मटर रवि मौसम की बहुत ही महत्वपूर्ण फसल है। इसका सबसे अधिक उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। इसके अतिरिक्त छोला, दाल व बेसन बनाने में भी इसकी उपयोगिता है। देश के सभी राज्यों में मटर की खेती सफलतापूर्वक की जाती है। वर्तमान में कई राज्यों के कुछ किसान मटर बीज उत्पादन कर अच्छी आमदनी प्राप्त कर रहे हैं।
जलवायु
मटर की अच्छी बढवार एवम अधिक पैदावार के लिए ठंडा शुषक वातावरण की आवश्यकता होती है। लगभग 22 डिग्री से० तापमान मटर की फसल के विकास के लिए आवश्यक पाया गया है।
भूमि
अच्छी पैदावार के लिए उत्तम जल निकास वाली दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। दियारा क्षेत्र भी मटर की खेती के लिए उपयुक्त पाए गए हैं।
खेत की तैयारी
खेत से पुरानी फसलों के अवशेष तथा खरपतवार को निकाल कर अलग कर दें, इसके बाद दो- तीन जुताई कर पाटा लगाए। जिससे मिटटी भुरभुरी एवम खेत समतल बन जाए। जहां तक संभोग हो पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से तथा शेष जुताई कल्टीवेटर से करना चाहिए। इसी समय लगभग 8 से 10 टन गोबर की सड़ी खाद खेत में बिखेर कर मिटटी में मिला देनी चाहिए।
उन्नत प्रभेद
मटर की प्रभेद का चयन किसान भाई को अपनी आवश्यकता को ध्यान में रख कर करनी चाहिएI प्रभेद निम्न प्रकार की है।
रचना : इसकी बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक कभी भी कर सकते हैं। परिपक्ता अवधी 135 से 140 है। औसत उपज 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई जाती है, और पौधा लंबा होता है तथा पाउडरी मिलडयू के प्रति अवरोधी किस्म है।
अपर्णा : यह 125 से 130 दिन की किस्म है इसकी बुवाई भी 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक करनी चाहिए। इसका पौधा बौना होता है तथा पाउडरी मिल्डयू रोग के प्रति प्रतिरोधी किस्म है। औसत उपज 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई जाती है।
मालवीय मटर - 15 : इसकी बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक कर सकते हैं। यह बौनी किस्म है तथा पाउडरी मिल्डयू रोगरोधी किस्म है। इसकी औसत 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और फसल 125 से 130 दिनों में तैयार हो जाती है।
पूसा प्रभात : इस किस्म की बुवाई 15 अक्टूबर से 30 नवंबर तक की जाती है। यह मुख्य रूप से हरी छिमी के लिए है इस किस्म से 60 से 65 क्विंटल हरी छिमी प्राप्त होती है। छिमी के लिए 60 से 70 दिनों में मैया फसल तैयार हो जाती है। दान हेतु 100 से 150 दिनों में तैयार होकर 12 से 15 किलो / हेक्टेयर उपज देताहै।
बीज दर
पूसा प्रभात के लिए 95 से 100 किलोग्राम एवं अन्य किस्मों के लिए 75 से 80 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।
बीज उपचार
मटर की बोआई से पूर्व बीज उपचार करना अत्यंत आवश्यक है। सर्व प्रथम बुवाई से 24 घंटे पूर्व 2. 5 ग्राम फफूंदनाशी डाईफेाल्टान अथवा कार्बेन्डाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। कजरा पिल्लू से बचाव हेतु क्लोरोपाइरीफास 20 इ० सी० कीटनाशी दवा की 08 मिली० दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। फफूँदनाशी एवं कीटनाशी से उपचार के बाद बोवाई से ठीक पहले राइजोबियम कल्चर एवं पी० एस० बी० से उपचारित करना चाहिए साथ ही उकठा प्रभावित क्षेत्रों में बीज बोआई से पूर्व ट्राईकोडर्मा से अवश्य उपचारित करें।
बुवाई की दूरी
पंक्ति से पंक्ति 30 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। पूसा प्रभात के लिए पंक्ति से पंक्ति 20 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी 5 सेंटीमीटर पर्याप्त होता है।
पोषक तत्व प्रबंधन
मटर की अच्छी पैदावार के लिए 20 किलोग्राम नेत्रजन एवं 40 किग्रा० फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। उर्वरक को बोआई से पूर्व खेत में समान रूप से बिखेर कर मिट्टी में मिला देना चाहिए।
सिंचाई
मटर की फसल में दो-तीन सिंचाई की आवश्यकता होती है। सिंचाई हल्की करनी चाहिए।पहली सिंचाई फूल बनने से पूर्व एवं दूसरी सिंचाई फली बनते समय करनी चाहिए।
खरपतवार प्रबंधन
फसल बृद्धि की प्रारंभिक अवस्था में निकाई - गुड़ाई की आवश्यकता होती है। इससे उपजी अच्छी होती है। पौधों को क्षति पहुचाए बिना निकाई - गुड़ाई करनी चाहिए। पौधे के बड़े होने पर निकाई - गुड़ाई करने पे पौधों को क्षति होने की अधिक संभावना होती है। ऐसी - दशा में सश्य क्रियाएं करते समय पौधों को उलटने - पलटने से बचना चाहिए। पौधों के उलटने - पलटने से फूल एवं फल आने में व्यवधान होता है और उत्पादन में कमी आ जाती है। रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमिथलीन 30 ई० सी की 3 ग्राम दवा 1 लीटर पानी में घोल तैयार कर बोआई के बाद अंकुरण से पूर्व छिड़काव करें, इससे खरपतवार का नियंत्रण हो जाएगा।
पौधा संरक्षण : मटर की फसल में कुछ प्रमुख रोग एवं कीड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं, जो निम्न हैं -
पाउडरी मिलडयू : इस रोग विशेष के लक्षण पौधों पर सफेद चूर्ण के समान पाउडर दिखाई पड़ता है। विशेषकर यह रोग जनवरी एवं फरवरी माह में लगता है। सर्वप्रथमपौधों की निचली पत्तियों पर चूर्ण के समान छोटे-छोटे धब्बे दिखाई पड़ते हैं जो कुछ समय पश्चात पतियों के दोनों सतहों को ढक लेते हैं। इस रोग के संक्रमण से पतियों का रंग काला पड़ जाता है, और दाने कड़वे हो जाते हैं।
गेरुआ रोग : इस रोग के प्रकोप की अवस्था में पतियों की निचली सतह पर हलके पिले रंग के छोटे धब्बो के रूप में दिखाई पड़ते हैं जो कुछ समय पश्चातगहरे भूरे रंग के उभरे हुए धब्बों का रूप धारण कर लेते हैं। फलियों पर भी इस प्रकार के धब्बे दिखाई पड़ते है।
फली छेदक कीट : इस कीट के प्रयोग की प्रारंभिक अवस्था में कीट की झिल्ली मटर के पौधों के कोमल भागों, पतियों तथा फूल को खाकर क्षति पहुंचाती है। बाद में मटर की फली में प्रवेश कर दोनों को हानि पहुंचाती है।
तनाछेदक कीट : यह कीट तने में घुसकर आंतरिक भाग को खाते हैं, जिससे तन्ना खोखला हो जात्ता है, और उपज घट जात्ति है।
लीफमाइनर : यह कीट बहुत छोटा होता है, पत्तियों में सुरंग बना कर उसके हरे पदार्थ को खाती है। जीससे पतियों में भोजन बनाने की प्रकिया में वाधा होती है, तथा पौधे की बढवार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
फसल की कटाई
हरी फली की तुड़ाई 60 से 65 दिनों पर शुरू हो जात्ती है तथा बीज के लिए फसल की कटाई उस अवस्था पर करें जब फल्लियाँ एवं पौधे पूर्ण रूप से सुख जाये।
मड़ाई
कटाई के बाद फसल को खलिहान में सूखा कर उपलब्ध संसाधनों से दौनी करें।
उपज
हरी फल्लियाँ 60 से 65 क्विंटल एवं बीच के लिए खेती करने पर 20 से 25 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है
मटर की खेती में खर्च एवं शुद्ध आय प्रति हेक्टर
पटवन सूक्ष्म सिंचाई से दो
उर्वरक निराई गुड़ाई खरपतवार नियंत्रण
पौधा संरक्षण
कटाई - मड़ाई
कुल खर्च
कुल उपज्ज - 22 कुंतल दर 3000 / क्विंटल = 66000 रुपए
शुद्ध आय = 66000 - 22250 = 43750 रुपए
8050.00 रुपए
2500.00 रुपए
5200.00 रुपए
1500.00 रुपए
5000.00 रुपए
22250.00 रुपए
हरा छिम्मी 60 क्विंटल x दर 1500 / क्विंटल = 90000 रुपए
शुद्ध आय इस छिम्मी से = 90000 - 22250 = 67750 रुपए
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