ओल की खेती
ओल को जिमिकंद एवं सूरन के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत की प्राबीन सब्जी फसल है, इसमें अनेक तरह के औषधीय गुण पाया जाता है। बवासीर, पेचीस, ट्यूमर, दमा, फफेड़े की सूजन, उदर पीड़ा एवं रक्त बिकार के लिए ओल काफी लाभदायक सिद्ध हुआ। इसकी खेती समतल, ऊँची-नीची एवं छायादार स्थानों पर रूलतापूर्वक की जा सकती है। विगत कुछ वर्षों में ओल की व्यवसायिक खेती की ओर देश के किसान अग्रसर हुए हैं। इससे उनकी आमदनी में काफी इजाफा पाया गया है।
जलवायु
ओल की खेती के लिए गर्म एवं नम मौसम की आवश्यकता होती है। अंकुरण के समय गर्म जलवायु एवं पौधा वृद्धि के लिए मौसम में हल्की नमी काफी लाभदायक पाया गया है।
भूमि
इसकी खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम है, वैसे सभी प्रकार की मिट्टियों में खेती की जा सकती है, परन्तु जीवांश पदार्थों की प्रचुरता अत्यंत आवश्यक है।
खेत की तैयारी
खेत की दो-तीन जुताई की आवश्यकता होती है। पहली गहरी जुताई एवं इसके बाद की हल्की जुताई की जानी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरी बनाई जाती है। इसी समय बीज बुवाई हेतु थालों को बनायें, क्योंकि ओल के बीज की बुवाई थालों में करने पर उत्पादन अच्छा प्राप्त होता है।
उन्नत प्रभेद
ओल के बहुत अधिक प्रभेदों का विकास नहीं हुआ है। मुख्य रूप से गजेन्द्र ओल, कुबेर, सन्तरागाछी, श्री पद्म, नरेन्द्र अगात किस्में हैं, जिसमें से किसी भी प्रभेद का चयन स्थानीय वैज्ञानिकों के सलाह पर कर सकते हैं।
बुआई का समय
ओल की बुआई मैदानी क्षेत्रों में फरवरी से अप्रैल तक की जाती है, क्योंकि इस समय बीज की बुआई से उत्पादन अक्टूबर-नवंबर में प्राप्त होता है और यह समय विपणन के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है।
बीज दर
लगभग 250-450 ग्राम कंद के टुकड़े की 60 से 50 क्विंटल बीज की आवश्यकता होती है एवं बीज में दो-तीन आँखें होनी चाहिए। 0.5 किग्रा. कंद के टुकड़े की 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है।
बीजोपचार :
बुआई से पूर्व बीज को कच्चे गोबर के घोल में 3 ग्राम मैन्कोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण मिलाकर प्रति लीटर पानी की दर से उपचारित करना चाहिए। तैयार घोल में 20 से 25 मिनट तक बीज को डुबोकर रखा जाता है, इसके बाद कंद को निकालकर 15 से 20 मिनट छाया में सुखाकर बुआई हेतु उपयोग में लाया जाता है।
बुआई
अच्छी पैदावार हेतु कतार से कतार 50 सेमी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 50 सेमी. पर निशान लगाकर थाला बनाया जाता है और उसी थाले में खाद एवं उर्वरक की मात्रा मिलाकर गड्ढे को भर दिया जाता है और फिर इन्हीं गड्ढों में उपचारित कंद की बुआई की जाती है।
मलचिंग
बीज बुआई के बाद थालों के ऊपर पुआल की एक परत बिछा देनी चाहिए अथवा शीशम की पत्तियों को बिछाना चाहिए। इससे कंदों का अंकुरण शीघ्र होता है, साथ ही खरपतवार अंकुरित नहीं हो पाते।
पोषक तत्व प्रबंधन
गोबर की खाद एवं रसायनिक उर्वरकों को थाले में दिया जाता है। इसके लिए प्रति गड्ढ़ा 3 किग्रा. गोबर की खाद, 10 ग्राम यूरिया, 35 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट एवं 16 ग्राम पोटैशियम सल्फेट को मिलाकर बीज बुआई से पूर्व गड्ढे में भर दिया जाता है। लगभग 80 दिनों बाद प्रति पौधे 5 से 6 ग्राम यूरिया खड़ी फसल में देना चाहिए। वैसे 150 किग्रा. नेत्रजल 80 किग्रा. फास्फोरस तथा 100 किग्रा. पोटाशियम एक हेक्टेयर में ओल की खेती हेतु उपयुक्त होता है।
खरपतवार प्रबंधन
खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई करना चाहिए। इससे खरपतवारों का नियंत्रण हो जाता है और पौधों के विकास के लिए अच्छा अवसर प्राप्त होता है। पहली निराई-गुड़ाई 50 से 60 दिनों बाद तथा दूसरी निराई-गुड़ाई 90 से 100 दिनों के बाद करनी चाहिए।
सिंचाई
ओल की खेती में सिंचाई की अधिक आवश्यकता नहीं होती है केवल खेत में नमी बनाये रखने के लिए एक-दो सिंचाई की आवश्यकता होती है। बरसात के दिनों में वर्षा के पानी से पर्याप्त नमी प्राप्त हो जाती है इस समय सिंचाई की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
पौधा संरक्षण
- झुलसा रोग :
यह फफूँदजनित रोग है, जिसका आक्रमण सितंबर-अक्टूबर माह में पौधों की पत्तियों पर देखा जाता है। पत्तियों पर वृताकार छोटे-छोटे भूरे हल्के रंग के धब्बे बनते है, जो बाद में सूखकर काले पड़ जाते हैं। इससे पत्तियाँ सूखकर झुलस जाती है, और कंदों की वृद्धि रूक जाती है। इसके नियंत्रण के लिए 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम और मैन्केजेब का संयुक्त उत्पाद 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण प्रति लीटर पानी में घोलबनाकर 8-10 दिनों के अंतराल पर दो-तीन छिड़काव करनी चाहिए। - तना गलन :
यह रोग विशेषकर उन क्षेत्रों में पाया जाता है जहाँ पर पानी का जमाव अधिक समय तक बना रहता है. यह मृदा जनित रोग है. इसका प्रभाव विशेषकर अगस्त सितंबर माह में पाया जाता है। प्रकोप की अवस्था में पौधा पीला पड़कर सूखकर गिर जाता है। इसके रोकथाम के लिए जल निकास की उचित व्यवस्था रखें, फसल चक्र अपनायें, साथ ही कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोल तैयार कर भूमि उपचार करना चाहिए।
खुदाई
लगभग 7 से 8 महीनों में फसल खुदाई हेतु तैयार हो जाती है। इस समय पौधे की पत्तियाँ पीली पड़कर सूखने लगती है और तना मुरझा जाता है। ऐसी अवस्था में कंदों की खुदाई कर लेनी चाहिए।
उपज
ओल की खेती में वैज्ञानिक पद्धतियों के समावेशन से 40 से 50 टन प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।
ओल (जिमिकंद) की खेती में प्रति हेक्टेयर आय व्यय का आकलन (वर्ष 2020-21 के अनुसार)
क्र. स. | विवरण | मात्रा | दर | राशि (रु०) |
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1 | खेत की तैयारी एवं रेखांकनः | |||
(क) ट्रैक्टर द्वारा जुताई | 8 घंटा | 450/ घंटा | 3600.00 | |
(ख) रेखांकन हेतु कार्यबल | 20 कार्यबल | 275 कार्यबल | 5500.00 | |
2. | बीज एवं बुआई/रोपाई: | |||
(क) बीज | 80 किग्रा. | 3000/ क्विंटल | 24000.00 | |
(ख) बीजोपचार (फफूंदनाशी/कीटनाशी रसायन) | 1.6 ग्रा. | 5000 कि.ग्रा. | 800.00 | |
(ग) बुआई / रोपाई | 30 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 8250.00 | |
3 | खाद एवं उर्वरकः | |||
(क) गोबर कि सड़ी खादः | 30 टन | 500/ टन | 15000.00 | |
(ख) नत्रजन | 120 किग्रा. | 13.80 किग्रा. | 1656.00 | |
(ग) स्फूर | 80 किग्रा. | 50 किग्रा. | 4000.00 | |
(घ) पोटाश | 100 किग्रा. | 24.50 किग्रा. | 2450.00 | |
(ङ) खाद एवं उर्वरक के व्यवहार | 6 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 1650.00 | |
4 | सिंचाई | 04 सिंचाई | 1000/ कार्यबल | 4000.00 |
5 | निकाई-गुड़ाई | 40 कार्यबल | 275 कार्यबल | 5500.00 |
6 | खर-पतवार नियंत्रण (रसायन का व्यवहार) | 0.00 | ||
7 | पौधा संरक्षण | 2000.00 | ||
8 | फसल की खुदाई, दुलाई एवं बाज़ार व्यवस्था | 30 कार्यबल | 275 कार्यबल | 8200.00 |
9 | भूमि का किराया | 8 माह | 10000/ वर्ष | 7500.00 |
10 | अन्य लागत | 3000.00 | ||
11 | कुल व्यय : 313156.00 रुपये | |||
कुल ऊपज (कुंटल): 400 (कुंटल) | ||||
कुल आय (रूपये): 640000.00 रुपये | ||||
शुद्ध आय (रूपये): 326844.00 रुपये | ||||
बिक्री दर @ 16000/ रुपये प्रति कुंटल | ||||
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