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मिर्च की खेती

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मसाला फसलों में मिर्च का प्रमुख स्थान है। मिर्च का उपयोग भोजन को स्वादिष्ट बनाने में किया जाता है। कुछ मिर्च पाउडर सब्जी को रंग देने के उपयोग में लाया जाता है। मिर्च की खेती लगभग देश के सभी राज्यों में की जाती है।

जलवायु :
गर्म आर्द्र जलवायु में उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में मिर्च की खेती की जाती है। लगभग 15 से 30 डिग्री से. तापमान उपयुक्त पाया गया है। वार्षिक वर्षा 200 मिली. मिर्च खेती के लिए उपयुक्त होता है। अधिक तापमान में फूल एवं फल गिर जाता है। यदि दिन में 9 से 10 घंटा सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता है तो उपज में 21 से 24 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है।

भूमि :
जीवांश युक्त जल निकास वाली दोमट भूमि मिर्च की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। इसके साथ ही काली मिट्टी में भी मिर्च की अच्छी पैदावार पाई गई है।

खेत की तैयारी :
खेत की तैयारी के लिए देशी अथवा मिट्टी पलटने वाले हल से तीन-चार जुताई कर पाटा लगा कर मिट्टी भुरभुरी बना लें। इसके बाद सिंचाई सुविधा अनुसार खेत को क्यारियों में बाँट लें।

उन्नत प्रभेद :
मिर्च की बहुत सारी किस्में पायी जाती है जो अपने विशेष गुणों के कारण लोकप्रिय है। असम की भूत जोलोकिया मिर्च का विश्व की सबसे तीखी मिर्च में नाम दर्ज है। कुछ गोल आकार की मिर्च होती है तो कुछ काफी छोटी जिसे लौंगिया मिर्च के नाम से जाना जाता है। कुछ ऐसी मिर्च भी होती है जिसमें तीखापन बिल्कुल नहीं होता है इसे विशेष रूप से सलाद के रूप में उपयोग में लाया जाता है। स्थानीय बाजार और अपनी आवश्यकता के अनुसार किसान मिर्च की किस्म का चयन कर सकते है।

  • पूसा ज्वाला :
    इसके फल तीखे होते हैं, शीघ्र तैयार होने वाली किस्म है। फल लम्बे और इसकी खेती करने पर 15 से 20 क्विंटल सूखी मिर्च की उपज प्राप्त की जा सकती है।
  • कल्याणपुर चमनः
    यह संकर किस्म है, इसकी फलियाँ लाल, लम्बी और तीखी होती है। इसकी पैदवार एक हेक्टेयर में 25 से 30 क्विंटल सूखी होती है
  • कल्याणपुर चमत्कारः
    यह संकर किस्म है, इसके फल लाल और तीखे होते हैं।
  • कल्याणपुर-1 : 
    यह किस्म 215 दिनों में तैयार हो जाती है तथा 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त होती है।
  • कल्याणपुर-2: 
    यह किस्म 210 दिनों में तैयार होती है तथा इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 15 क्विंटल है।
  • सिन्दूर:
    यह किस्म 180 दिनों में तैयार होती है तथा इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 13 से 15 क्विंटल है।
  • आंध्र ज्योति :
    यह किस्म पूरे भारत में उगाई जाती है, इस किस्म की उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 18 क्विंटल है।
  • भाग्य लक्ष्मी : 
    यह किस्म सिंचित एवं असिंचित दोनों क्षेत्रों में उगायी जाती है। असिंचित क्षेत्र में 10 से 15 क्विंटल एवं सिंचित क्षेत्र में 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है।
  • जवाहर-218 :
     यह संकर किस्म है, इसकी उपज 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी मिर्च प्राप्त होती है। पंजाब लाल यह एक बहुवर्षीय किस्म है, यह मोजैक वायरस के लिए प्रतिरोधी है। इसकी उपज क्षमता 47 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
  • पूसा सदाबहार :
    यह एक बारह मासी किस्म है जिनमें एक गुच्छे में 5-22 फल लगते हैं। साथ ही इसमें साल में 2 से 3 फलन होता है। 150 से 200 दिनों में तैयार होती है उपज 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

बीज दर :
प्रति हेक्टेयर मिर्च के खेती हेतु 1.25 से 1.50 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है।

पौधशाला की तैयारी:
 बीजों को पहले नर्सरी में बोते हैं, शीतकालीन मौसम के लियेजून-जुलाई एवं ग्रीष्म मौसम के लिए दिसंबर एवं जनवरी में नर्सरी में बीज की बुआई करते हैं। पौधशाला तैयार करके बीज को 2.5 से 3 सेंटीमीटर की दूरी पर पंक्तियों में बोकर मिट्टी और खाद से ढक देते हैं, फिर पूरी क्यारियों को खरपतवार से बैंक देना चाहिए। बीज को जमने के तुरंत बाद सायंकाल में खरपतवार को हटा देते हैं।

बीजशोधन :
बीज को बुआई से पूर्व शोधित करने की होती है इससे रोग एवं कीटों के प्रभाव को कम किया जा सकता है। बीज शोधन के लिए 2 ग्राम कैप्टान दवा प्रति किग्रा. बीज की दर से बुआई से पहले करना चाहिए।

पौध रोपण :
पौधशाला में लगभग 45 दिनों में पौधे तैयार हो जाते है, इस समय पौधों को पौधशाला से उखाड़ कर कतार से कतार 4 फीट एवं पौधे से पौधे 3 फीट की दूरी पर मुख्य खेत में लगाना चाहिए। कुछ प्रभेदों में पौधरोपण की दूरी घट-बढ़ सकती है क्योंकि दूरी कानिर्धारण सामान्य तौर पर पौधे के आकार पर निर्भर करता है।

पोषक तत्त्व प्रबंधन :
मिर्च की खेती के लिए 20 से 25 टन गोबर की सड़ी हुई खाद खेतकी तैयारी के समय खेत में बिखेर कर मिट्टी में मिला देना चाहिए। उर्वरकों में 100 किग्रा. नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस तथा 50 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा को एक बार में तथा एक तिहाई नेत्रजन, बिचड़ा की रोपाई से पूर्व खेत में समान रूप से विशेषकर मिट्टी में मिला देना चाहिए। नेत्रजन की शेष मात्रा फिर दो भागों में बाँट कर पहली सिंचाई के बाद एवं फूल आने कीअवस्था पर खड़ी फसल में देना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन :
शीतकालीन मौसम के मिर्च की खेती में सिंचाई की आवश्यकता बहुत कम होती है। सिंचाई की आवश्यकता पड़ने पर दो-तीन सिंचाई दिसंबर से फरवरी तक करनी पड़ती है। ग्रीष्म कालीन मौसम की खेती में 10 से 12 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण :
पौध वृद्धि के लिए खरपतवार नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है इसके लिए निराई गुड़ाई कर खरपतवारों को नियंत्रित किया जाता है। इससे पौधों की जड़ों के पास की मिट्टी ढीली हो जाती है और जड़ों के विकास के लिए अच्छा अवसर प्राप्त होता है।

पौधा संरक्षणः
मिर्च की खेती में रोग एवं कीटों के प्रकोप से फसल को कभी-कभी अधिक क्षति होती है इसलिए प्रभावकारी उपाय अपनाना चाहिए।

  • थ्रिप्सः
    यह भूरे रंग के बेलनाकार छोटे कीट होते हैं। व्यस्क एवं शिशु कीट दोनों ही पत्तियों को खुरचकर उनका रस चूसते हैं, जिससे पत्तियों पर सफेद छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं। अधिक आक्रमण होने पर पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस.एल. का 0.5 मिलीलीटर अथवा डायथेथोएट 30 ई.सी. का। मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • लाही कीट : 
    हरे, भूरे, काले रंग के पंखविहीन एवं पंखयुक्त छोटे कीट होते हैं, जो पत्तियों के कोमल भाग से रस चूसते रहते हैं। इसके नियंत्रण के लिए प्रोफेनोफास 50 ई.सी. 1मिली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें।
  • सफेद मक्खी : 
    यह सफेद रंग की पंखवाली मक्खी है, जो लगभग मिली मीटर लम्बी होती है तथा शरीर पीले रंग का होता है। शिशु एवं व्यस्क दोनों ही पत्तियों पर रहकर रस चूसते हैं। यह पौधों में लीफ कर्ल वाइरस का भी वाहक होते हैं। इसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस.एल. का। मिली. प्रति 3 लीटर पानी में घोल बनाकर फसल परछिड़‌काव करें।
  • डायबैंक रोगः
    शुरूआत में पौधों की फनगी में ऊपर से नीचे की ओर सुखने लगती है. जो बाद में काला पड़ जाता है। आर्द्रता अधिक होने पर रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है। पर्क फलियों पर छोटा धब्बा बनता है, जो धीरे-धीरे बड़ा और सफेद हो जाता है। कुहासा वाले वातावरण में यह तेजी से फैलता है। इसके नियंत्रण के लिए खड़ी फसल में मैन्कोजेब 75 घुलनशील चूर्ण का 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • उखड़ा रोग :
    इस रोग में मिट्टी की सतह के ऊपर का तना सिकुड़ कर संकुचित हो जाती है, धीरे-धीरे पौधा मुरझा कर सूख जाता है। इसके नियंत्रण के लिए कॉपर आक्सीक्लोराइड 50 घुलनशील चूर्ण का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर मिट्टी एवं पौधे को भिंगोएं। यदि जरूरत पड़े तो इस दवा का 10 से 12 दिनों में पुनः व्यवहार करें।

तुड़ाई :
सब्जी अथवा सलाद के लिए उपयोग की जानेवाली मिर्च को हरी अवस्था में ही पूर्ण विकसित हो जाने पर तोड़ लेते हैं। शुष्क मसालों के रूप में उपयोग की जानेवाली मिर्च को पूर्णतः परिपक्व हो जाने पर तोड़ते हैं।

उपजः
असिंचित फसल से सूखी मिर्च 5 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा सिंचित क्षेत्र की फसल से सूखी मिर्च 15 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। हरी मिर्च की औसत उपज किस्म के अनुसार 60 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है।

Table Example

मिर्च की खेती में प्रति हेक्टेयर आय व्यय का आकलन (वर्ष 2020-21 के अनुसार)

क्र. स. विवरण मात्रा दर राशि (रु०)
1 खेत की तैयारी एवं रेखांकनः
(क) ट्रैक्टर द्वारा जुताई 8 घंटा 450/ घंटा 3600.00
(ख) रेखांकन हेतु कार्यबल 20 कार्यबल 275 कार्यबल 5500.00
2. बीज एवं बुआई/रोपाई:
(क) बीज 1.5 कि.ग्रा 2000 / कि.ग्रा 3000.00
(ख) बीजोपचार (फफूंदनाशी/कीटनाशी रसायन) 5 ग्रा. 1000/ कि.ग्रा. 5.00
(ग) बुआई / रोपाई 15 कार्यबल 275/ कार्यबल 4125.00
3 खाद एवं उर्वरकः
(क) गोबर कि सड़ी खादः 25 टन 500/ टन 12500.00
(ख) नत्रजन 100 किग्रा. 13.80 किग्रा. 1385.00
(ग) स्फूर 50 किग्रा. 50 किग्रा. 2500.00
(घ) पोटाश 50 किग्रा. 24.50 किग्रा. 1225.00
(ङ) खाद एवं उर्वरक के व्यवहार 6 कार्यबल 275/ कार्यबल 1650.00
4 सिंचाई 06 बार 1000/ सिंचाई 6000.00
5 निकाई-गुड़ाई 20 कार्यबल 275/ कार्यबल 5500.00
6 खर-पतवार नियंत्रण (रसायन का व्यवहार) 3000.00
7 पौधा संरक्षण 4000.00
8 फसल की खुदाई, दुलाई एवं बाज़ार व्यवस्था 30 कार्यबल 275/ कार्यबल 8250.00
9 भूमि का किराया 10000/ वर्ष 4500.00
10 अन्य लागत 4000.00
11 कुल व्यय : 70735.00 रुपये
कुल ऊपज : 100 कुंटल
कुल आय (रूपये): 300000.00 रुपये
शुद्ध आय (रूपये): 229265.00 रूपये
बिक्री दर @ 3000/ रु. प्रति कुंटल
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