातावरण की आवश्यकता होती है। अंकुरण हेतु 21 डिग्री सेल्सियस एवं वृद्धि हेतु 32 डिग्री सेल्सियस तापमान रहना चाहिए। फूल के समय उच्च तापक्रम एवं कम नमी की दशा में इसका फुल बर्बाद हो जाता है। परागकण सूख जाने के कारण परागण नहीं हो पता है, जिसके फलस्वरुप भुट्टे में दाना कम बैठता है। लगभग 50 से 75 सेंटीमीटर पानी अच्छी तरह से वितरण की दशा में मक्का की अच्छी पैदावार होती है।

भूमि

मक्का की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली बलुई दोमट से सल्लट दोमट सबसे उपयुक्त होती है। मक्का नीची भारी मिट्टी को छोड़कर प्रय: सभी प्रकार के मिट्टी में उगाया जा सकता है। 5.5 से 7:5 पीo एचo मान वाली मिट्टी में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है। जल जमाव इस फसल के लिए नुकसानदेय है। इसलिए उचित जल निकास वाली एवं जीवाश्म युक्त मिट्टी में इसकी खेती सही ढंग से की जा सकती है।

खेत की तैयारी

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से की जाती है। इसके बाद कल्टीवेटर अथवा देशी हल से जुताई करके हरेक जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत की मिट्टी को हल्की एवं भुरभुरी बना ली जाती है। इसके बाद सिंचाई एवं निराई – गुड़ाई सुविधा हेतु खेत को क्यारियों में बांट लेते हैं। क्यारी से खर -पतवार के अवशेषों को चुनकर अलग कर लिया जाता है।

मक्का की खेती
मक्का की खेती
मक्का की खेती
मक्का की खेती
मक्का

उन्नत प्रभेद

खरीफ फसल हेतु उन्नत पर बीडीओ में सुवान, गंगा – 11, देवीकी, कंचन, पूसा अगात, संकर मक्का – 3, शक्तिमान – 1, शक्तिमान – 2, शक्तिमान – 3 शक्तिमान – 4 प्रमुख है।

बुवाई का समय

खरीद मक्का की बुआई 25 मई से 20 जून तक की जाती है। बुआई का कार्य समय पर पूरा कर लेना चाहिए। समय पर बुवाई करने पर उत्पादन बढ़ता है।

बीज दर

लगभग 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टर की दर से आवश्यकता होती है। संकर मक्का की बुआई हेतु हरेक वर्ष नए बीज बाजार से लेकर बुआई करनी पड़ती है। संकुल किस्म के बीज को एक बार बो कर उससे प्राप्त दाने को प्रत्येक वर्ष वह बोकर 2 से 3 वर्ष तक अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।
बीज को कार्बेन्डाजिम नामक फफूँदनाशी दवा द्वारा बुआई के 15 घंटे पूर्व 2.5 ग्राम दवा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुआई करनी चाहिए, इससे बीज जनित रोगों से मुक्ति मिल जाती है। बीज बुवाई से 3 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर करनी चाहिए तथा बीज और उर्वरक अलग-अलग नालियों में डालना चाहिए। बुआई से 10 घंटे पूर्व 200 ग्राम यह एजोटोवेक्टर जीवाणु खाद से 10 किलोग्राम बीज की दर से गुड़ या माड़ (200 मिलीलीटर) उपचारित कर बुआई करें।

पोषक तत्व प्रबंधन

खेत की तैयारी के समय लगभग 15 टन गोबर की सड़ी खाद समान रूप से खेत में बिखेर कर मिट्टी में मिला देनी चाहिए। रासायनिक उर्वरकों में 100 किलोग्राम, 60 किलोग्राम स्फुर एवं 40 किलो ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। जिसमें नेत्रजन की एक तिहाई फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बीज बुवाई के समय दे। नेत्रजन की शेष मात्रा को दो बराबर भागों में बाँट कर बुआई के 30 दिनों के बाद एवं धनबाल निकलते समय खड़ी फसल में जड़ों के आस – पास देना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन

खरीफ फसल में प्रायः सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। गरमा फसल में मिट्टी के प्रकार एवं मौसम की अनुकूल 5 से 6 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। मोचा निकलने से दाना बनने तक खेत में पर्याप्त नमी का रहना अनिवार्य होता है। इस समय से खेत में नमी बनाए रखनी चाहिए। सूखा पड़ने पर दाना में दूध बनते समय आवश्यक नमी हेतु सिंचाई करनी चाहिए। खरीफ मौसम में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

खरपतवार - नियंत्रण

मक्का में निराई- गुड़ाई अत्यंत आवश्यक है और निराई करके ही खर – पटवारों को खेत से बाहर निकालना चाहिए।

पौधों में होने वाले रोग व इससे बचाव के उपाय :

झुलसा :

मेडिस में अंडाकार, पीले भूरे रंग के धब्बे पत्तियों पर बनते हैं जबकि टर्सीकम में हरे भूरे रंग के नाव के आकार के धब्बे बनते हैं। बाद में यह धब्बे आपस में मिलकर सारी पति को झुलसा देती हैं।

प्रबंधन :
  • फसल चक्र अपनाएं।
  • खेत को खरपतवार से मुक्त रखें।
  • कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम अथवा थीरम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोप्रचार कर ही बोआई करें।
  • मैन्कोज़ेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें।
तना सड़न :

पौधे के नीचे से दूसरा या तीसरा अंतर गांठ मुलायम एवं बदरंग हो जाता है। ज्यादा आक्रांत हो जाने पर पौधे वहीं से टूटकर गिर जाते हैं। आक्रांत भाग से सड़न की गंध आती है।

प्रबंधन
  • खेत को खरपतवार से मुक्त रखें।
  • खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था करें।
  • ब्लीचिंग पाउडर 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से आक्रणत भाग पर छिड़काव करें।
हरदा :

पतियों पर छोटे-छोटे गोल पीले रंग के फफोले बनते हैं जो फटकर पौधे को क्षति पहुंचाते हैं।

प्रबंधन
  • फसल चक्र अपनाए
  • खेत को खरपतवार से मुक्त रखें
  • मैन्कोज़ेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें।
फॉल आर्मीवर्ग :

फॉल आर्मीवर्ग के नर पतंगेा में दो लक्षण होते हैं, यानी, केंद्र की ओर एक भड़कीला रंग का स्थान और अग्रपंख के शिखर भाग पर एक सफेद धब्बा।मादा की अग्रपंख बेजान व धुंधले निशान वाले होते हैं। फॉल आर्मीवर्ग के पिल्लू के पूंछ के अंत में काले बड़े धब्बे होते हैं जो कि उदर खंड आठ पर वर्गाकार पैटर्न और उदर खंड नौ पर समलम्बाकार में व्यबस्थित होते हैं, जिसकी वजह से यह आसानी से किसी भी अन्य कीट प्रजाति से अलग पहचाना जा सकता है।फॉल आर्मीवर्ग की केवल पिल्लू अवस्था ही मक्का की फसल को नुकसान पहुंचती है। अंकुरित अवस्था से ही मक्का की फसल को खाना शुरू कर देता है। यदि सभी आकार के लंबे और छोटे छिद्र आसपास के कुछ पौधों की पतियों में फैले हुई दिखाई देते हैं, तो फसल फॉल आर्मीवर्ग से प्रभावित हो सकती हैI

प्रबंधन :
  • फसल की प्रारंभिक अवस्था में 5 फेरोमाँन ट्रैप प्रति हेक्टेयर।
  • फसल की प्रारंभिक अवस्था में 5 फेरोमाँन ट्रैप प्रति हेक्टेयर।
  • स्पिनेटोरम 11.7% एससी @ 0.5 मिली प्रति लीटर पानी या क्लोरेट्रानिलीप्रोएल 18.5 एससी @ 0.4 मिली प्रतिलीटर पानी या थियेामेथोक्साम 12.6 प्रतिशत + लेम्ब्डा साइहैलोथ्रिन 9 .5% जेडसी @ 0.25 मिली प्रति लीटर पानी का छिड़काव फॉल आर्मीवर्ग के प्रबंधन के लिए उपयोग करें।

उपज क्षमता : 70 क्विंटल प्रति हेक्टर

मक्का की खेती में खर्च एवं आय का बोयरा / हेक्टेयर

ट्रैक्टर चार्ज, खेत की तैयारी
बीज (हाइब्रिड), बुआई खर्च , उर्वरक खर्च एवं मजदूरी
खरपतवार नियंत्रण निकाई गुड़ाई
पौधा संरक्षण
सिंचाई तीन
कटाई एवं मढ़ाई
कुल खर्च

12650.00 रुपए
9750.00 रुपए
3600.00 रुपए
2850.00 रुपए
6600.00 रुपए
3870.00 रुपए
39320.00 रुपए

उपज रबी मक्का –  70 कुंतल *1660 / क्विंटल = 1,16,200.00 रुपए
शुद्ध आय = 116200 – 39320 = 76880 रुपए
उपज खरीफ मक्का 40 क्विंटल * 1700/ क्विंटल = 68,000 रुपए
शुद्ध आय = 68,000 – 39320 = 28,680 रुपए

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