जौ प्राचीन काल से खेती किए जाने वाले अनाजों में एक प्रमुख फसल है। इसका उपयोग प्राचीन काल से धार्मिक संस्कारों में भी होता रहा है। जौ स्वास्थ्य के लिए जहां लाभदायक है वही व्यावसायिक दृष्टिकोण से भी यह महत्वपूर्ण फसल है। जौ फसल गेहूं की अपेक्षा अधिक सुखा सहनशील है। वर्तमान समय में अनेक कारणों से जौ का रकवा घटता जा रहा है, परंतु सुखाड़ की स्थिति में जौ की खेती किसानों के लिए निश्चित तौर पर लाभप्रद साबित हो सकती है।
जलवायु
जौ फसल को समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है इसके लिए 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान अच्छा माना गया है। इसीलिए पूरे देश में रवि मौसम में इसकी खेती की जाती है क्योंकि पौध वृद्धि के लिए अनुकूल वातावरण मिल जाता है।
भूमि
इसकी खेती सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है। समतल, उत्तम जल निकास युक्त दोमट मिट्टी में जौ की अच्छी फसल होती है।
खेत की तैयारी
नमी न होने की दशा में खेत की हल्की सिंचाई करके उचित नमी अवस्था (बरकनी) आने पर दो-तीन जुताई करनी चाहिए प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाना चाहिए जिससे मिट्टी भुरभुरी बन जाए। पहली जुताई मीटी पलटने वाले हल से करनी चाहिए। इसके बाद कल्टीवेटर, देसी हल या दूसरे उपलब्धसंसाधनों से जुताई करें।
उन्नत प्रभेद
ज्योति, डी.एल. 36, रंजीत बी. आर. 32, रत्नना के 125, आजाद तथा बी. आर. 31 आदि जौ की उन्नत प्रभेद है। किसान अपनी आवश्यकता के अनुसार स्थानीय वैज्ञानिकों की सहायता पर उपरोक्त में से किसी प्रभेद का चयन कर सकते हैं।
बीज दर
संचित अवस्था में 75- 80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर एवं असंचित अवस्था के लिए 100 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है।
बुवाई का समय
संचित अवस्था में जौ की खेती के लिए 10 नवंबर से 30 नवंबर तक का समय उपयुक्त होता है तथा असिंचित दशा में अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के द्वितीय सप्ताह तक जौ की बुवाई की जा सकती है।
पोषक तत्व प्रबंधन
सिंचित अवस्था में जौ की खेती के लिए 60 किलोग्राम नेत्रजन, 30 किलोग्राम स्फुर, 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। नेत्रजन की आधी मात्रा , स्फुर और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय कुड में डालें। नेत्रजन की शेष आधी मात्रा, प्रथम सिंचाई के समय उपरवेशन करें। असिंचित अवस्था के लिए 30 किलोग्राम, नेत्रजन 20 किलोग्राम, स्फुर 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय खेत में डालें।
सिंचाई प्रबंधन
जौ की खेती में सिंचाई की अधिक आवश्यकता नहीं होती है फिर भी दो सिंचाई करके बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है प्रथम सिंचाई बोने के 30 से 35 दिनों के बाद तथा दूसरी सिंचाई बुवाई के 55 से 60 दिनों के बाद करनी चाहिए।
खरपतवार प्रबंधन
निकाय गुड़ाई के लिए जहां तक संभोग हो, हैंड हो चलाकर खेत को खरपतवार से मुक्त कर लेना चाहिए। ऐसा न होने की दशा में ही खरपतवारनाशी दवा का व्यबहार करें।
पौध संरक्षण
जौ फसल में कीट व्याधि का प्रकोप काफी कम पाया जाता है परंतु कुछ कीट एवं बीमारियों के प्रकोप से फसल का उत्पादन घट जाता है। कीट व्याधियों का प्रबंधन निम्न प्रकार से किया जा सकता है।
कंडुआ रोग
इस रोग के प्रकोप से बलियो में दाने के स्थान पर फफूंद के काले जीवाणु बन जाते हैं जो मजबूत झिल्ली से ढके रहते हैं।
रोकथाम
रतुआ तथा अंगमारी
विभिन्न परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि रतुआ तथा अंगमारी के नियंत्रण के लिए 0.2 प्रतिशत डायथेम एम-45 का चार बार छिड़काव करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जीनेब तथा सेनडोविट का पांच छिड़काव 14 दिनों की अंतराल पर प्रभाव पानी पाया गया है।
जौ के किट
जौ को आर्मीवर्म, रूट वीवील, कटवर्म, तनाछेदक, चेम्पा समय - समय पर हानि पहुंचाते हैं। इसके नियंत्रणके लिए खेत तैयारी समय 2.5 लीटर क्लोरीपाइरी फांश 25 किलो सुखा बालू में मिलाकर प्रति हेक्टेयर जुताई कर बुआई करें। स्थानीय वैज्ञानिकों के सलाह पर दूसरे प्रभावकारी रसायन का छिड़काव भी कर सकते हैं।
उपज
संचित व्यवस्था में 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर एवं असिंचित अवस्था में 15 - 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त होता है।
बीज, खेत की तैयारी, बुआई खर्च
निकाई गुड़ाई खरपतवार नियंत्रण
सिंचाई दो
उर्वरक प्रबंधन
फसल सुरक्षा
कटाई मढाई
कुल खर्च
4100.00 रूपये
2200.00 रूपये
5000.00 रूपये
2515.00 रूपये
1600.00 रूपये
5000.00 रूपये
20145.00 रूपये
उपज - 30 क्विंटल दर 1300 / क्विंटल = 39,0000.00 रूपये
शुद्ध आय = 39000 - 20415 = 18585 रूपये
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