व्यापारिक जगत में जापानी पोदीनें को ही मेन्था अथवा मिन्ट के नाम से जाना आता है। परन्तु तकनिकी रूप से मेन्था शब्द पोदीने के एक समूह का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें पोदीने की कई प्रजातियाँ सम्मिलित हैं। जिनमें से एक प्रजाति जापानी पोदीना भी है। वर्तमान में विश्व भर में जापानी पोदीना के उत्पादन के क्षेत्र में भारत दूसरे स्थान पर वर्तमान में उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब एवं हरियाणा इसके प्रमुख उत्पादक राज्य है। मेंथा औषधीय रूप में दंत रोग, मुह की बदबू, पेट की बीमारियाँ, त्वचा रोग एवं पिंपल में लाभकारी पाया गया है। इसके साथ ही क्षय रोग अस्थमा, चेहरे के दाग, हैजा जैसी बीमारियों में लाभदायक होने के साथ कीटनाशक गुण भी पाया जाता है।
जलवायु :
इसकी खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है, वैसे इसकी खेती उष्ण एवं उपोषण जलवायु में भी फलतापूर्वक की जा सकती है। फसल की अच्छी बढ़वार के लिए दिन का तापमान 30° से एवं रात का तापमान 18° से उपयुक्त होता है। भूमि : बलुई एवं बलुई दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश पदार्थों की प्रचुरता हो एवं जिसका पी. एच. मान 6.0 से 7.5 हो, जापानी पुदीना की खेती के लिए अच्छी होती है। भारी एवं चिकनी मिट्टी में पौधों के विकास में कठिनाईयाँ होती हैं। आलू उगाए जाने वाले खेतों में मेन्था पौधों की काफी अच्छी बढ़त होती है
खेत की तैयारी :
मिट्टी पलटने वाली हल से 2 से 3 जुताई करके पाटा लगाकर मिट्टीभुरभुरी कर लें। अंतिम जुताई से पहले 15 से 20 टन गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें। दीमक एवं सूत्रकृमि के बचाव के लिए 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से नीम की खल्ली खेतों में मिला देना चाहिए। खेत तैयार होने के उपरांत खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में बॉट लें इससे सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई में सहायता मिलती है।
उन्नत प्रभेद :
कोसी, हिमालय, कुशल, गोमती, गंगा, शिवालिक आदि मुख्य किस्में है जिसमें'कुशल' तेजी से बढ़ती है और इसका उत्पादन भी दूसरी प्रजातियों से होता है। साथ ही मेन्या की फसल में काफी अधिक सकर्स का उत्पादन होता है।
पौध रोपण का समय :
मेंथा के पौधों की रोपाई जनवरी के अंतिम सप्ताह से 15 फरवरी तक पूरा कर लेना चाहिए। वैसे ठंड को छोड़कर किसी भी मौसम में पौधों की रोपाई की जा सकती है।पौध रोपण :मेंथा के रोपण के लिए सकर्स को उपयोग में लाया जाता है, यह ध्यान रहना चाहिए कि सकर्स सदैव पौधों के निचले भाग से लेना चाहिए। सकर्स 5 से 7 सेमी. लम्बी होनी चाहिए और प्रत्येक सकर्स में एक से दो गाँठे होना आवश्यक होता है। तैयार खेत में धान की तरह सर्कस की रोपाई की जाती है, खेत में हल्का पानी भर कर रोपण करना लाभदायक होता है। रोपाई के लिए कतार से कतार 60 रोमी और पौधे से पौधे 45 सेमी, की दूरी रखी जाती है।
सिंचाई प्रबंधन :
खेत में सदैव नमी बनी रहनी चाहिए, इसके लिए गर्मी में फसल वृद्धि सप्ताह के अंतराल से एवं बाद के दिनों में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई अवश्य करें खेत में नमी की कमी होने पर फसल वृद्धि रूक जाती है। यदि सम्भव हो तो ड्रिप सिंचाई पद्धति की व्यवस्था सुनिश्चित करें, इससे उत्पादन काफी अच्छा प्राप्त होता है।
पोषक तत्व प्रबंधन :
सामान्य तौर पर 150 किग्रा. नाइट्रोजन, 60 किग्रा. फास्फोरस एवं 40 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष दिये जाने की अनुशंसा की जाती है। इनमें से फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा सकर्स की रोपाई के पहले दी जानी चाहिए। नाइट्रोजन की शेष मात्रा प्रत्येक कटाई के बाद 2 से 3 बार में देना चाहिए। यदि खेत की तैयारी के समय 15 से 20 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट डाली गई हो तो उर्वरकों की अतिरिक्त मात्रा देने की आवश्यकता नहीं होती है।
खरपतवार नियंत्रण :
खरपतवार पुदीना की बढ़त को तो रोकते ही हैं साथ ही पुदीने के तेल में अनैच्छिक बदबू उत्पन्न कर उसकी गुणवत्ता प्रभावित करते हैं इसलिए खरपतवार का नियंत्रण जरूरी है। खरपतवारों का नियंत्रण हाथ से निराई-गुड़ाई द्वारा तथा खरपतवारनाशी दवा के उपयोग से किया जा सकता है। रसायनिक नियंत्रण के लिए कारमेक्स 80 डब्ल्यू.पी. 700 ग्राम दवा प्रति हेक्टेयर की दर से 600 से 700 लीटर पानी में घोल कर फसल के जमाव से पहले छिड़काव करें और फिर 30 से 40 दिन बाद हाथ से निराई करें। इसी तरह दूसरी कटाई के एक महीना बाद भी हाथ से ही एक निराई-गुड़ाई करनी चाहिए।
पौधा संरक्षण :
इस फसल पर लगने वाले प्रमुख कीटों में सेमीलूपर सुन्डी, रोएँदार सुन्डी एवं जालीदार कीट मुख्य हैं, जिनमें सर्वाधिक नुकसान रोएँदार सुन्डी से होती है जो कि पत्तों के हरे उत्तकों को खाकर इन्हें कागज की तरह जालीदार बना देती है, जिससे फसल को काफी हानि होती है। इसके रोकथाम के लिए क्वींनालफास के 1.0 से 1.2 लीटर दवा 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। सेमीलूपर सुन्डी तथा जालीदार कीट के रोकथाम के लिए कार्टपहाड्रोक्लोराइड 50 एस.पी. का 800 से 1000 ग्राम, दवा प्रति हेक्टेयर की दर सेछिड़काव करें। कभी-कभी इस फसल पर सूत्रकृमियों का भी आक्रमण हो जाता है जिससे सकर्स में गाँठे बन जाती हैं, जड़े फूल जाती है तथा जड़ों पर लाल धारियाँ बन जाती है, पौधा पीला एवं बौना हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए खेत की तैयारी के समय ही 5 से 7 क्विंटल नीम की खल्ली प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला दें।
फसल की कटाई :
जापानी पुदीना एक वर्षीय फसल है और एक वर्ष के दौरान तीन कढ़ाईयाँ ली जा सकती है। इस फसल की पहली कटाई 100 से 120 दिन के उपरान्त पौधों पर हल्के सफ़ेद जामुनी रंग के फूल दिखाई दें अर्थात् जब 60 से 70 प्रतिशत पौधों में फूल आ जाते हैं। इस अवस्था पर पौधों की कटाई भूमि सतह से 6 से 8 सेमी. की ऊँचाई से करते हैं। दूसरी कटाई 70 से 80 दिन बाद तथा तीसरी कटाई पुनः 70 से 80 दिन बाद करते हैं।फसल की कटाई चमकीली धूप में दोपहर के समय तेज धारदार हँसए से करें। फसल काटने के बाद कम से कम 6 घंटे खेत में ही पड़े रहने दें ताकि अतिरिक्त नमी सूख जाय। फसल काटने के 6 घंटे से तीन दिन के भीतर आसवन करके तेल निकाल लेना चाहिए।
उपज :
जापानी पुदीना से लगभग 250 से 300 लीटर तेल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है। प्राप्त होने वाले तेल की मात्रा कई बातों पर भी निर्भर करती है जैसे उगाई गई प्रजाति,फसल की वृद्धि, फसल की कटाई का समय, प्रयुक्त किया गया आसवन संयंत्र इत्यादि।
क्र. स. | विवरण | मात्रा | दर | राशि (रु०) |
---|---|---|---|---|
1 | खेत की तैयारी एवं रेखांकनः | |||
(क) ट्रैक्टर द्वारा जुताई | 8 घंटा | 450/ घंटा | 3600.00 | |
(ख) रेखांकन हेतु कार्यबल | 20 कार्यबल | 275 कार्यबल | 5500.00 | |
2. | बीज एवं बुआई/रोपाई: | |||
(क) बीज | 5 कुंटल | 1000/ कुं | 5000.00 | |
(ख) बीजोपचार (फफूंदनाशी/कीटनाशी रसायन) | 500/ कि.ग्रा. | 500/ कि.ग्रा. | 250.00 | |
(ग) बुआई / रोपाई | 15 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 4125.00 | |
3 | खाद एवं उर्वरकः | |||
(क) गोबर कि सड़ी खादः | 15 टन | 500/ टन | 7500.00 | |
(ख) नत्रजन | 150 किग्रा. | 13.80 किग्रा. | 2070.00 | |
(ग) स्फूर | 60 किग्रा. | 50 किग्रा. | 3000.00 | |
(घ) पोटाश | 40 किग्रा. | 24.50 किग्रा. | 980.00 | |
(ङ) खाद एवं उर्वरक के व्यवहार | 6 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 1650.00 | |
4 | सिंचाई | 25 बार | 1000/ कार्यबल | 25000.00 |
5 | निकाई-गुड़ाई | 20 कार्यबल | 275 कार्यबल | 5500.00 |
6 | खर-पतवार नियंत्रण (रसायन का व्यवहार) | 3000.00 | ||
7 | पौधा संरक्षण | 4000.00 | ||
8 | फसल की खुदाई, दुलाई एवं बाज़ार व्यवस्था | 30 कार्यबल | 275/ कार्यबल | 8250.00 |
9 | भूमि का किराया | 01 वर्ष | 10000/ वर्ष | 10000.00 |
10 | अन्य लागत | 300/ टन | 12000.00 | |
11 | कुल व्यय : 101425.00 रुपये | |||
कुल ऊपज (कुंटल): 40 टन हरवेज (0.6% तेल) 240 किग्र. तेल | ||||
कुल आय (रूपये): 360000.00 रुपये | ||||
शुद्ध आय : 258575.00 रुपये | ||||
बिक्री दर @ 15000/ रुपये प्रति टन | ||||
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