ढिंगरी मशरूम को किसी भी प्रकार के कृषि अवशिष्टों पर आसानी से उगाया जा सकता है. इसका फसल चक्र भी 45-60 दिन का होता है और इसे आसानी से सुखाया जा सकता है। किंगरी मशरूम में भी अन्य मशरूमों की तरह सभी प्रकार के विटामिन, लवण तथा औषधीय तत्व मौजूद होते हैं तथा डिंगरी को वर्षभर सर्दी या गर्मियों में सही प्रजाति का चुनाव कर उगाया जा सकता है। आज हमारे देश में इसकी व्यावसायिक खेती हो रही है। हमारे देश में भी इसके उत्पादन में वृद्धि की बहुत संभावनायें है।
ढिंगरी मशरूम उत्पादन करने की विधि :
ढिंगरी मशरूम उत्पादन करने के लिए हमें उत्पादन कक्ष की जरूरत होती है जो बाँस, कच्ची ईटों, पॉलीथीन तथा पुआल से बनाऐ जा सकते है। इन उत्पादन कक्षों में खिड़की तथा दरवाजों पर जाली लगी होनी चाहिए। ये किसी भी आकार के बनाये जा सकते हैं इस बात का ध्यान रखा जाए कि हवा के उचित प्रबंधन के लिए दो बड़ी खिड़कियां तथा दरवाजों के सामने भी एक खिड़की होनी चाहिए।
1. पोषाधार तैयार करना :
डिंगरी का उत्पादन साधारणतः किसी भी प्रकार के ऊपर लिखित फसल के अवशिष्ट का प्रयोग कर किया जा सकता है। इसके लिए यह जरूरी है कि भूसा या पुआल पुराना तथा सड़ा गला नहीं होना चाहिए। जिन पौधों के अवशिष्ट सख्त तथा लम्बे होते हैं उन्हें हम लगभग 2 से 3 से.मी. छोटे टुकड़े में काट लेते हैं। सर्वप्रथम कृषि अवशेषों को जीवाणु रहित किया जाता है जिसके लिए निम्नलिखित कोई भी विधि द्वारा कृषि अवशेषों को उपचारित किया जा सकता है।
2. बीजाई करना :
डिंगरी का बीज हमेशा ताजा प्रयोग करना चाहिए। भूसा तैयार करने से पहले ही स्पान खरीद लेना चाहिए तथा 1 क्विंटल सूखे भूसे के लिए 8-10 किलो बीज की जरूरत होती है। गर्मियों के मौसम में प्लूरोटस सजार काजू को उगाना चाहिए। सर्दियों में जब वातावरण का तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे हो तो प्लूरोटस फलोरिडा, कोर्नुकोपीया को उगाना चाहिए। बीजाई करने के दो दिन पहले कमरे या झोपड़ी को 2 प्रतिशत फार्मेलीन से उपचारित कर लेना चाहिए। प्रति 3 किलो गीले भूसे में लगभग 100 ग्राम बीज अच्छी तरह से मिला कर पॉलीथीन में चारों तरफ से तथा पैन्दे में छेद कर देना चाहिए जिससे बैग का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक न होने पाए।
3. फसल प्रबंधन :
बीजाई करने के पश्चात् थैलियों को एक उत्पादन कक्ष में बीज फैलने के लिए रख दिया जाता है। बैगों को हफ्ते में एक बार अवश्य देख लेना चाहिए कि बीज फैल रहा है या नहीं। यदि किसी बैग में हरा, काला या नीले रंग की फफूंद दिखाई दे तो ऐसे बैगों को उत्पादन कक्ष से बाहर निकाल कर दूर फेंक देना चाहिए। बीज फैलाते समय हवा या प्रकाश की जरूरतनहीं होती है। अगर बैग तथा कमरे का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ने लगे तो कमरे की दीवारों तथा छत पर पानी का छिड़काव दो से तीन बार करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बैगों पर पानी जमा न हो। लगभग 15 से 25 दिनों में गशरूम का कवक जाल सारे भूसे पर पील जाता है तथा बैग सफेद रंग का प्रतीत होने लगता है। इस स्थिति में पॉलीथीन को हटा लेना चाहिए। गर्मियों के दिनों में पॉलीथीन को पूरा नहीं हटाना चाहिए क्योंकि बैगों में नमी की कमी हो सकती है। उत्पादन कमरों में प्रतिदिन दो से तीन बार खिड़कियों खुली रखनी चाहिए जिससे कार्बन डाईऑक्साईड की मात्रा 800 पी.पी.एम. से अधिक न हो। ज्यादा कार्बन कार्बन डाइआक्साईड होने से डिंगरी का डंठल बड़ा हो जाता है तथा छतरी छोटी रह जाती है। बैगों को खोलने के बाद लगभग एक सप्ताह में मशरूम की छोटी-छोटी कलिकाएँ बनने लगती है जो चार से पाँच दिनों में पूर्ण आकार ले लेती हैं।
4. मशरूम की तुड़ाई करना :
जब बिंगरी पूरी तरह से तोड़ने लायक हो जाए तब इनकी तुड़ाई करनी चाहिए। ढिंगरी की छतरी के बाहरी किनारे ऊपर की तरफ मुड़ने लगे तो यह समझ लेना चाहिए कि ढिंगरी तोड़ने योग्य हो गई है। तुड़ाई हमेशा पानी के छिड़काव से पहले करनी चाहिए। मशरूम तोड़ने के बाद डंठल के साथ लगे हुए भूसे को चाकू से काटकर हटा देना चाहिए। पहली फसल के 8-10 दिन बाद दूसरी फसल आती है। पहली फसल कुल उत्पादन का लगभग आधा या उससे ज्यादा होती है। इस तरह तीन फसलों तक उत्पादन ज्यादा होता है। उसके बाद बैगों को किसी गहरे गड्ढे में डाल देना चाहिए जिससे उसकी खाद बनाई जा सके तथा बाद में इसे खेतों में प्रयोग कर सकें। जितनी भी व्यवसायिक प्रजातियां है उनमें एक किलो सूखे भूसे से लगभग औसतन 600 से 800 ग्राम तक पैदावार मिलती है।
5. भंडारण उपयोग :
ढिंगरी तोड़ने के बाद उसे तुरंत पॉलीथीन में बंद नहीं करना चाहिए। अपितु लगभग दो घंटे कपड़े पर फैलाकर छोड़ देना चाहिए जिससे की उसमें मौजूद नमी उड़ जाए। ताजा ढिंगरी को एक छिद्रदार पॉलीथीन में भरकर रेफ्रिजरेटर में दो से चार दिन तक रखा जा सकता है। ढिंगरी को ओवन में या धूप में सुखा कर वर्ष भर उपयोग में लाया जा सकता है।
6. आय :
ढिंगरी का व्यवसाय एक लाभकारी व्यवसाय है जिसमें लागत बहुत कम लगती है। इसके लिए उत्पादन कक्ष कम लागत पर बनाए जा सकते हैं तथा फसल चक्र भी 40-50 दिन का होता है। एक किलोग्राम डिंगरी का लागत मूल्य लगभग रू0 20 से 25 तक होती है तथा इसे 100 150 रु तक बाजार में आसानी से बेचा जा सकता है।
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