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नेपियर घास

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नेपियर घास बहुवर्षीय पौष्टिक चारा घास है जिसे एक बार रोपित करने के बाद 4 से 5 वर्षों तक हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है। इसमें प्रोटीन, कैल्शियम एवं फास्फोरस काफी अधिक मात्रा में पाया जाता है जो दूधारू पशुओं के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

जलवायु : यह शीतोष्ण जलवायु की फसल है लगभग 31 डिग्री से. तापमान में फसल की अच्छी वृद्धि होती है। वैसे लगभग सभी प्रकार की जलवायु में नेपियर घास की खेती सम्भव है।

भूमि : इसकी खेती बलुई दोमट, भारी दोमट एवं दोमट मिट्टी में सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिट्टी में जीवांश पदार्थों की प्रचुरता एवं जल निकास की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

खेत की तैयारी : नेपिसर घास की खेती के लिए 3 से 4 जुताई की आवश्यकता होती है।पहली जुताई मि‌ट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए इसके बाद कल्टीवेटर से जुताई करें। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाएं जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाय एवं खेत समतल बन जाय। इसी समय सिंचाई व निराई-गुड़ाई सुविधा हेतु खेत को क्यारियों में बाँट लेना चाहिए।

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नेपियर घास

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नेपियर घास

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नेपियर घास

उन्नत प्रभेद : नेपियर घास की मुख्य रूप से आई.जी.एफ.आर.आई.-3, आई.जी.एफ.आर. आई.-10. आई.जी.एफ. आर. आई.-7 एवं डी.आर.एस.बी.-2 एन.बी.-21 स्वंतिका, पूसा जाइंट प्रचलित प्रभेद है।

बीज दर : जड़ सहित तने के टुकड़े को लगाया जाता है यह लगभग 25000 से 40000 प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। ऐसे तने के टुकड़े को जिसमें दो ऑख हो लगाना चाहिए।

रोपण का समय : ठण्ड को छोड़ कर वर्ष में कभी भी रोपण का कार्य किया जा सकता है। जहाँ पर सिंचाई सुविधा उपलब्ध है ऐसे क्षेत्रों में फरवरी माह रोपाई के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

रोपण : रोपाई के लिए कतार से कतार दूरी 75 सेमी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 50 सेमी. रखी जाती है। रोपाई के लिए तने के जिस टुकड़े की रोपाई कर रहे है उसे इस तरह से रोपते है कि उस टुकड़े की एक गाँठ मिट्टी के अंदर हो जाय और दूसरी गाँठ मिट्टी की सतह पर होनी चाहिए। इसे 45 डिग्री के कोण पर तिरछा रोपा जाता है।

पोषक तत्व प्रबंधन : अंतिम जुताई के समय लगभग 20 से 25 टन गोबर की सड़ी खाद खेत में समान रूप से बिखेर कर मिट्टी में समान रूप से मिला देना चाहिए। उर्वरकों व दूसरे पोषक तत्वों का उपयोग मिट्टी जाँच के आधार पर करना लाभदायक होता है। सामान्य तौर पर 100 किग्रा. नत्रजन, 50 किग्रा. फास्फोरस एवं 50 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा पौधा रोपण के समय देना चाहिए। नत्रजन की शेष आधी मात्रा दो बराबर भागो में बांट कर 30 एवं 60 दिन पर देना लाभदायक होता है।

सिंचाई प्रबंधन : खेत में नमी सदैव बरकरार रहनी चाहिए सिंचाई 15 से 18 दिनों के अंतराल पर की जाती है। गर्मी के दिनों में मार्च से मई तक 10 से 12 दिनों पर करनी चाहिए। वर्षा ऋतु में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती मौसम सूखा रहने परएक हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए।

खर पतवार प्रबंधन : फसल वृद्धि के लिए खर पतवार का नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है। रोपाई के 20 दिनों बाद जो पौधे मर गये हो वहाँ दूसरी कटिंग को लगा दें। इसी समय निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को खेत से निकाल देना चाहिए। इससे मिट्टी में बायु संचार बढ़ता है साथ ही फसल को पर्याप्त मात्रा में प्रकाश मिलता है जो फसल वृद्धि के लिए आवश्यक है।

कटाई : पहली कटाई 60 से 65 दिनों पर की जाती है। इसके बाद 25 से 30 दिनों पर साल में 6 से 8 कटाई की जाती है। मिट्टी की सतह से 10 से 15 सेमी. की ऊँचाई पर कटाई करना लाभदायक होता है।

उपज : अलग-अलग प्रभेदों से 100 से 180 टन उपज प्राप्त की जा सकती है।

नेपियर घास से आय का स्रोत : नेपियर घास का मुख्य तौर पर पशुओं के चारा के रूप में उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग सालों भर उपयोग में लाया जा सकता है। इसे साइलेज बनाकर भी पशुओं को चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है। जलवायु के विपरितपरिस्थितियों में भी नेपियर घास को आसानी से दो-तीन सिंचाई का प्रबंधन कर देने के बाद भी इसे सहजता से उगाया जा सकता है।नेपिरय घास के माध्यम से अन्य आय का स्रोत में एक स्रोत के रूप में इसका उपयोग कर सकते हैं। इसके तना को बीज के रूप में प्रयोग कर एक अच्छी आय बना सकते हैं. जो नेपियर घास को उगाने में बीज का अहम भूमिका होती है।

नेपियरन घास की खेती के आय-व्यय का ब्योरा/हेक्टर

खेत की तैयारी, बीज एवं बुआई खर्च
पटवन वर्ष भर में 10
उर्वरक प्रबंधन
खरपतवार नियंत्रण, निकाई एवं गुड़ाई
पौधा संरक्षण
कटाई खर्च (वर्ष भर में)
कुल खर्च

 6870.00
20,000.00
 4760.00
 5000.00
 1000.00
11,000.00
48,630.00

उपज = 1400 क्विंटल दर 100/क्विंटल  = 1,40,000.00
नगद शुद्ध आय = 1,40,000 - 48,630  =   91,370 रुपये

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