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तिल की खेती

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तिल भारत की पुरातन फसल है, इससे औषधीय गुण युक्त तेल की प्राप्ति होती है, जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के दवाओं में किया जाता है। तिल में 45 से 50 प्रतिशत तेल एवं 18 से 20 प्रतिशत प्रोटीन पायी जाती है। तेल प्राप्ति के बाद खल्ली का प्रयोग खाने के लिए व दुधारू पशुओं को दिया जाता है। इसकी खल्ली से जैविक खाद भी बनाई जाती है, खल्ली में 6 से 6.2 प्रतिशत नाईट्रोजन, 2 से 2.2 प्रतिशत फास्फोरस एवं । से। 2 प्रतिशत पोटाश पाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में अन्तर्राष्ट्रीय मांग काफी अधिक बढ़ी है, जो किसानों के लिए लाभदायक है। तिल से विभिन्न प्रकार की मिठाईयाँ व दूसरे व्यंजनों में इसका प्रयोग किया जाता है। तिल को शुभ फसल के रूप में एवं मिश्रित फसल के रूप में देश के मैदानी एवं पहाड़ी क्षेत्र में लगाया जाता है।

जलवायु

तिल मुख्य रूप से गर्म क्षेत्रे की फसल मानी गयी है। अंकुरण, पौध वृद्धि एवं फूल बनते समय 25 से 27 से. तापमान आवश्यक होता है। फूल बनने के समय कम तापमान के कारण फूल के गिरने की संभावना अधिक बढ़ जाती है जिसका उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। यह अत्यधिक लागातार वर्षा और जल जमाव के प्रति फसल संवेदनशील है।तिल की खेती के लिये सभी प्रकार की मिट्टियाँ उपयुक्त हैं, परन्तु चोमत एवं बलुई दोमट मिट्टी जिसका पी.एच. मान 5.5 से 8 के मध्य हो सर्वोत्तम पाची गयी है। अधिक क्षारीय एवं लवणीय मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है। जल निकास की उचित व्यवस्था अत्यन्त आवश्यक है।

खेत की तैयारी

खेत की तैयारी हेतु 2 से 3 जुताई की आवश्यकता होती है। खेत की मि‌ट्टी मुलायम एवं भुरभुरी होनी चाहिए क्योंकि इसके चीज काफी छोटे होते हैं। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा शेष कल्टीवेटर था देशी हल से करें। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा आवश्य लगाएं जिससे मि‌ट्टी भुरभुरी एवं खेत समतल हो जाय।

उन्नत प्रभेद 
तिल की स्थानीय प्रभेदों की अपेक्षा उन्नतशील प्रभेदों का चयन करना चाहिए जो निम्न प्रकार है। कृष्णा, काँके सफेद, कालिका एवं प्रगति है।

बीज दर : 
प्रति हेक्टेयर तिल की खेती के लिए 4 से 6 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

बीजोपचार 
बीज जनित रोगों एवं कीटों से फसल को बचाने के लिये फफूंदनाशक एवं कीटनाशक दवाओं से बीजों को उपचारित करना जरूरी है। बुआई से पहले बीजों को कार्बेन्डाजिम 2.0 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।

बुआई 
15 जून से 15 जुलाई तक एवं गर्मा 25 फरवरी से 10 मार्च तक करते हैं। तिल की बुवाई हमेशा कतारों में करनी चाहिए इससे उत्पादन अच्छा प्राप्त होता है, रोग एवं कीटों का प्रकोप भी कम होता है। इसके लिए खरीफ में पंक्ति सेपंक्ति की दूरी 45 सेंमी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी. तथा जायद फसल के रूप में कतार से कतार की दूरी 30 सेमी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी. रखनी चाहिए। बीजों को 2 से 3 सेमी. की गहराई में कुड में करनी चाहिए।

पोषक तत्व प्रबंधन
तिल की अच्छी पैदावार के लिए 40 किलोग्राम नाईट्रोजन, 20 किलोग्राम फास्फोरस एवं 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यकता होती है। नेत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय खेत में देना चाहिए। नेत्रजन की शेष मात्रा 30 दिनों के बाद खड़ी फसल में देनी चाहिए। यदि मिट्टी में सल्फर की कमी हो तब सल्फर का प्रयोग आवश्य करें इससे तिल की उपज 25 से 30 प्रतिशत बढ़ सकती है।

सिंचाई प्रबंधन 
तिल सूखा के प्रति सहनशील फसल है। खरीफ मौसम में बोई गई फसल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। जायद फसल में 25 से 30 दिनों पर पहली सिंचाई एवं 40 से 45 पर दूसरी तथा 60 से 70 दिनों बाद तीसरी सिंचाई करनी चाहिए।

खरपतवार प्रबंधन
खरपतवार नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है अन्यथा उत्पादन घट सकता है। इसके लिए बुआई से 25 से 30 दिनों के बाद निराई-गुड़ाई करके खरपतवार को निकाल लेना चाहिए। निराई-गुड़ाई की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं हो पाने की दशा में खरपतवारनाशी वासालीन । किलोग्राम दवा को 800 से 1000 ली. पानी में घोल बनाकर बुआई से पूर्व खेत में छिड़काव करें।

पौधा संरक्षण
तिल की खेती में कीट एवं बीमारियों से काफी नुकसान देखा गया है। इसलिए समय पर नियंत्रण कर प्रकोप से बचा जा सकता है।

  • फली छेदक कीट
    पौधे की प्रारंभिक अवस्था में कीट की सुड़िया कोमल पत्तियों को खा जाती है, जिससे पत्तियाँ जालीनुमा दिखाई पड़ती है। पुष्पन अवस्था पर यह फुल केअंदर घुसकर भीतरी भाग को खा जाती है तथा फली बनते समय फलियों को छेद कर अंदर ही अंदर उसके दानों को खा जाती है। इसके नियंत्रण के लिए क्यूनालफॉस 25 ई.सी. 1 लीटर दवा 800 से 1000 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करनी चाहिए। मूँग या उरद के साथ मिश्रित फसल देने पर कीट का प्रकोप कम हो जाता है।
  • तिल गॉल मक्खी
    यह कीट फूल के भीतरी भाग को खाता है, जिससे फूल खराब हो जाता है और फली में दाने नहीं बन पाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए कार्बोरिल 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण को 800 से 1000 ली. पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए।
  • फाईलोड़ी रोग
    यह तिल में लगने वाली प्रमुख बीमारी है, इसके प्रकोप से पौधों की वानस्पतिक वृद्धि रूक जाती है और संक्रमित पौधे के नीचले भाग में फलियाँ बनने लगती हैं। इन फलियों में बनने वाले दानों में तेल की मात्र काफी कम या ऐसीफेट 2 ग्राम/लीटर हो जाती है। इसके नियंत्रण के लिए मेटासिस्टॉक्स की 1 मिली. मात्र को 1 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

कटाई
जब पत्तियाँ पीली पड़ने लगे और फलियों का रंग हरा से पीला होने लगे ऐसी दशा में कटाई कर देनी चाहिए। अधिक पक जाने पर फलियों से दाने खेत में गिर जाते हैं। इसलिए फलियों की थोड़ी हरी अवस्था में ही कटाई कर लेनी चाहिए।

उपज
वैज्ञानिक तरीके से तिल की खेती करने पर 6 से 8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

तिल की खेती से आय एवं व्यय प्रति हेक्टर

5x2 Table Example
खेत की तैयारी, बीज एवं बुआई खर्च 4500.00 रुपये
पटवन एक 2000.00 रुपये
उर्वरक, निराई-गुड़ाई खरपतवार नियंत्रण 4150.00 रुपये
पौधा संरक्षण 1800.00 रुपये
कटाई एवं मढ़ाई 6000.00 रुपये
कुल खर्च 18,400.00 रुपये
2x2 Table Example
कुल उपज - 8 क्विंटल दर 4166/क्वंटल 33,328.00 रुपये
शुद्ध आय = 33328 -18400 14928.00 रुपये
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